Friday, January 6, 2012

महिला सशक्तिकरण में मीडिया की भूमिका पर सवालिया निशान (?)

मंत्री रामलाल जाट के महिलाओं से अवैध संबंध की खबरों ने महिलाओं को आहत किया
लखन सालवी
पिछले दिनों राजस्थान सरकार के बड़े मंत्रियों पर मीडिया सहित आमजन की अंगुलियां उठी। लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ ने पूर्ण जिम्मेदारी व निर्भिकता से इस मामलें से जुड़ी हर एक हकीकत को जनता के सामने ला दिया है, इसके लिए मीडिया धन्यवाद का पात्र है। लेकिन कुछ खबरियां चैनलों ने महिपाल मदेरणा व भंवरी देवी के अंतरंग संबंधों को जाहिर करती सीडी को मसालेदार तड़के देकर प्रसारण कर मीडिया की गरिमा को आहत किया है।
भीलवाड़ा जिले के निवासी पूर्व वन पर्यावरण एवं खनिज मंत्री राम लाल जाट पर भी स्वर्गीय पारस देवी के साथ अवैध संबंधों के आरोप लगाए गए। पारस देवी की मौत के बाद आधी रात में मंत्री के सहयोग से पोस्टमार्टम करवाने जैसी कई बातों को लेकर आरोप लगे है। बात पूर्व मंत्री रामलाल जाट व पारस देवी जाट तक ही सीमित होती तो ठीक था। लेकिन उस समय दौर चल रहा राजनेताओं के महिलाओं के साथ अवैध रिश्तों को उजागर करने का। मीडियाकर्मी धड़ाधड़ ऐसे मामले उजागर कर रहा था, लेकिन इस दौर में मीडियाकर्मी व मीडिया संस्थान मानवीय संवेदनाओं को भूल गए। एक प्रमुख दैनिक अखबार में पूर्व मंत्री रामलाल जाट व भीलवाड़ा की 3 महिला जनप्रतिनिधियों के संबंध में जो खबरें प्रकाशित हुई। खबर के अनुसार पूर्व मंत्री रामलाल जाट ने एक महिला को सरकारी नौकरी छुडवाकर उसे जिला प्रमुख बनाया, इसी प्रकार दो अन्यों के माथे पर भी मंत्री जी का हाथ रहा इसलिए ही वह प्रमुख पदों पर विराजमान हो सकी।
बिना तथ्यों की ये खबर मीडिया प्रतिष्ठानों के लिए अत्यन्त ही लज्जाजनक है। यहां बताना जरूरी हो गया है कि भीलवाड़ा की जिला प्रमुख ना तो सरकारी नौकरी में थी ना ही रामलाल जाट से परिचित थी। जिला परिषद सदस्य की आरक्षित सीट थी, समुदाय के लोगों के सहयोग से पार्टी से टिकट लेकर चुनाव लड़ी। चूंकि जिला प्रमुख की सीट भी अनुसूचित जाति की महिला हेतु आरक्षित थी। वह चुनाव लड़ी, बहुमत से जिला प्रमुख बनी न की किसी मंत्री की चहेती होने के कारण।
कथित एक मीडिया प्रतिष्ठान ने महिला जनप्रतिनिधियों पर नाजायज अंगुली उठाकर मीडिया की गरिमा को दागदार किया है। आरक्षण का लाभ लेकर जिला प्रमुख बनी एक दलित महिला का मीडिया ने अपमान किया है। मीडिया इतना लापरवाह कैसे हो सकता है ? जहां महज तथ्यों की बात की जाती है वहां बिना तथ्यों के खबरें प्रकाशित की गई।
मजे की बात यह है कि प्रतिष्ठित अखबार के संपादक स्पन्दन और महिला सशक्तिकरण के पक्ष में लेख लिख लिख कर न जाने कितनी वाहवाही लूट चूके है। फिलहाल बिना तथ्यों की भ्रामक और झूठी खबर प्रकाशित करने के बाद भी उन्होंने अपनी गलती स्वीकार नहीं की।

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