Saturday, January 28, 2012

सामाजिक सरोकार बनाम सत्ता और मीडि़या

सरकार में रत्तीभर भी शर्म शेष है तो जसविन्दर सिंह साबी के खिलाफ कार्यवाही करे।
‘‘सांच को आंच क्या’’ इस कहावत को चरितार्थ होती देख रहा हूं। अब देखिए ना बारां-झालावाड़ के यूथ कांग्रेस के लोकसभा महासचिव जसविन्दर सिंह साबी को, राजनीतिक ईच्छाशक्ति रखने वाले इन भाईसाब ने दूसरा दशक परियोजना के खिलाफ खूब साजिशें रची है, लेकिन सांच के पथ पर चल रही इस संस्था को कोई आंच नहीं आई। दूसरी तरफ अब खुद ही फंसते नजर आ रहा है। अब बचने के लिए ना ना प्रकार की जुगत कर रहे है। (दूसरों के लिए खोदा गड्ढ़ा और खुद ही गिर गए बेचारे)
जसविन्दर सिंह साबी
उल्लेखनीय है कि पिछले महिने बारां जिले के भंवरगढ़ गांव के तेजाजी के डांडे पर संचालित दूसरा दशक परियोजना (स्वयंसेवी संस्था) में आयोजित शिविर से गई दो सहरिया लड़कियों ने संस्था के कार्यकर्ताओं पर अश्लीलता करने के आरोप लगाए थे। 20 दिसम्बर को भंवरगढ़ थाने में संस्था के निदेशक मोती लाल सहित 6 कार्यकर्ताओं के खिलाफ भंवरगढ़ थाने में मामला दर्ज किया गया। आईपीसी की धारा 354, 294 व अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3 (11) के तहत मामला दर्ज किया गया व एससी/एसटी सैल (बारां) के पुलिस उपाधीक्षक कल्याणमल बंजारा द्वारा आरंभ की गई।
यह पूरा मामला कुछ यूं है कि 4 नवम्बर 2011 को गणेशपुरा गांव की दो लड़कियां दूसरा दशक परियोजना द्वारा आयोजित आवासीय शिविर में जुड़ी थी। वे महज 12 दिन ही संस्था में रूकी और 16 नवम्बर को उनकी माताएं संस्था में आई और यह कहकर लड़कियों को अपने साथ ले गई कि घर में काम करने वाला कोई नहीं है इसलिए लड़कियां घर का काम करेंगी। उन लड़कियों के द्वारा 20 दिसम्बर को भंवरगढ़ थाने में रिपोर्ट दिलवाई गई कि संस्था  में  कार्यकर्ताओं ने उनके साथ अश्लीलता की, उन्हें नंगा किया गया और फोटो खिंचे गए। उन्होंने 56 वर्षीय संस्था के निदेशक मोतीलाल, समन्वयक विजय मेहता (38) व आवासीय कैम्प में पढ़ाने वाली 4 अध्यापिकाओं (आयु 22-25 वर्ष) पर आरोप लगाए।
ये आरोप निराधार है क्योंकि संस्था के कार्यकर्ताओं के खिलाफ एफआई आर दर्ज होने से पहले 19 दिसम्बर को ईटीवी राजस्थान टीवी चैनल पर लड़कियों के साथ अश्लीलता करने के समाचार प्रसारित हुए थे। जगजाहिर हो चुका है कि जसविन्दर सिंह साबी 19 दिसम्बर को संस्था में गया था और विडियोंग्राफी की थी। यहां बहुत ही बड़ा सवाल उठता है कि जसविन्दर सिंह साबी द्वारा ली गई विडियों फूटेज ईटीवी राजस्थान जैसे टीवी चैनल पर कैसे प्रसारित हुई ?  और निःसंदेह समाचार के कंटेंट भी जसविन्दर सिंह साबी द्वारा किए गए हो ?
साबी साब ने लाल सिंह जी फौजदार को खबर व विडियों फूटेज घर बैठे उपलब्ध करवा दिए, लाल सिंह जी को ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ी। भाईसाब ने सत्यता की जांच करने की जहमत भी नहीं उठाई, तथ्य रहित खबर ईटीवी को भेज दी।  35 किलोमीटर दूर की खबर उन्हें घर बैठे ही मिल गई, अजी सही बात तो यह है कि उन्हें मिलता ही कितना है, जो वो इतनी दौड़ भाग करते ? इस खबर के बारे में कुछ बुद्धिजीवी पत्रकारों ने ईटीवी राजस्थान जयुपर के संपादकीय सलाहकार ईश मधुर तलवार साब को बारां जिले के संवाददाता लाल सिंह फौजदार की भूमिका पर सवाल खड़े किए है। साबी साब ने संस्था के लोगों को फंसाने के लिए खूब मेहनत की। साबी साब 17 दिसम्बर को मध्यपद्रेश सीमा से सटे बारां जिले के कालीमाटी गांव में भी गए थे और वहां इत्मीनान से महिलाओ को बताया कि संस्था के कार्यकर्ता  कैम्प में पढ़ रही तुम्हारी लड़कियों की गंदी तस्वीरें लेकर विदेशों में भेज रहे है। साबी साब संस्था के खिलाफ माहौल तैयार करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने महिलाओं को प्रलोभन भी दिए। लेकिन वे महिलाएं भी ना....., ईमानदारी का चोला पहने घूम रही है। साबी साब ने तो आगे चलकर महिलाओ को साफ साफ कहा था कि अपनी लड़कियों को संस्था में से ले आओ और जैसा मैं कहूं वैसा कहलवा दो तो मैं सरकार से डेढ़-डेढ़ लाख रुपए दिलवा दूंगा। इससे ज्यादा तो ओर क्या करते साबी साब। शायद साबी साब सरकार से रुपए दिलवा भी सकते है, हो सकता है राहूल गांधी या मुख्यमंत्री जी ने उन्हें इस बात का ठेका दे रखा हो।
कालीमाटी गांव के लोग खुल कर सच्चाई बता रहे है। वो बिना किसी डर के सच्च बयां कर रहे है, इस गांव की पंसूरी बाई सहरिया का कहना है कि वो तो राज्य महिला आयोग में जाकर सच्च बता कर आई है। पंसूरी बाई व अन्य लोगो का कहना है कि 18 दिसम्बर को जसविन्दर सिंह साबी (यूथ कांग्रेस, लोकसभा महासचिव, बारां-झालावाड़) का कालीमाटी गांव में गया था और महिलाओं को संस्था के खिलाफ भड़काया, कहा कि ‘‘भंवरगढ़ की दूसरा दशक संस्था में तुम्हारी लड़कियों को नंगा कर के उनकी फोटों खिंची जा रही है, संस्था के लोग उन फोटों को विदेशों में भेजकर पैसा कमा रहे है।’’ उसने महिलाओं को कहा कि तुम भी अपनी लड़कियों को संस्था से ले आओं और जैसा मैं कहूं वैसा कह दो तो सरकार से डेढ़-डेढ़ लाख रुपए दिलवाउंगा। उसने कहा कि गणेशपुरा गांव की तुम्हारे समाज की दो लड़किया भी संस्था से भागकर आ गई है, मैं उन्हें सरकार से डेढ़-डेढ़ लाख रुपए दिलवाउंगा।’’ 
सत्ताधारी भी सभी आंख पर पट्टी बांधे राज कर रहे है, क्षेत्र के लोग असलियत को जान चुके है कि जसविन्दर सिंह साबी ने संस्था के कार्यकर्ताओं को फंसाने के लिए साजिश की। संस्था के निदेशक मोतीलाल छाबड़ा ने जसविन्दर सिंह साबी के खिलाफ पुलिस थाना भंवरगढ़ व पुलिस अधीक्षक बारां को रिपोर्ट भी दी है। मानवाधिकारों के लिए कार्य कर रहे लोगों के खिलाफ षडयंत्र रच कर झूठा मुकदमा दर्ज करवाने वाले जसविन्दर सिंह साबी के खिलाफ प्राप्त रिपोर्ट पर पुलिस द्वारा एफआईआर दर्ज करने की बजाए महज परिवाद दर्ज कर जांच की जा रही है, ऐसा लगता है कि सरकार अपने लोगों के खिलाफ कार्यवाही ही नहीं करना चाहती है। 
ऐसा भी नहीं है कि जसविन्दर सिंह साबी की करतूतों के बारे में यूथ कांग्रेस के आलाकमान को जानकारी नहीं हो। यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहूल गांधी, राज्य के मुख्यमंत्री व राजस्थान में यूथ कांग्रेस के बड़े लीडर भंवर जितेन्द्र सिंह को अपनी युवा टीम के इस नेता के करतूत की सूचना पहूंच चुकी है। लेकिन कोई भी एक कदम आगे आकर उसके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर रहा है। जसविन्दर सिंह अभी तक यूथ कांग्रेस का लोकसभा महासचिव है। 
सहरिया समुदाय की महिलाओं ने राज्य महिला आयोग को ज्ञापन भेजकर मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की थी। राज्य महिला आयोग ने आरोप लगा रही लड़कियों को सुनवाई के लिए जयपुर बुलवाया था। वो तय तारीख को तो आयोग के समक्ष उपस्थित नहीं हुई लेकिन उसके बाद 23 जनवरी को वो अपनी माताओं सहित आयोग में गई थी। वे जसविन्दर सिंह साबी के साथ उसकी जीप में गणेशपुरा  से आयोग (जयपुर) में गई। जसविन्दर सिंह साबी (जिसके खिलाफ साजिश रचने के आरोप लगे हुए है व पुलिस कछुआ चाल से जांच कर रही है।) के साथ उसके नियंत्रण में आई लड़कियां व उनकी माताएं आयोग के समक्ष क्या बताया होगा इसका अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। भई कहावत है ना . . . समन्दर के बीच रहकर मगरमच्छ से बैर नहीं किया जा सकता है। महिलाओं ने वही कहा होगा जो जसविन्दर ने उन्हें बताया। 
23 जनवरी को रानी और डिम्पल (काल्पनिक नाम) उनकी माताओं सहित जसविन्दर सिंह साबी के साथ ईटीवी राजस्थान टीवी चैनल कार्यालय के बाहर नजर आए थे। वहां रानी और डिम्पल का साक्षात्कार किया जा रहा था। वो साक्षात्कार टीवी पर नजर नहीं आया, मतलब जसविन्दर की साजिश नाकाम रही। 
आजकल वो रानी और डिम्पल की माताएं बतियां रही है कि भंवरगढ़ थाने में रानी और डिम्पल के नाम से दर्ज एफआईआर में लिखित बाते झूठी है। रानी और डिम्पल भी कह रही है कि फूलचंद सहरिया एक लिखा हुआ पत्र लाया जिस पर उन्होंने हस्ताक्षर कर दिए थे, रानी और डिम्पल की माताओं का भी यही कहना है। यानि कि उन्हें पता नहीं था कागज में क्या लिखा हुआ है, अपन भी क्या मजाक कर रहे है, वैसे वो महिलाएं शिक्षित ही नहीं है तो उन्हें पता भी क्या होगा कि कागज में क्या लिखा है। उन्हें तो फूलचंद सहरिया ने जाति से बाहर कर देने का दबाव बनाकर कागज पर अंगूठे लगवाए। 
अब बातें क्या साफ हो रही है . . संस्था में जाकर विडियोंग्राफी किसने की ? जसविन्दर साबी ने। कालीमाटी गांव में जाकर महिलाओं को किसने उकसाया ? जसविन्दर सिंह साबी ने। साजिश  रचने के लिए चंदा किसने उगाया ? जसविन्दर सिंह साबी ने। भंवरगढ़ थाने में रानी और डिम्पल की रिपोर्ट किसने दिलवाई ?  जसविन्दर सिंह साबी ने । संस्था के खिलाफ केलवाड़ा में समाज की बैठक का आयोजन किसके इशारे पर हुआ?  जसविन्दर सिंह साबी के। बारां की पुलिस अधीक्षक के.बी. वन्दना के समक्ष रानी और डिम्पल को पेश कर संस्था के खिलाफ कार्यवाही की मांग किसने की ? जसविन्दर सिंह साबी ने। राज्य महिला आयोग के बुलाने पर रानी और डिम्पल को उनकी माताओं सहित आयोग (जयपुर) में कौन ले गया ? जसविन्दर सिंह साबी।
चार-चार मुकदमें जिसके खिलाफ दर्ज है वो सज्जन श्रीमान् जसविन्दर सिंह साबी अचानक इतने समाजसेवी कैसे हो गए ? रानी और डिम्पल के मर्मों का जानकार इतने मार्मिक कैसे हो गए ? एक्च्यूएली जनाब के पिताश्री और कुछ रिश्तेदार सहरिया समुदाय के लोगों से बंधुआ मजदूरी करवाते थे। पिछले साल दूसरा दषक परियोजना ने अपनी सहयोगी संस्थाओं के सहयोग से बंधुआ मुक्ति अभियान चलाया था। जिसके तहत क्षेत्र में काम कर करीबन 150 बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया गया। इनकी बदौलत बंधुआ मजदूर न केवल मुक्त हुए बल्कि जिन लोगों पर बंधुआ मजदूरी करवाना सिद्ध हुआ उनके खिलाफ कार्यवाही भी हुई। जसविन्दर सिंह साबी के परिवार के लोग भी बंधुआ मजदूरी करवाते पाए जिनके खिलाफ कार्यवाही की गई। इसी बात से झल्लाए जसविन्दर सिंह साबी ने संस्था के कार्यकर्ताओं के खिलाफ साजिश रची। पर सच्च ही तो है, सांच को आंच नहीं। सच्चाई से कार्य कर रहे संस्था के लोगों को समस्याओं का सामना तो करना पड़ा। संस्था के निदेशक मोतीलाल छाबड़ा के चेहरे पर सिलन तक दिखाई नहीं पड़ती वो कहते है - सांच को आंच क्या। जब बिलकुल साफ हो गया है कि जसविनदर सिह साबी ने संस्था के खिलाफ दुष्प्रचार किया है।  संस्था को बदनाम करने की साजिश की है तो, उसे गिरफ्तार क्यों नहीं किया जा रहा है ? टीवी चैनल पर प्रसारित हुई खबर के मामले में ऐसा प्रतीत होता है पत्रकारिता में आया यह नौजवान महज पैसा और शोहरत बटोरने ही आया है अगर ऐसा नहीं है तो क्या सामाजिक सरोकारों के लिए कार्य कर रही संस्था के खिलाफ किसी और के द्वारा दी गई खबर की सत्यता को जाने बैगर वह प्रसारित करने हेतु भेजता ? अपन भी कैसी बात कर रहे है, उसे सामाजिक सरोकारों की क्या पड़ी . .  मीडि़या का चेहरा भी सामने आया, कालीमाटी गांव की महिलाएं साफ बता रही है जसविन्दर सिंह साबी गावं में आया था और उन्हें संस्था के बारे झूठी भ्रामक सूचना दी और प्रलोभन देते हुए संस्था के खिलाफ उकसाया। पर दैनिक नवज्योति को छोड़कर किसी भी मीडिया प्रतिष्ठान ने इस सच्चाई को प्रकाशित/प्रसारित करने की जहमत नहीं उठाई। कहा तो है ना कि कार्पोरेट घरानों को भला सामाजिक सरोकारों से क्या वास्ता !
मोतीलाल
संस्था के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति मोतीलाल ने पढ़ाई छोड़ने के बाद युवा उम्र में ही घर छोड़कर सहरिया आदिवासी इलाके में आकर रहने लगे और बच्चों को शिक्षित करने का कार्य करने लगे थे। सामाजिक सरोकारों से उनका रिश्ता है, दूसरा दशक परियोजना के निदेशक होने के नाते मिलने वाले मासिक वेतन में से 9000 रुपए अपनी बहिन व भाई को भेजते है व शेष रकम एक फण्ड में जमा करते है। वह फण्ड़ गरीबों की मदद में खर्च किया जाता है। आजकल मोतीलाल एक वर्ग विशेष व मीडिया संस्थानों के रवैये से दुःखी है, लेकिन वो बड़े ही हिम्मत वाले इंसान है, अहसास कराते है कि -"साख से गिर जाए हम वो पत्ते नहीं, आंधियों से कह दो अपनी औकात में रहे।"
इजाजत हो तो कविताएं लिखना शुरू करूं, वैसे मेरी हिन्दी ठीक नहीं है, हिन्दी शब्दों का ज्ञान भी पूरा नहीं है 

Monday, January 23, 2012

इस महिला पर भी लिखेंगे और कमायेंगे

साहित्य लिखने वाले लम्पटों की जमात इक्कट्ठी हुई है जयपुर में, जिन कार्ड बोक्स में महेंगी शराब आई उन बोक्स की रद्दी ले जाती एक दलित महिला. . .   अब कोई साहित्य लिखने वाला शराबी लम्पट इस दलित महिला पर भी कुछ लिखेगा, और लिख कर कमा लेगा।
लिटरेचर फेस्टिवल में रद्दी ले जाती महिला

Sunday, January 22, 2012

डाॅ. राम पुनियानी के साथ चर्चा

राम पुनियानी से चर्चा करते लोग
डाॅ. राम पुनियानी के साथ चर्चा की। वहीं फिल्म शो के माध्यम से युवाओं को देश के मुख्य मुद्दों की ओर आकर्षित करने की योजना बनाई गई। आगामी दिनों में कुछ ऐसा ही करने का इरादा है। 

3 छात्राओं की मौत के पीछे आखिर राज क्या है ?

महिने बीते, पुलिस अभी तक नहीं सुलझा सकी गुत्थी
लखन सालवी
14 नवम्बर को राजस्थान के बारां शहर में 3 स्कूली छात्राओं की जहर खाने से मौत हो गई। अभी तक इस मामलें में पुलिस ने 3 बार जांच दल बदले है, लेकिन किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाई है। मृतकाओं में से एक के पास मिले सुसाइड नोट के आधार पर पुलिस इसे आत्महत्या का मामला मान रही है। आत्महत्या क्यूं की ? इस सवाल के जवाब में अध्यापकों द्वारा पढ़ाई के लिए दबाव के अलावा कोई जवाब पुलिस नहीं दे पा रही है। जबकि मरने वाली 2 छात्राओं ने बोर्ड परीक्षा में 82 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। हो सकता है कि 11वीं कक्षा में बायोलोजी विषय उनके लिए मुश्किल रहा हो लेकिन पढ़ाई या अध्यापकों की प्रताड़नाओं से दुःखी होकर तीनों ही आत्महत्या कर ले यह बात कहानी सुनने वाले किसी के भी गले नहीं उतर रही है।
गार्गी दूबे (17), ईशा कलवार (16), अक्षिता सोनी (16) व प्राची अग्रवाल (16) बचपन की साथी रही है। इनके बीच दोस्ताना लगभग एक दशक से था। चारों केंन्द्रीय विद्यालय में कक्षा 11 (बायोलोजी) में पढ़ती थी। 14 नवम्बर को गार्गी,  ईशा व अक्षिता की जहर के सेवन से तबीयत बिगड़ने के बाद ईलाज के दौरान मृत्यु हो गई। 15 नवम्बर को तीनों छात्राओं का पोस्टमार्टम किया गया और मृतका अक्षिता के पिता बसंत सोनी की रिपोर्ट पर पुलिस ने मामले की जांच शुरू की। बसंत सोनी ने केन्द्रीय विद्यालय के दो अध्यापको पर अक्षिता को प्रताडि़त करने का आरोप लगाया।
जानकारी के अनुसार चारों छात्राएं रोजाना ट्यूशन जाती थी। 4 से 5 बजे केमिस्ट्री के लिए आर.के. अवस्थी, 5 से 6 बजे तक सूर्यप्रकाश  श्रीवास्तव, 6.30 से 7.30 तक युग शक्ति कोचिंग सेंटर के उमेश  सोनी के यहां ट्यूशन जाती थी। घटना वाले दिन चारों छात्राए स्कूल नहीं गई थी।

परिजनों के बयान
ईशा कलवार के पिता बालमुकुन्द कलवार ने बताया कि दोपहर 3.30 बजे ईशा से ट्यूशन के लिए गई थी। उससे पूर्व उसने घर पर खाना भी बनाया था। ट्यूशन के लिए घर से जाते वक्त वह अपने छोटे भाई को भी साथ ले जाना चाहती थी। असल में उसका छोटा भाई का ट्यूशन सेन्टर रास्ते में ही पड़ता है। छोटे भाई के साथ जाने से मना कर देने पर अपनी स्कूटी से ट्यूशन के लिए निकल गई। उन्होंने बताया कि सायं 7.30 बजे के करीब उन्हें किसी ने फोन कर बताया कि  ईशा  की तबीयत खराब है और वह राधाकृष्ण चिकित्सालय में भर्ती है। वह चिकित्सालय में पहुंचे, उनकी  ईशा  से बात नहीं हो सकी क्योंकि वह गंभीर हालत में थी तथा थोड़ी ही देर बाद उसकी मौत हो गई। कलवार ने बताया कि केन्द्रीय विद्यालय में मानसिक तौर पर प्रताडि़त किए जाने के बारे में  ईशा  ने उन्हें बताया था। कलवार के अुनसार केंद्रीय विद्यालय में छोटी-छोटी बातों पर सबके सामने प्रताडि़त किया जा रहा था।
गार्गी के पिता जगदीश  दूबे ने बताया कि गार्गी लगभग 3.45 बजे अपनी स्कूटी से ट्यूशन के लिए घर से गई थी। उन्हें 8 बजे गार्गी के अस्पताल में भर्ती होने की सूचना मिली थी। उन्होंने बताया कि गार्गी पढाई में होशियार थी तथा वह आत्महत्या नहीं कर सकती है। उधर अक्षिता के पिता बसंत सोनी का कहना है कि अक्षिता पढ़ाई में कमजोर नहीं थी। 10वीं बोर्ड में 82 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। बसंत सोनी ने केन्द्रीय के विद्यालय के अध्यापको पर छात्राओं पर दबाव बनाने के आरोप लगाए है।
14 नवम्बर सोमवार को गार्गी,  ईशा, अक्षिता व प्राची बावजीनगर में आर.के. अवस्थी के वहां ट्यूशन गई थी। उसके बाद वहां से सूर्यप्रकाश श्रीवास्तव के यहां ट्यूशन गई। यह दोनों ट्यूशन बावजीनगर में ही है। उसके बाद चारों युग शक्ति कोचिंग सेन्टर के लिए रवाना हुई, जो कि कोटा रोड़ पर स्थित है। वहां ट्यूशन समय 6.30 से 7.30 बजे तक का था। बायोलोजी की ट्यूशन के बाद युग शक्ति कोचिंग पर ट्यूशन के बीच उन्हें 30 मिनिट का समय मिलता था। बायोलोजी की ट्यूशन के बाद वह कोटा रोड़ स्थित युग शक्ति कोचिंग सेन्टर पर ट्यूशन के लिए जा रही थी। बावजीनगर में गार्गी का घर है। अकसर बायोलोजी की ट्यूशन से निकलने के बाद चारों गार्गी के घर होते हुए जाती थी। उस रोज गार्गी,  ईशा व अक्षिता घर से कुछ दूर रूकी जहां से प्राची गार्गी के घर पानी लेने गई। प्रार्ची पानी लेकर आई और सभी ने पानी पिया। अधिक पानी पीने पर प्रार्ची ने गार्गी,  ईशा व अक्षिता टोका भी था।
यहां से गार्गी की स्कूटी पर प्रार्ची व  ईशा की स्कूटी पर अक्षिता सवार होकर रवाना हुई। गार्गी स्कूली को तेज गति से चलाकर आगे निकल गई।  ईशा व अक्षिता पीछे रह गई जो रेल्वे स्टेशन के पास स्थित रेल्वे कालोनी में उल्टियां करने लगी।  ईशा की तबीयत ज्यादा बिगड़ गई थी, अक्षिता ने अंकित नाम के सहपाठी को काॅल किया। कुछ देर बाद अंकित वहां पहूंचा और उन्हें नजदीकी राधाकृष्ण मेमोरियल अस्पताल में भर्ती कराया। यहां ईलाज के रुपए भी अंकित ने ही दिए। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार अस्पताल में कई स्कूली छात्र इक्कट्ठे हुए थे।
दूसरी तरफ गार्गी तेज गति से स्कूटी चलाकर आगे निकल कर चैथे माता के मंदीर गई, वहां से दर्शन कर लौटते समय उसकी तबीयत बिगड़ गई और वह रास्ते में उल्टियां करने लगी। उसके साथ प्रार्ची थी। गार्गी की तबीयत बिगड़ती देख प्रार्ची घबरा गई और उसने अपने भाई को काॅल किया। उसका भाई वहां पहुंचा और गार्गी के घर वालों को काॅल कर सूचना दी।
मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार छात्राओं ने मृत्यु से 3 घंटे पूर्व सेल्फोस जहर खाया। तीनो की मौत सायं 9 बजे से 10 बजे के बीच हुई। संभवतः छात्राओं ने बायो की ट्यूशन के बाद वहां से युग शक्ति कोचिंग सेन्टर में जाते समय 6.30 से 7.00 बजे के बीच जहर खाया होगा।
इस पूरे मामले पर प्रार्ची से बात नहीं हो पाई है, वहीं प्राची के घर वालों ने भी महज इतना ही बताया कि प्रार्ची पिछले 7-8 दिनों से बिमार थी इसलिए स्कूल नहीं जा रही थी। गार्गी के पिता अनिल अग्रवाल ने बताया कि गार्गी की तबीयत खराब है तथा उसका ईलाज करवाया जा रहा है। वह इस घटना से बहुत डरी हुई है। जबकि 22 नवम्बर को अग्रवाल म्यूजिक शाॅप पर अनिल अग्रवाल अपने एक रिष्तेदार को यह बता रहे थे कि पुलिस गार्गी को परेशान ना करे इसलिए उसे बूंदी में रिष्तेदारों के यहां रखा है। उसकी तबीयत ठीक है।
केन्द्रीय विद्यालय के अध्यापक सूर्यप्रकाष श्रीवास्तव व आर.के. अवस्थी विद्यालय में पढ़ाने के साथ किराए के कमरे में ट्यूषन भी पढ़ाते थे। छात्राओं के परिजनों ने पुलिस को बताया कि दोनों अध्यापक उनकी लड़कियों को मानसिक प्रताड़नाएं देते थे। दिपावली अवकाष के दौरान प्रोजेक्ट बनाने के लिए छात्रों को 100 बल्ब की सीरीज लाने को कहा था, लड़कियों को 70 बल्ब की सीरीज ही मिल पाई तो अध्यापक ने इसे लेने से मना करते हुए फटकार लगाई, तब लड़कियों ने घर वालों को बताया आखिर 100 बल्ब की सीरीज लाकर देनी पड़ी। 14 नवम्बर को पुलिस ने दोनों अध्यापकों व युग शक्ति कोचिंग के संचालक उमेष सोनी को हिरासत में लेकर पूछताछ भी की थी। (उमेष सोनी, रितेष जैन और प्राची ने क्या बताया ?)
18 नवम्बर को विभाग के डिप्टी कमीषनर (जयपुर) ने केंद्रीय विद्यालय में पहूंचकर अध्यापको के खिलाफ मिली षिकायतों की जांच कर उनका तबादला कर दिया। आर.के. अवस्थी का पोकरण व सूर्यप्रकाष श्रीवास्तव का तबादला सूरतगढ़ कर दिया।  
पुलिस को अक्षिता के पास एक सुसाइड नोट मिला था, जिस पर तीनों छात्राओं ने अपनी इच्छा से मरने की जानकारी देते हुए किसी को भी परेषान नहीं करने की बात लिखी थी। तीनों के हस्ताक्षर पर सुसाइड नोट पर पाए गए। सुसाइड नोट में सभी ने एक ही बात लिखी। नोट पर तीनों के हस्ताक्षर पाए गए। 
दूसरी ओर छात्राओं के परिजनों का कहना है कि उनकी बेटियां लेखन कार्य इंगलिष में करती थी। जबकि सुसाइड़ नोट हिन्दी में लिखा हुआ है जो कि गले नहीं उतर रहा। 15 नवम्बर को परिजनों ने सुसाइड नोट की फोरेसिंक जांच की मांग की थी। सुसाइड नोट पर पाए गए हस्ताक्षरों व हेण्डराइटिंग की फोरेसिंक जांच करवाई गई या नहीं इसकी सूचना भी पुलिस से उजागर नहीं की है।
14 से 17 नवम्बर तक 3 उपाधीक्षक व 3 थानाप्रभारी की अलग-अलग टीमों के साथ तफ्तीष कर रहे थे। तब तक पुलिस को छात्राओं की मौतों के संदर्भ में पढ़ाई के दबाव के अलावा कुछ भी हाथ नहीं लगा। पुलिस ने कंेद्रीय विद्यालय के अध्यापकों, मृतकों की सहेलियों, सहपाठियों व उनके परिजनो से जानकारी लेकर तथ्य जुटाए थे। मृतकाओं के मोबाइल की काॅल डिटेल भी निकाली गई। 21 नवम्बर को अनुसंधान अधिकारी उपाधीक्षक खेमराज खोलिया के सुपरविजन में दो नए सब इंसपेक्टर समेत 4 सदस्यीय टीम का पुनर्गठन किया गया। 23 नवम्बर को पुलिस महानिरीक्षक आर.पी. सिंह ने फिर जांच अधिकारी बदले। कुल मिलाकर पुलिस अधिकारी बदलने के अलावा कुछ नहीं कर रही है।
18 नवम्बर को सांसद दुष्यंत सिंह मृतकाओं के परिजनों से मिले और मामले के बारे मंे पुलिस प्रषासन से जानकारी ली। उन्होंने इस मामले को संसद में उठाने की बात कही। 19 नवम्बर को पूर्व मंत्री प्रमोद जैन भाया ने मृतकाओं के परिजनों से मिले और निष्पक्ष कार्यवाही करवाने का आष्वासन दिया।
ईषा कलवार के परिजनों ने मुख्यमंत्री, गृहमंत्री, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष व कांगे्रस प्रदेषाध्यक्ष को ज्ञापन प्रेषित कर मामले की जांच करवाने की मांग की। कलवार ने अध्यापकों पर छात्राओं को प्रताडि़त करने के आरोप लगाए।पुलिस जहां छात्राओं की मौतों को आत्महत्या मान रही है वहीं शहर की जनता इन मौतों के पीछे बड़े घरानों के रईस बेटों का हाथ मान रही है। हर जगह 4 लड़कों की बात सामने आ रही है। पुलिस वाले भी दबी आवाज में बता रहे है कि बड़े लोगों की वजह से आखिर कौन है वो चार लड़के ? ना तो पुलिस इस बारे में कुछ बता रही है ना ही मीडिया के भी कोई खास सबूत हाथ लग पाए है। बहरहाल शहर की जनता का मानना है कि तीनों छात्राओं की मौतों के पीछे गहरा राज है। वहीं मृतक छात्राओं के परिजन लगातार मामले के खुलासे की मांग कर रहे है। फिलहाल जांच पूरी हो चूकी है। पुलिस ने जांच पूरी कर इस मामले को आत्महत्या का मामला बताया है। जो लोगों के गले नहीं उतर रहा है।

Tuesday, January 17, 2012

जसविन्दर सिंह साबी ने संस्था के खिलाफ रची साजिश

19 नवम्बर को एक टीवी चैनल पर दूसरा दशक परियोजना (बारां जिले के भंवरगढ़ गाँव में)में आवासीय कैम्प में पढ़ रही छात्राओं के साथ अश्लीलता करने का मामला प्रसारित हुआ। दूसरा दशक परियोजना के बारे में प्रसारित इस समाचार पर यकायक विश्वास नहीं हुआ लेकिन एक प्रमुख समाचार टीवी चैनल पर खबर प्रसारित होने से विश्वास करना पड़ा। लेकिन मन नहीं मान रहा था कि दूसरा दशक परियोजना जैसी संस्था में ऐसे कृत्य भी हो सकते है, मामला गंभीर था सो हाड़ौती मीडिया रिसोर्स सेंटर के साथियों से चर्चा की एवं मामले की फैक्ट फाइंडिंग करने का तय किया। 21 दिसम्बर को महज एक दिन के कुछ घंटों की फैक्ट फाइंडिंग में ही ऐसे तथ्य उभर कर सामने आए जो टीवी चेनल पर दिखाई गई खबर के बिलकुल विपरीत थे I
19 दिसम्बर को एक टीवी चैनल पर खबर प्रसारित हुई थी कि एक गैर सरकारी संगठन दूसरा दशक परियोजना में पढ़ रही लड़कियों के साथ अश्लीलता की जाती है। खबरिया चैनल के अनुसार दूसरा दशक परियोजना में आयोजित आवासीय कैम्प में पढ़ रही छात्राओं की वहा की अध्यापिकाओं द्वारा नंगी तस्वीरें खिंची जा रही है तथा मोबाईल में अश्लील फिल्म दिखाई जाती है। टीवी पर 4 नवम्बर से 17 नवम्बर तक आवासीय कैम्प में रहकर गई दो लड़कियों व उनकी माताओं के कथनों को प्रसारित किया गया। वो दो लड़कियां व उनकी माताएं दूसरा दशक परियोजना के कार्यकर्ताओं पर अश्लील चित्र दिखाने व नचाने का आरोप लगा रही थी।
20 दिसम्बर को दूसरा दशक परियोजना के 6 कार्यकर्ताओं के खिलाफ भंवरगढ़ थाने में 354, 294 व एससी/एसीटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा (3) के तहत मामला दर्ज कर कार्यवाही आरंभ की गई। एससी/एसटी सेल के उपाधीक्षक कल्याणमल बंजारा द्वारा जांच की जा रही है.
एचएमआरसी द्वारा की गई फैक्ट फाइंडिंग के अनुसार संस्था में चल रहे कैम्प में 4 नवम्बर को गणेषपुरा गांव की 2 लड़कियों को जोड़ा गया था। लड़कियां कैम्प में पढ़ाई कर रही थी। 17 नवम्बर को अचानक उन दोनों लड़कियों की माताएं चिल्लाते हुए संस्था में आई और संस्था द्वारा बंधुआ मजदूरों को मुक्त करवाकर उन्हें बेरोजगार करवा देने का उलाहना देते हुए अपनी बेटियों को ले जाने लगी। संस्था के निदेशक मोतीलाल ने बताया कि उन्होंने लड़कियों की माताओं को खूब समझाया लेकिन वो नहीं मानी और अपनी बेटियों को लेकर चली गई। उस दिन दूसरा दशक परियोजना की बीआरपीएम की बैठक के लिए संस्था के सभी फिल्ड कार्यकर्ता भी आए हुए थे। बैठक में आए कार्यकर्ताओं में से करीबन आधा दर्जन कार्यकर्ताओं ने इस बात की पुष्टि की है। वर्तमान में संस्था में आवासीय कैम्प में पढ़ रही छात्राओं के अनुसार इस दौरान कैम्प में अश्लीलता नहीं की जाती है.
17 नवम्बर को हुई इस घटना के बाद 17 दिसम्बर को एक काले रंग की गाड़ी केलवाड़ा क्षेत्र के कुछ गांवों में घूमती रही। इस गाड़ी में सवार दो औहदेदार युवक कालीमाटी गांव में गए। कालीमाटी की 4 सहरिया महिलाओं सहित 5-7 स्कूली छात्रों के अनुसार काले रंग की गाड़ी में आए एक युवक ने उन्हें कहा कि भंवरगढ़ में संचालित दूसरा दशक परियोजना में पढ़ रही गांव की लड़कियों के कपड़े खोलकर उन्हें नचाया जा रहा है तथा उनकी तस्वीरें खींच कर विदेश में भेजी जा रही है. उस युवक ने कहा कि अगर गांव की जो लडकियां  दूसरा दशक परियोजना में पढ़ रही है उन्हें गांव ले आओगे तथा जो मैं कहूंगा वैसा कहलवा दोगे तो   उन्हें सरकार से डेढ़ लाख रुपए दिलवाउंगा। कालीमाटी की महिलाओं व स्कूली बच्चों ने बताया कि वे दो सरदार थे तथा उनके साथ एक आदमी था जो माधोपुरा का रहने वाला है। जिसका नाम विरमा सहरिया है.
संस्था के खिलाफ भड़काने वाले सरदार की बातों पर विष्वास कर कालीमाटी गांव की दो महिलाएं भंवरगढ़ स्थित संस्था में पढ़ रही अपनी लड़कियों को लेने के लिए भी गई। उनकी लड़कियों ने किसी प्रकार की अश्लीलता नहीं होने की बात कही। वो दोनों महिलाएं रात भर संस्था में ही रूकी। उन्होंने बताया कि गांव में आकर संस्था के खिलाफ बातें बताने वाले सरदारों की बातें झूठी थी।
विजिटर बनकर गया साबी और की संस्था की विडियां  रिकार्डिंग
एचएमआरसी रिपोर्ट के अनुसार 19दिसम्बर को गणेशपुरा का जसविन्दर सिंह साबी भंवरगढ़ के तेजाजी के डांडा स्थित दूसरा दषक परियोजना के कार्यालय में विजिटर बनकर गया और संस्था के कार्यकर्ता विश्वजीत सरकार से संस्था व संस्था के कार्यों की जानकारी ली। जानकारी लेते हुए वह संस्था के कार्यों की प्रशंशा करता रहा और संस्था भवन के हॉल व कमरों की विडि़योंग्राफी भी की। 19 दिसम्बर शाम को ईटीवी राजस्थान न्यूज चैनल पर दूसरा दशक परियोजना के कार्यकर्ताओं द्वारा सहरिया लड़कियों के साथ अश्लीलता की खबर प्रसारित हुई। ईटीवी राजस्थान न्यूज चैनल पर दिखाए गए विडियो फूटेज में संस्था के भवन को भी दिखाया। उन फुटेज में विश्वजीत सरकार भी नजर आया। वो फुटेज वहीं थी जो जसविन्दर सिंह साबी ने संस्था के विजिट के दौरान ली थी।
सहरिया महिलाओं ने टीवी पत्रकार को बताई असलियत, लेकिन टीवी पत्रकार ने दबा दिया मामला
20 दिसम्बर को भंवरगढ़ पुलिस ने संस्था के निदेशक मोतीलाल सहित 5 कार्यकर्ताओं के खिलाफ 354, 294 व एससी/एसीटी अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा (3) के तहत मामला दर्ज कर कार्यवाही आरंभ की। इससे पूर्व एसपी व कलक्टर ने भी भंवरगढ़ पहुंच कर मामले की जानकारी ली। रिपोर्ट के अनुसार 20 दिसम्बर को टीवी पत्रकार (जिस टीवी चैनल पर पूर्व में खबर प्रसारित हुई थी का संवाददाता) भी वहां पहुंचा था, उसने संस्था के लोगों के साथ कालीमाटी गांव की उन महिलाओं की बाइट भी ली थी। उन महिलाओं ने साफ-साफ बताया था कि एक युवक गांव में आया था और संस्था में लड़कियों के साथ  अश्लीलता होने की झूठी जानकारी दी थी। उन्होंने टीवी पत्रकार को बताया कि उस युवक ने लड़कियों को संस्था से ले आने व उनसे उसकी मुताबिक कहलवाने पर सरकार से डेढ़ लाख दिलवाने का प्रलोभन भी दिया था। महिलाओं की बाइट लेने के बावजूद उनका प्रसारण नहीं किया गया अगर प्रसारण किया जाता तो वास्तविकता उसी दिन जनता के सामने आ गई होती। एचएमआरसी द्वारा मीडिया में जारी फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट में बताया गया कि दूसरा दशक परियोजना द्वारा शिक्षा के साथ-साथ आदिवासी समुदाय के उत्थान के लिए कार्य किए गए है। क्षेत्र की समस्याओं के संदर्भ में हर स्तर पर पैरवी का काम किया है, फिर चाहे मुख्यमंत्री से मिलना पड़ा हो या राहूल गांधी से। ग्राम पंचायतों में भ्रष्टाचार को समाप्त करने व महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के क्रियान्वयन पर नजर के साथ गांवों के हर वर्ग के वंचित व्यक्ति को सरकार की जन कल्याणकारी योजनाओ का लाभ दिलवाने के पूरा प्रयत्न किया है। पिछले वर्ष बंधुआ मजदूरों को जमींदारों से यहां से छुडवाने के लिए प्रयास किए और करीबन 146 बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराया। दूसरा दषक परियोजना एक दषक से अधिक समय से भंवरगढ़ के तेजाजी के डांडे पर संचालित है। दूसरा दशक परियोजना के निदेशक ने बताया कि संस्था में शिक्षा से वंचित बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ने के लिए आवासीय कैम्प आयोजित किए जाते है। क्षेत्र की शिक्षा से वंचित बालिकाओं को शिक्षा के प्रति प्रेरित कर उन्हें कैम्प में शामिल किया जाता है। चार माह के इन आवासीय कैम्पों में बालिकाओं को अध्यापिकाओं द्वारा शिक्षा दी जाती है। दूसरा दषक परियोजना (भंवरगढ़) में प्रति वर्ष 3-4 आवासीय कैम्प आयोजित किए जाते है, जिनमें से एक कैम्प के लिए सरकार से पैसा आता है। इसके अलावा संस्था ने कभी सरकार से कोई फण्ड नहीं लिया। अब तक सैकड़ों लड़कियां इनके आवासीय कैम्पों में शिक्षित हुई है। संस्था द्वारा वन भूमि अधिकार अधिनियम के तहत पट्टे दिलवाने, दबंगों के कब्जे से सहरियाओं की जमीनें छुडवाने जैसे कार्य करवाए, महानरेगा में 100 की बजाए 200 दिन का रोजगार मुहैया करवाने के लिए सरकार से मांग की तथा लगातार पैरवी की , महानरेगा में मजदूरी की दर बढ़ाने तथा भ्रष्टाचार की खिलाफत करते हुए बंधुआ मजदूरी कर रहे लोगों को मुक्त कराने जैसे कई कार्य किए गए, संस्था के कार्यों से एक वर्ग विशेष काफी नाराज है, संस्था के कार्यकर्ताओं को कई बार धमकियां भी दी गई।
आवासीय केम्प में पढ़ रही अन्य छात्राओं ने आरोपों को गलत बताया
एचएमआरसी के लोगों ने संस्था में अश्लीलता   करने के बारे में पूर्व में आयोजित आवासीय कैम्पों मे पढ़ चुकी लड़कियों व वर्तमान में कैम्प में पढ़ रही लड़कियों से सम्पर्क किया। लड़कियों ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए बताया कि संस्था में ऐसी कोई हरकत नहीं होती है। करीबन 8 गांवों की उन लड़कियों से सम्पर्क साधा गया जो पूर्व में इस संस्था के आवासीय कैम्पों में रही है। उनमें में से एक ने भी संस्था में अश्लीलता   के बारे में नहीं बताया और ना ही अन्य किसी प्रकार की शिकायत की। वर्तमान में दूसरा दशक परियोजना के आवासीय कैम्प में 47 लड़कियां अध्ययनरत है। उन लड़कियों में से एक भी लड़की संस्था के कार्यकर्ताओं द्वारा अष्लील फिल्म दिखाने व नंगा करके नचाने या अष्लील हरकतें करने के आरोपों को सही नहीं ठहराती है। वो कहती है कि संस्था में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता, संस्कार सिखाए जाते है। अश्लीलता   का आरोप लगा रही छात्राओं के परिजनों द्वारा 4 नवम्बर को लड़कियों को आवासीय कैम्प में भेजना और 17 नवम्बर को अचानक आकर संस्था से लड़कियों को वापस ले जाना और फिर 19 दिसम्बर को संस्था के कार्यकर्ताओं पर अश्लीलता   का आरोप लगाना तथा टीवी पत्रकार द्वारा हकीकत को दबाना. . . काफी उलझी हुई कहानी है, जिसका पर्दाफाशशीघ्र होना अत्यन्त आवश्यक है। बहरहाल पुलिस जांच कर रही है वहीं दूसरा दशक परियोजना में संस्था को चाहने वाले सहरिया समुदाय के लोगों का तांता लगा हुआ है।
निदेशक मोतीलाल का कहना है कि ‘‘हमारे खिलाफ साजिश रची गई है, जो पूरी तरह से जनता के सामने आ चुकी है। जसविन्दर सिंह साबी ने संस्था को बदनाम करने के लिए साजिश रची है लेकिन पुलिस जांच में सच्चाई सामने आ जाएगी।’’
आखिर जसविन्दर सिंह साबी ने संस्था के खिलाफ क्यों साजिश रची
जसविन्दर सिंह साबी
यह तो साफ हो चुका है कि कालीमाटी गए दो सरदार युवकों में जसविन्दर सिंह साबी था। सबसे बड़ा सवाल उठता है कि जसविन्दर सिंह साबी ने ऐसा क्यों किया ? क्यों कालीमाटी गांव की महिलाओं को उकसाया ? क्यों दूसरा दशक परियोजना कार्यालय में जाकर विडियोग्राफी ? उल्लेखनीय है कि गत वर्ष दूसरा दशक परियोजना, जाग्रत महिला संगठन व संकल्प संस्था के कार्यकर्ताओं ने क्षेत्र में व्याप्त बंधुआ मजदूरी को समाप्त करने के लिए मुहिम छेड़ी थी। संस्था द्वारा पीडि़त बंधुआ मजदूरों की मदद की गई। उन्हें बंधुआ मजदूरी से मुक्त कराने के लिए राज्य सरकार तक अपील की। बंधुआ मजदूरी का मुद्दा उठाए जाने के बाद राष्ट्रीय सलाहकार परिषद के संयुक्त सचिव के.राजू एवं परिषद की अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के निजी सचिव धीरज श्रीवास्तव ने क्षेत्र का दौरा कर मुख्यमंत्री से चर्चा की थी। परिणाम स्वरूप राज्य के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने क्षेत्र का दौरा किया और बंधुआ मजदूरों को आजाद करवाने व उनके पुर्नवास की घोषणा भी की। जसविन्दर सिंह साबी के परिवार व रिश्तेदारों के यहां भी सहरिया समुदाय के लोगों से बंधुआ मजदूरी करवाई जा रही थी। संस्था के प्रयासों से उनके यहां काम कर रहे बंधुआ मजदूर न सिर्फ मुक्त हुए बल्कि बंधुआ मजदूरी करवाने वालों के खिलाफ मामले भी दर्ज हुए। जिनकी कार्यवाही अभी भी चल रही है। कईयों के खिलाफ फैसले आए है। इन्हीं कारणों के चलते संस्था के खिलाफ दुष्प्रचार कर व लोगों को बरगलाकर संस्था के कार्यकर्ताओं को फसाया जा रहा है। जिन दो बालिकाओं व उनके परिजनों ने संस्था के कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाए है, वो गणेशपुरा की रहने वाली है। जसविन्दर सिंह साबी भी गणेशपुरा का ही रहने वाला है। अंदेशा है कि  है कि कालीमाटी गांव में लोगों को संस्था के खिलाफ भड़काने वाले जसविन्दर सिंह साबी ने गणेशपुरा के लोगो को भी भड़काया हो।
अंत में प्रसिद्ध कवि राजेश जोशी की कविता -
सबसे बड़ा अपराध है
आज के समय में निरपराध होना
जो अपराधी नहीं है वो मारे जाएंगे ।…….  

Monday, January 16, 2012

स्वच्छ परियोजना की स्वच्छता पर सवालिया निशान

लखन सालवी 

बारां जिले के आदिवासियों के साथ छलावा हो रहा है। इस जिले के आदिवासी क्षेत्र किशनगंज व शाहबाद में सहरिया आदिवासी समुदाय को चिकित्सा, शिक्षा, पोषण, रोजगार, आवास तथा खाद्य सुरक्षा संबंधी लाभ देने के लिए सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। लेकिन इस समुदाय को इस पैसे का लाभ नहीं मिल पा रहा है। 
सरकार ने सहरिया समुदाय के विकास के लिए सहरिया परियोजना 1977-78 से संचालित की है। इस परियोजना के द्वारा आदिवासी समुदाय के विकास की परिकल्पना की जा रही है। इस परियोजना के माध्यम से आदिवासी समुदाय के बच्चों की शिक्षा के स्तर व पोषण स्तर को बढ़ाने के साथ-साथ समुदाय के लोगों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने के लिए कृषि, उघोग इत्यादि हेतु ऋण की योजनाएं संचालित की जा रही है। इसी परियोजना के अंतर्गत सहरिया समुदाय के लोगों के लिए आवास भी बनाए जा रहे है। पूर्व ये आवास परियोजना द्वारा ही बनवाए जाते थे। लेकिन पिछले कुछ सालों से स्वच्छ परियोजना के द्वारा आवासों का निर्माण करवाया जा रहा है तथा सहरिया समुदाय के बच्चों की  शिक्षा  व पोषण के स्तर को बढ़ाने के लिए भी स्वच्छ परियोजना ही कार्यकारी ऐजेन्सी है। 
लेकिन सहरिया परियोजना द्वारा करवाए जा रहे विकास का पूरा लाभ इस समुदाय के लोगों को नहीं मिल पा रहा है। सहरिया समुदाय के लिए इस परियोजनान्तर्गत बनवाए जा रहे आवासों की स्थिति की जानकारी लेने मात्र से इस परियोजना द्वारा करवाए जा रहे विकास कार्यों से सहरियाओं को मिले लाभ की स्थिति स्पष्ट हो रही है।  
सहरिया आवास योजना के तहत सहरिया समुदाय के गरीब परिवारों का चयन कर महिला चिन्हित कर उनके लिए आवासीय मकानों को निर्माण करवा जाता है। योजनान्तर्गत गांव के आस-पास एक कालोनी बनाई जाती है।  किशनगंज व शाहबाद क्षेत्र के लिए हर वर्ष करीबन 500 आवासों की स्वीकृति दी जाती है। लेकिन आवास ना तो गुणवत्तापूर्ण बनाए जा रहे है ना ही समय पर। यूं तो अब तक हजारों सहरिया आवास स्वीकृत हो चुके है। लेकिन निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ है। अधिकतर आवास घटिया निर्माण के कारण क्षतिग्रस्त हो चुके है। क्षेत्र में कार्य कर रहे हाड़ौती मीडिया रिेसोर्स सेन्टर द्वारा सूचना के अधिकार के तहत सूचना ली तथा इसके मीडिया फैलो ने वर्ष 2008-09 में स्वीकृत हुए आवासों की स्थिति का अध्ययन किया तो चोंकाने वाले परिणाम सामने आए। 
सर्वे रिपोर्ट के अनुसार  किशनगंज  व शाहबाद ब्लाक में वर्ष 2008-09 में 523 सहरिया आवास स्वीकृत हुए। जिनमें से अब तक 188 सहरिया आवासों का ही निर्माण कार्य पूरा हो पाया है। अध्ययन के अनुसार  किशनगंज  में स्वीकृत हुए 299 सहरिया आवासों में से 146 आवासों का निर्माण ही पूरा हो पाया है। 153 आवासों का निर्माण कार्य अधर झूल में है। इनमें भी 61 आवासों पर छतें नहीं डली है, 121 आवासों के खिड़की व दरवाजें नहीं लगे है तथा प्लास्टर भी नहीं हुआ है। 
इसी प्रकार शाहबाद ब्लाक में स्वीकृत हुए 224 आवासों में से महज 42 आवासों का निर्माण कार्य पूरा हो पाया है। यहां 182 आवासों का काम अधूरा पड़ा है। इनमें से 65 आवासों पर छतें नहीं डली है, 80 आवासों के खिड़की व दरवाजें नहीं लगे है तथा 42 आवासों  में  प्लास्टर नहीं किया गया है। 
इन आवासों के निर्माण में लाभार्थी के परिवारजनों से भी काम करवाया गया है। लेकिन उन्हें मेहनताने का भुगतान नहीं किया गया है।  किशनगंज  ब्लाक के कुण्दा, रणवासी, गीगचा सहित दर्जन भर गांवों के सहरिया लोगों ने बताया कि उनसे आवास निर्माण में काम किया लेकिन उन्हें भुगतान नहीं किया गया। साथ ही आवास में खिड़की व दरवाजे के लिए लगाई फर्सी के टुकड़े मंगवाने के लिए किराया व उतारने चढ़ाने के लिए हमालों को भी लाभार्थियों द्वारा ही भुगतान किया गया। 
नया गांव व लक्ष्मीपुरा  में  10-10 आवास निर्माणाधीन है। लाभार्थियाओं ने बताया कि पिछले एक साल से निर्माण कार्य चल रहा है। लेकिन अभी तक निर्माण कार्य पूरा नहीं हुआ है। इन आवासों के निर्माण में लाभार्थियाओं के परिवार के दो सदस्यों ने काम किया था। लेकिन इन्हें 1000-1000 रुपए काटकर भुगतान किया गया। आवास  में  बनाई जा रही आलमारी में फर्सी के दो फीट लम्बे टुकड़े लगाने की एवज में ये रुपए काटे जा रहे है। गड़ेपान गांव में बने सहरिया आवासों के निर्माण में लाभार्थियाओं के परिवार जनों ने नींव खोदने से लेकर छत डलने तक काम किया लेकिन उन्हें भुगतान नहीं किया गया। 
ये स्थिति तो है वर्ष 2008-09 यानि की 2 साल पहले स्वीकृत हुए आवासों की। वर्ष 2009-10 व 2010-11 में स्वीकृत हुए सहरिया आवास तो अभी कागजों से ही बाहर नहीं निकल पाए है। 
सहरिया आवास के निर्माण के लिए प्रत्येक हेतु 87250 रुपए स्वीकृत हुए थे। अगर ये आवास उसी वर्ष में बन जाते तो कम लागत में गुणवत्ता वाले आवास बनते। लेकिन कार्य समय पर नहीं करवाया गया जिससे महंगाई की मार सहरिया आवासों पर पड़ रही है। सिमेंट, लोहा, बजरी, पत्थर आदी के भाव बढ़ने के कारण लागत राशि बढ़ गई है आलम ये है कि गुणवत्ता वाले आवास नहीं बन पा रहे है। कारण जो भी रहे लेकिन यह तो स्पष्ट है कि सहरियाओं के साथ विकास योजनाओं के नाम पर छलावा हो रहा है। शाहबाद ब्लाक के मुंडियर गांव  में  सहरिया आवासों का निर्माण हुए एक साल से अधिक हो गया है लेकिन उनमें एक भी परिवार रहने नहीं गया है। सहरिया लोगों का कहना है कि हम मौत के मुंह में नहीं जाना चाहते, वे आवास कभी भी ढ़ह सकते है। 
सहरिया आवासों की गुणवत्ता इस बात से स्पष्ट होती है कि अतिवृष्टि में क्षतिग्रस्त हुए मकानों  में  सहरियाओं की झौपडि़यों व कच्चें मकानों के बाद सर्वाधित सहरिया आवास ही थे। पक्के सहरिया आवास क्यूं ढ़हे ? यह भी जानने की कोशीश की गई तो पाया कि सहरिया आवासों निर्माण में दिवारों से भी अंदर की ओर छत डाली गई। छतें दिवारों से एक इंच भी बाहर रखने की बजाए और अंदर की तरफ ही डाली गई। जिससे बारिस का पानी छत से सीधा जमीन पर गिरने की बजाए आवास की दिवारों में जाता है। जिससे कमजोर दिवारें गिली होकर धराशायी हो गई। 
शाहबाद के मामोनी गांव  में  आवास स्वीकृति के दो साल बाद अब निर्माण कार्य आरंभ करवाया जा रहा है। ऐसे में महंगाई की मार लाभार्थियाओं पर पड़ती नजर आ रही है। 
सरकार सहरिया आवास निर्माण सरकारी संगठन स्वच्छ परियोजना द्वारा करवा रही है। प्रत्येक आवास हेतु 87250 रुपए स्वीकृत हुए थे, बावजूद इन आवासों की स्थिति इंदिरा आवास योजना के तहत बने आवासों से भी खराब है। 
खैर सहरिया आवासों के निर्माण में देरी व घटिया निर्माण के पीछे कारण जो भी हो लेकिन सहरिया समुदाय के लोगों के साथ तो छलावा ही हो रहा है। 


फोटों केप्सन -
1. किशनगंज के लक्ष्मीपुरा में अधूरे पड़े सहरिया आवास, यहां एक साल से काम बंद है। 
2. नयागांव में निर्माणाधीन सहरिया आवास, इनका निर्माण कार्य एक साल से जारी है। 

Saturday, January 14, 2012

ये कैसा विकास: आदिवासी क्षेत्रों की उपेक्षा

नहीं मिल रही मूलभूत सुविधाएं, अनियमितताओं का अंबार


लखन सालवी। 
बारां जिले के आदिम जनजाति सहरिया बाहुल्य क्षेत्र शाहबाद के गांवों में आज भी मूलभूत सुविधाओं का टोटा है। हाल ही में देश की आजादी के 65वें वर्ष की वर्षगांठ को बड़े हर्षोल्लास से मनाया गया है, साइनिंग इंडिया कहा जा रहा है। दूसरी ओर इस अंचल के आदिवासी लोग शिक्षा व स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहा  रहे है। ऐसा ही नजारा देखने को मिला है, खुशालपुरा व शुभधरा गांव में। यहां की मां बाड़ी में छात्रों को पाठ्य पुस्तकें नहीं दी गई है, यहां का आंगनबाड़ी केंद्र बंद रहता है, प्राथमिक विद्यालय के 101 बच्चें एक अध्यापक के भरोसे है। एएनएम भवन है, लेकिन वो एएनएम के बिना रीता पड़ा है। जबकि ये दोनों गांव शाहबाद मुख्यालय से महज क्रमशः 3 व 5 किलोमीटर की दूरी पर है स्थित है।

बंद आंगनबाड़ी, इंतजार करते बच्चें 
17 अगस्त को  खुशालपुरा  का आंगनबाड़ी केंद्र बंद था। केंद्र के बाहर आदिवासी बच्चें हाथों में बर्तन लिए बैठे थे, वो पोषाहार के लिए आए थे। लेकिन ना तो कार्यकर्ता रामप्यारी नामदेव आई और ना ही सहायिका कपूरी बाई। ग्रामीणों ने बताया कि कार्यकर्ता नियमित केंद्र पर नहीं आती है। सहायिका कपूरी बाई सहरिया इसी गांव की है लेकिन वो भी केंद्र को नहीं खोल रही है। कपूरी बाई आजकल कृषि कार्य में लग हुई है। आशा सहयोगिन मीना देवी कई माह से  केंद्र  पर नहीं आ रही है। बच्चें पोषाहार के लिए केंद्र पर आते है लेकिन निराश होकर वापस लौट जाते है। अगर केंद्र नियमित खुले और कार्यकर्ता व सहायिका जिम्मेदारी व लगन से कार्य करती तो इन आदिवासी बच्चों को पोषाहार मिलता और साथ ही वो दो अक्षर बोलना भी सीख जाते। बहरहाल ऐसा नहीं हो रहा है।

स्टाफ की मांग करते ग्रामीण
इसी गांव के राजकीय प्राथमिक विद्यालय के अध्यापकों द्वारा भी मनमर्जी की जा रही है। वो समय पर नहीं आते है। इस विद्यालय में 3 शिक्षकनियुक्त है। 2 अध्यापक है व 1 अध्यापिका। लेकिन महज एक अध्यापक नारायण लाल सहरिया ही नियमित विद्यालय आ रहा है। जानकारी के अनुसार प्रधानाध्यापक मुकेश वैष्णव को सत्र आरंभ होने के पूर्व से ही बाढ़ नियंत्रण के कार्य के लिए तहसील कार्यालय में लगा रखा है। वहीं कार्यवाहक प्रधानाध्यापिका शमीम बानू नियमित विद्यालय नहीं आ रही है। 17 अगस्त को वह बिना सूचना के अनुपस्थित थी। ग्रामीणों ने बताया कि अध्यापिका महिने में कभी कभार ही आती है तथा देरी से आना व जल्दी घर जाने की आदत पड़ चुकी है। बीईओं शिवनारायण वर्मा ने बताया कि उन्होंने 19 जुलाई को विद्यालय का निरीक्षण किया था, उस दौरान अध्यापिका द्वारा अनियमितता बरतना पाया गया था। 22 जुलाई को उसे कारण बताओं नोटिस भी जारी किया गया, जिसका जवाब उसने दे दिया है। लेकिन उसका जवाब संतुष्टिपूर्ण नहीं था। इसलिए जांच कार्यवाही की जा रही है। उन्होंने बताया कि अध्यापिका के खिलाफ कार्यवाही के लिए जिला शिक्षा अधिकारी को तथा जिला परिषद को लिखा गया है तथा तहसील में लगा रखे प्रधानाध्यापक को भी विद्यालय में लगवाने के लिए तहसीलदार को पत्र लिखा है। खैर, कारण जो भी है, पर आदिवासी बच्चों को सही मायने में शिक्षा तो नहीं मिल पा रही है। 

पुस्तकों के अभाव में यूं होती है पढ़ाई
आदिवासी सहरिया बच्चों को शिक्षित करने के उद्देश्य से आरंभ की गई मां-बाडि़यां भी उपेक्षा का शिकार हो रही है। सरकार की एक संस्था (एनजीओ) ‘‘स्वच्छ परियोजना’’ द्वारा मां-बाडि़यों का संचालन किया जा रहा है। सहरिया बाहुल्य किशनगंज व शाहबाद उपखंड क्षेत्र के गांवों में कुल 207 मां-बाडि़यां संचालित है। सत्र आरंभ हुए डेढ़ माह से अधिक हो गया है लेकिन शुभधरा की मां-बाड़ी के बच्चों को अभी तक पाठ्य सामग्री मुहैया नहीं करवाई गई है।  शिक्षा  सहयोगी पप्पू सहरिया ने बताया कि पाठ्य सामग्री की सप्लाई नहीं आई है, इस कारण बोर्ड पर ही पढ़ाया जा रहा है। उसने बताया कि पाठ्य सामग्री लेने के उसे कार्यालय जाना पड़ता है। वह विकलांग होने के कारण कार्यालय जाकर पाठ्य साम्रगी नहीं ला पाया। इस बारे में स्वच्छ परियोजना के पदाधिकारियों से जानकारी चाही तो वे जानकारी देने में टालमटोली करते रहे। उन्होंने नोडल केंद्रों पर पुस्तकें नहीं होने की बात कही। जबकि बीईओं शिवनारायण वर्मा ने बताया कि स्वच्छ परियोजना की डिमाण्ड पर राजस्थान पाठ्य पुस्तक मंडल बारां द्वारा पुस्तकें आवंटित की गई थी। पुस्तकों की कोई कमी नहीं है, स्वच्छ परियोजना द्वारा मां-बाडि़यों के लिए पुस्तकों की डिमाण्ड भेजने पर मुहैया करवा दी जाएगी। एडीएम रामप्रसाद मीणा को जब मां-बाड़ी में पुस्तकें नहीं होने की जानकारी मिली तो उन्होंने स्वच्छ परियोजना के पदाधिकारी को तुरंत पुस्तकें उपलब्ध कराने के निर्देश देते हुए कहा कि क्षेत्र में संचालित सभी मां बाडि़यों में पुस्तकों की सूचना लेकर जहां पुस्तकें नहीं मिली वहां पहुंचावे। मां-बाडि़यों में पढ़ने वाले सहरिया बच्चों को डेªस, टाई, बेल्ट, जूते, मौजे, स्वेटर आदि दिए जाते है। लेकिन इस सत्र में शाहबाद के खुशालपुरा, शुभधरा  किशनगंज  के फल्दी, सोड़ाणा का डांडा, खैरूणा सहित दर्जनों मां बाडि़यों में अभी तक बच्चों को डेªस, जूते, मौजे आदि वितरित नहीं किए गए है। कई मां-बाडि़यों में पिछले वर्ष भी टाई, बेल्ट, जूते व मौजे वितरित नहीं किए गए और ना ही इन पर प्रभावी मानिटरिंग व्यवस्था ही है। जिस कारण मां-बाडि़यों में शिक्षा का स्तर दिनोंदिन गिरता जा रहा है। 

रीता पड़ा एएनएम भवन 
शुभधरा गांव में लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ भी नहीं मिल रहा है। लाखों की लागत से एएनएम भवन तो बनाए गए लेकिन एएनएम के वहां नहीं ठहरने के कारण एएनएम भवन निर्माण का  उद्देश्य  पूरा नहीं हो पाया है। शुभधरा में 2005 में सहरिया कालोनी के पास एएनएम भवन का निर्माण करवाया गया था। लेकिन अभी तक एएनएम यहां नहीं रहती है, जिससे ग्रामवासियों को स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है। छोटी-मोटी बिमारियों के लिए भी ईलाज के लिए देवरी या शाहबाद जाना पड़ता है। खाली पड़े एएनएम भवन में एक टी.बी. का रोगी अपने परिवार सहित रह रहा है। गिरधारी लाल सहरिया का मकान भारी बारिस के कारण क्षतिग्रस्त हो गया। तब से ही वो अपने बच्चों व परिवार सहित एएनएम भवन में रह रहा है। ग्रामीणों ने बताया कि ग्राम पंचायत भवन के पास पूर्व में एएनएम भवन बनाया गया था। लेकिन कार्य पूर्ण नहीं हो पाने के कारण वह अधूरा ही पड़ा है तथा जीर्णशिर्ण हो गया है।  किशनगंज  तहसील के खैरूणा गांव में भी ऐसी ही दशा है एएनएम भवन की। लाखों रुपए खर्च कर शानदार एएनएम भवन बनाया गया था। लेकिन यहां भी एएनएम नहीं रहती है। कन्हैया लाल सहरिया का मकान क्षतिग्रस्त हो गया इसलिए वो इसमें रह रहा है। 

गांव के विकास की धूरी ग्राम पंचायत होती है। शुभधरा ग्राम पंचायत में इन दिनों ताश, जुंआ खेलने वालों और शराबियों का जमावड़ा लगा हुआ है। यहां जुआरी दिन भर ताश खेलते रहते है। कुछ लोगों ने तो ग्राम पंचायत के बरामदे में चारपाईयां डालकर अस्थाई निवास बना दिया है। बरामदे में ही खाना भी बनाया जाता है। 

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Wednesday, January 11, 2012

ये कैसा पर्व है ! पूजा से अत्याचार की ओर . . .


लखन सालवी
भारत देश में त्यौहारों की लम्बी सूची है। गांवों में आज भी कई ऐसे त्यौहार मनाए जाते है जिनको मनाने के पीछे क्या धारणा है, नहीं पता। खैंखरा त्यौहार इसका एक उदाहरण है। यह पर्व राजस्थान के कुछ जिलों में मनाया जाता हैं, जिसे अलग अलग नामों से जाना जाता है। यह पर्व खासकर गांवों में मनाया जाता है तथा किसान इस त्यौहार को मनाते है। 
कभी बैलों की पूजा करने के उद्देश्य से मनाए जाने वाले इस त्यौहार की धारणा ही बदल चुकी है। अब इस त्यौहार का नाम ‘‘खैंखरा’’ से ‘‘खैंखरा भड़काना’’ हो गया है। अब बैलों की पूजा करने की जगह उन पर पटाखों की बौछार की जाती है। कुछ पटाखें उनकी पीठ पर, तो कुछ सिर के पास व कुछ पैरों के पास आकर दिल दहला देने वाली जोरदार आवाज के साथ फूटते है।

सजाया हुआ बैल
राजस्थान के गांवों में दीपावली के दूसरे दिन गांवों के किसान अपने बैलों की पूजा करते है। इस दिन को त्यौहार की भांति मनाया जाता है।  बैलों  को सजाया जाता है। उनके गले में घंटिया बांधी जाती है, उनके सिंगों को विभिन्न रंगों से रंगा जाता है तथा पूरे शरीर पर चित्रकारी की जाती है। 






गुणी पर बैल को लिए खड़े किसान 
गांव के सभी बैलों की पूजा एक चयनित स्थान पर की जाती है, इस स्थान (मोहल्ले) को ‘‘गुणी’’ कहा जाता है। गांव के सभी किसान जिनके पास बैल होते है, उनको सजा-सवांरकर गुणी पर लाते है। बैलों को यहां लाने से पहले नम्बरदार (वह व्यक्ति जो इस पूरे कार्यक्रम की व्यवस्था करता है तथा बैलों की पूजा करता है) गुणी में पीली मिट्टी व गोबर से लिपवाकर पवित्र करते है। वहां गुणी की पूजा कर कलश की स्थापना की जाती है। लोग अपने बैलों को पकड़कर कतार में खड़े रहते है। बैलों की लम्बी लाइन बन जाती है। नम्बरदार व पंच प्रत्येक बैल की पूजा करते है, उनका मुंह मीठा करवाकर आरती करता है। जब सभी बैलों की पूजा हो जाती है तो गुणी पर स्थापित किए गए कलश (मिट्टी का छोटा घड़ा) जिसे हेलुण्डी कहते है, को एक छोर से दूसरे छोर पर उछाला जाता है। दर्शक उस घड़े को लपकने की कोशीश करते है। अंतिम बैल की जोड़ी तक कलश उछाला जाता है, वहां कोई उस घड़े को लपककर अपने घर ले जाता है। उसके बाद सभी अपने-अपने बैलों को दौडा़ते हुए अपने घर ले जाते है। इस दिन न सिर्फ बैलों को ही सजाया जाता है, गांवों की महिलाएं, पुरूष, बच्चे-बूढ़े भी नए परिधान पहनकर खैंखरा देखने आते है। मेवाड़ में नाथद्वारा का ‘‘खैंखरा’’ बहुत ही प्रसिद्ध है। 

बैलों की पूजा करती महिलाएं
खैंखरा के बारे में गांवों के लोगों के कथन भिन्न-भिन्न है। कई गांवों  में  तो रूढि़वादी परम्परा मानकर इस त्यौहार को मनाया जा रहा है। कतिपय किसानों का कहना है कि बैल ही किसानों का धन है इसलिए इनकी पूजा करते है। भीलवाड़ा जिले के टोकरा गांव के लाल सिंह का कहना है कि पूर्व में बैलों की पूजा दीपावली के दिन ही की जाती थी। गोवर्धन नाम का एक ग्वाल था, दीपावली के दिन बैलों की पूजा के बाद बैल दौड़ और भगदड़ मच गई, उस भगदड़ में गोवर्धन ग्वाल बैलों के पैरों के कुचल जाने के कारण वह मर गया। उस गोवर्धन ग्वाल की याद में दीपावली के दूसरे दिन यह त्यौहार  मनाया जाता है। मेवाड़ क्षेत्र में इस त्यौहार को ‘‘खैंखरा’’ कहते है, हाडौती क्षेत्र में ‘‘घास भैरू’’ कहा जाता है। समान बात यह है कि बैलों की पूजा की जाती है । मगर त्यौहार को मनाने के पीछे लोगों की धारणाएं अलग-अलग है। हाड़ौती क्षेत्र में बैलों की पूजा कर एक बड़े पत्थर को रस्सियों से बांध कर बैलों से गांव के चारों तरफ घिसवाया जाता है। इसके पीछे धारणा यह है कि गांव में किसी कोई महामारी नहीं होगी व खूब बारिश होगी। 
आजकल ‘‘खैंखरा’’ त्यौहार पर बैलों की पूजा की बजाए उनपर अत्याचार किए जा रहे है। भीलवाड़ा जिले के कोशीथल गांव के किसन लाल जाट का कहना है कि ‘‘बैल हमारा धन है इसलिए इनकी पूजा करते है।’’ लेकिन वर्तमान में पूजा करने व त्यौहार मनाने का अंदाज बदल गया है। क्षेत्र में और जगहों की भांति यहां भी गुणी है, नम्बरदार व पंचों द्वारा गुणी पर कलश स्थापना व बैलों की पूजा की जाती है। लेकिन जब ये कार्यक्रम किए जा रहे होते है उसी दौरान युवा बड़े-बड़े पटाखे छोड़ना शुरू कर देते है। पटाखे जलाकर बैलों की ओर फैंके जाते है। बैलों व उनको पकड़कर खड़े लोगों के शरीर पर जाकर वे पटाखे फूटते है। बैल घबरा जाते है। कई बैल तो कांपने लगते है। इधर तो नम्बरदार बैल के तिलक कर रहे होते है कि उधर से बड़ा पटाखा उनके कान के पास आकर फूटता है, पूजा की थाली भी नीचे गिर जाती है। बैलों को थाम कर खडे़ लोगों के कपड़े तक जल जाते है। महिलाए जो त्यौहार के लिहाज से नए परिधान पहनकर यहां आती है, राॅकेट पटाखों से उनके परिधान भी जल जाते है। दर्जनभर मामले ऐसे हुए है जिनमें पटाखों से जलने के कारण महिलों को अस्पताल ले जाना पड़ा। 
मोहन लाल जाट बताते है कि लगभग एक दशक पूर्व से पटाखों का चलन बढ़ गया है। जहां पूर्व में हेलुण्ड़ी लपकने के बाद कार्यक्रम समाप्त होता था अब तो पटाखों की वजह से आफत के कारण कार्यक्रम समाप्त करना पड़ता है। या तो बैल पटाखों की बौछार से घबराकर भाग जाते है या फिर दर्शकों में से कोई जल जाता है। यहां प्रशासनिक अधिकारी भी रहते है लेकिन वह निरीह पशुओं पर पटाखों के बर्बर हमले के खिलाफ कुछ नहीं करते है।

खास बात यह है कि जलते हुए पटाखे बैलों पर फैंकने वाले अधिकतर अमीर युवा विश्व हिन्दू परिषद से जुड़े हुए है। गाय को माता मानने वाले पता नहीं क्यूं अपने भाई (बैल) पर ज्वलनशील पदार्थ फैंकते है। 

Monday, January 9, 2012

कमल भाई साब का कमाल . . .

आज मैं आरटीआई मंच पर था। रात को बाजार से सामान की खरीदी की। देर रात तक जागने का मूड़ था, मेरे सुझाव पर अमूल दूध का आधा किलो का पैक व अमूल छाछ के चार पैक खरीद लिए गए। मैंनें फ्रिज में छाछ व दूध को अलग-अलग कम्पार्ट में रखे।
मंच के सभी साथियों के साथ मैं भी खाना बनाने लगा। मुकेश व मैं चपातियां बना रहे थे, हमारे आदरणीय भाई साब कमल जी शिमला मिर्च को बेसन के साथ बना रहे थे। वो बार बार कहे रहे थे कि बेसन के साथ दही होता तो जायकेदार सब्जी बनती। साथियों ने सुझाव दिया कि दही के जगह छाछ का इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने एक अमूल पैक का उपयोग कर लिया।
खूश्बूदार सब्जी तैयार थी, सभी साथी खाने बैठे। सब्जी तीखी थी तो लाजमी है कि छाछ की डिमाण्ड हुई। कमल भाई साब ने सभी कि ग्लास में छाछ भर दी। कमल भाई साब व मोहन सिंह ने तो छाछ में नमक मिक्स कर पिया। मुझे व मुकेश को छाछ फिकी फिकी बेस्वादी लगी। मैंनें तो कह भी दिया कि छाछ फिकी है। खैर उसके बाद जो छाछ आई वो थोड़ी खट्टी थी।
खैर
खाना अच्छा था सभी ने दबाकर खाया। थोड़ी देर बाद चाय की तलब हुई। कमल भाई साब को चाय बनाने का बड़ा शौक है, घूस गए किचन में। मैं भी टहलता हुआ किचन की ओर निकल गया। किचन की ओर देखा तो पाया कि कमल भाई साब मेरा मूंह ताक रहे है, वहीं चूल्हे पर पतीली पड़ी है लेकिन चूल्हा बंद है। कमल भाई साब मुझे देखकर बोले - लखन आप दूध भी लाए थे ? मैंनें कहा जी हां फ्रिज में रखा है।

उन्होंने कहा कि दूध तो नहीं है . . . यह सूनने के बाद हंसी के इतने फंवारे छूटे की सभी का पेट दर्द होने लगा।

एक्च्यूएली हुआ यूं था कि आदरणीय कमल भाई साब ने बेसन के साथ बनाई जा रही शिमला मिर्च की सब्जी में छाछ की जगह दूध डाल दिया। शेष दूध को हमें परोस दिया। हम सभी दूध को फिकी छाछ समझकर पी गए। कमल भाई साब व मोहन ने तो दूध में नमक मिला मिला कर पिया।

Sunday, January 8, 2012

ये साइनिंग इंडिया है ....???

ये साइनिंग इंडिया है जहां आज में बंधुआ मजदूरी जारी है, अछुत की बिमारी मिट नहीं पा रही है और गरीबी बढ़ती ही जा रही है . . .

Saturday, January 7, 2012

वाह रे प्रशासन . . . 8 माह पहले किया बंधक श्रम से मुक्त, अब दिए प्रमाण पत्र

लखन सालवी

बारां (राजस्थान) जिला कलक्टर वी. सरवन कुमार की अध्यक्षता में गठित बंधक श्रमिक पुनर्वास समिति द्वारा किशनगंज तहसील के इकलेरा सागर की सहरिया बस्ती में रह रहे (जो कि पिछले वर्ष छबड़ा तहसील के आमलपुरा व कोलीखेड़ा गांव के जमींदारों के यहां से बंधुआ मजदूरी छोड़कर भाग आए थे) बंधुआ श्रमिको को बंधुआ विमुक्ति प्रमाण पत्र जारी किए गए है।
श्रमिको को पुनर्वास सामग्री का वितरण किया गया। उल्लेखनीय है कि बंधुआ मजदूरों के पुर्नवास के लिए 20 हजार रुपए की सहायता राशि दी जाती है। फिलहाल उक्त 15 मजदूरों को 1000-1000 रुपए दिए गए है।
जानकारी के अनुसार छबड़ा तहसील के उपखंड अधिकारी द्वारा 12 मई 2011 को 15 बंधक श्रमिको को बंधक श्रम से मुक्त कराकर बंधक मुक्ति प्रमाण पत्र जारी किए गए थे। लेकिन बंधक मुक्त कराने के 8 माह बाद अब उन 15 लोगों को बंधक मुक्त प्रमाण पत्र दिए गए है। इस कानून के अंतर्गत बंधक श्रमिक के पुनर्वास की जिम्मेदारी सरकार की होती है, लेकिन अभी तक बंधक श्रम से मुक्त कराए गए मजदूरों का पुनर्वास नहीं किया गया है।

Friday, January 6, 2012

सावधान . . . जुल्म सहने की ताकत नही बची है मुझमें

केसरिया बालम आओ नी पधारो म्हारे देश

एक महिला पत्रकार पर झल्ला गया जमींदार

लखन सालवी
शुक्रवार 6 जनवरी को बंधुआ मजदूरी के मामले की जानकारी लेने के लिए एक जमींदार के यहां गई एक महिला पत्रकार के साथ जाना हुआ। जमींदार से दुआ सलाम भी पूरी नही हुई कि वो बोला कैसे आए है ?
महिला पत्रकार ने कहा बंधुआ मजदूरी के बारे में जानने के लिए आए है। महिला पत्रकार का इतना कहना था कि जमींदार ने तिलमिलातें हुए कहा कि बहुत आ गए तुम्हारे जैसे पत्रकार, बंधुआ मजदूरों को छुड़वा दिया जाओं उनकी दशा देखों, कितनी बुरी दशा हो गई है उनकी।
उसने बंधुआ मजदूरी पर बात करने से साफ इंकार कर दिया, आखिर वो अपना पक्ष रखे भी तो क्या, कुछ हो तो ना . . .
यह जमींदार था, प्रवीण सिंह सरदार उर्फ बिट्ठा। (कहते है कि बिट्ठा अपने मजदूरों के साथ ज्यादती करता था, जो उसका विरोध करता उसके हाथ गन्ने के रस को उबालने के लिए जलाई जाने वाली भट्टियों में जला देता था।)
खैर बिट्ठा के यहां लगे बंधुआ मजदूरों को प्रशासन ने बंधक मुक्त करवा दिया है। बिठ्ठा तिलमिलाया हुआ है।

सीबीआई को सलाम, धन्यवाद

देर तो लगी लेकिन आखिर सीबीआई ने भंवरी देवी नट के अपहरण व उसकी हत्या से जुड़े कई सबूत जूटा लिए। आरोपियों द्वारा भंवरी देवी की जलाई गई लाश की अधजली हड्डिया, उसको मारने में उपयोग में लिए बेट व लाश को जिस छुरे से काटा वह भी बरामद कर लिया। इतना कुछ कर सीबीआई ने वाकई में सीबीआई होने की मिसाल कायम की है।
सीबीआई ऐसे और मामलों में भी इसी तन्मयता से कार्य कर सच्चाई का साथ दे तो वाकई हालत बदल जाएंगे। अपराधी कितने ही बड़े क्यों ना हो धरे जाएंगे।
इसी के साथ -
ना अन्ना, ना चवन्ना की
ना लोकपाल की, ना ही सरकार की
जय हो सीबीआई की
                                                              लखन सालवी

250 रुपए दो एनओसी लो, 900 रुपए दो नल कनेक्शन लो

ग्राम पंचायत व जलदाय विभाग के कर्मचारियों की लूटखसोट

लखन सालवी
सरकार बीपीएल परिवारों का जीवन स्तर उपर उठाने के लिए कई प्रकार योजनाएं संचालित कर रही है। अनुसूचित क्षेत्रों में जल सप्लाई करने के प्रयास किए जा रहे है। वहीं गांव के विकास की धूरी कही जाने वाली ग्राम पंचायत द्वारा बीपीएल परिवारों को भी नहीं बख्सा जा रहा है।
भीलवाड़ा जिले की कोशीथल ग्राम पंचायत द्वारा नल कनेक्शन के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) जारी करने के बदले 250 रुपए की राशि वसूली जा रही है। सूचना के अधिकार अधिनियम 2005 के तहत ली गई सूचनाओं से यह खुलासा हुआ है। कोशीथल के नारायण लाल तेली ने 21 सितम्बर 2011 को सूचना के अधिकार के तहत आवेदन करते हुए ग्राम पंचायत से जारी किए गए अनापत्ति प्रमाण पत्रों के संबंध में सूचनाएं मांगी। ग्राम पंचायत से मिली सूचना के अनुसार ग्राम पंचायत द्वारा हर वर्ग के व्यक्तियों से अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने की एवज में 250 रुपए की राशि वसूली गई है।
उल्लेखनीय है नल कनेक्शन करवाने के लिए ग्राम पंचायत से अनापत्ति प्रमाण पत्र लेना होता है। अनापत्ति प्रमाण पत्र के बिना जलदाय विभाग द्वारा आवेदक को नल कनेक्शन नहीं दिया जा सकता है। नियमानुसार ग्राम पंचायत 20 रुपए की शुल्क अदायगी पर अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी कर सकती है। ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि ग्राम सचिव सम्पत बोहरा अनापत्ति प्रमाण पत्र के लिए 250 रुपए की वसूली करता है। यह राशि नहीं देने पर अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं दिया जाता है। जबकि जलदाय विभाग द्वारा 301 रुपए की फीस पर नल कनेक्शन मुहैया करवाया जाता है।
आवेदक अमीर हो या गरीब प्रत्येक से 250 रुपए वसूले जा रहे है। जनवरी 2007 से अगस्त 2011 तक अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने के बदले ग्राम पंचायत ने कोशीथल के 46 लोगों से 11500 रुपए वसूल किए है। इनमें से 16 लोग अनुसूचित जाति के है तथा 7 बीपीएल परिवार के है। 7 बीपीएल में से भी 3 बीपीएल परिवार दलित है। बीपीएल परिवार के देवीलाल रेगर, जयचंद रेगर, कस्तुर सालवी, हजारी रेगर, भंवर माली सहित कईयों से 250 रुपए लेकर अनापत्ति प्रमाण पत्र दिया गया।
नारायण तेली ने सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई सूचना में यह भी जानना चाहा कि अनापत्ति प्रमाण पत्र के बदले 250 रुपए की राशि किस नियम व कानून के तहत वसूली गई ? जवाब में ग्राम सचिव ने ग्राम पंचायत के अपने अधिकार क्षेत्र के तहत यह राशि वसूलना बताया है।
गरीब व्यक्ति जैसे तैसे कर 250 रुपए ग्राम पंचायत में जमा करवाकर अनापत्ति प्रमाण पत्र ले लेता है। नल कनेक्शन के लिए जलदाय विभाग के अधिकारी फाइल के साथ नक्से की मांग करते है, नक्सा विभाग का स्थानीय कर्मचारी द्वारा बनाया जाता है। कोशीथल में कर्मचारी नारू लाल भील नक्सा बनाकर देता है। नक्सा बनाने की किमत 50 रुपए है। उसके बाद फाइल संविदाकर्मी उदयलाल के पास जाती है। संविदाकर्मी द्वारा प्रत्येक आवेदक से 850-900 रुपए लिए जाते है। तब ही फाइल आगे बढ़ती है और कनेक्शन हो पाता है।
भंवर माली, जगदीश माली, नारायण लाल तेली, महावीर टेलर, हेमराज सोनी दर्जनों लोगों ने जलदाय विभाग के कर्मचारी नारू भील व उदय लाल को रुपए देकर कनेक्षन करवाए है। जिसने इस सिस्टम का विरोध किया वो कनेक्शन के लिए तरस रहा है। हिरालाल जीनगर ने नल कनेक्शन के लिए कई पापड़ बेले, उसने ग्राम पंचायत में एनओसी के बदले 250 रुपए भी नहीं दिए। जलदाय विभाग के कर्मचारियों को बिना पैसे खिलाए नल कनेक्षन करवाने में सफल रहा। इसके लिए उसने जयपुर स्थित जलदाय विभाग की हेल्पलाइन पर खूब शिकायतें दर्ज करवाई, तब कहीं जाकर कनेक्शन हो पाया। विकलांक असमल मोहम्मद छीपा नल कनेक्शन के लिए 2 माह से जलदाय विभाग के दफ्तर के चक्कर लगा रहा है। अभी तक कनेक्शन नहीं किया गया है।

महिला सशक्तिकरण में मीडिया की भूमिका पर सवालिया निशान (?)

मंत्री रामलाल जाट के महिलाओं से अवैध संबंध की खबरों ने महिलाओं को आहत किया
लखन सालवी
पिछले दिनों राजस्थान सरकार के बड़े मंत्रियों पर मीडिया सहित आमजन की अंगुलियां उठी। लोकतंत्र के चैथे स्तम्भ ने पूर्ण जिम्मेदारी व निर्भिकता से इस मामलें से जुड़ी हर एक हकीकत को जनता के सामने ला दिया है, इसके लिए मीडिया धन्यवाद का पात्र है। लेकिन कुछ खबरियां चैनलों ने महिपाल मदेरणा व भंवरी देवी के अंतरंग संबंधों को जाहिर करती सीडी को मसालेदार तड़के देकर प्रसारण कर मीडिया की गरिमा को आहत किया है।
भीलवाड़ा जिले के निवासी पूर्व वन पर्यावरण एवं खनिज मंत्री राम लाल जाट पर भी स्वर्गीय पारस देवी के साथ अवैध संबंधों के आरोप लगाए गए। पारस देवी की मौत के बाद आधी रात में मंत्री के सहयोग से पोस्टमार्टम करवाने जैसी कई बातों को लेकर आरोप लगे है। बात पूर्व मंत्री रामलाल जाट व पारस देवी जाट तक ही सीमित होती तो ठीक था। लेकिन उस समय दौर चल रहा राजनेताओं के महिलाओं के साथ अवैध रिश्तों को उजागर करने का। मीडियाकर्मी धड़ाधड़ ऐसे मामले उजागर कर रहा था, लेकिन इस दौर में मीडियाकर्मी व मीडिया संस्थान मानवीय संवेदनाओं को भूल गए। एक प्रमुख दैनिक अखबार में पूर्व मंत्री रामलाल जाट व भीलवाड़ा की 3 महिला जनप्रतिनिधियों के संबंध में जो खबरें प्रकाशित हुई। खबर के अनुसार पूर्व मंत्री रामलाल जाट ने एक महिला को सरकारी नौकरी छुडवाकर उसे जिला प्रमुख बनाया, इसी प्रकार दो अन्यों के माथे पर भी मंत्री जी का हाथ रहा इसलिए ही वह प्रमुख पदों पर विराजमान हो सकी।
बिना तथ्यों की ये खबर मीडिया प्रतिष्ठानों के लिए अत्यन्त ही लज्जाजनक है। यहां बताना जरूरी हो गया है कि भीलवाड़ा की जिला प्रमुख ना तो सरकारी नौकरी में थी ना ही रामलाल जाट से परिचित थी। जिला परिषद सदस्य की आरक्षित सीट थी, समुदाय के लोगों के सहयोग से पार्टी से टिकट लेकर चुनाव लड़ी। चूंकि जिला प्रमुख की सीट भी अनुसूचित जाति की महिला हेतु आरक्षित थी। वह चुनाव लड़ी, बहुमत से जिला प्रमुख बनी न की किसी मंत्री की चहेती होने के कारण।
कथित एक मीडिया प्रतिष्ठान ने महिला जनप्रतिनिधियों पर नाजायज अंगुली उठाकर मीडिया की गरिमा को दागदार किया है। आरक्षण का लाभ लेकर जिला प्रमुख बनी एक दलित महिला का मीडिया ने अपमान किया है। मीडिया इतना लापरवाह कैसे हो सकता है ? जहां महज तथ्यों की बात की जाती है वहां बिना तथ्यों के खबरें प्रकाशित की गई।
मजे की बात यह है कि प्रतिष्ठित अखबार के संपादक स्पन्दन और महिला सशक्तिकरण के पक्ष में लेख लिख लिख कर न जाने कितनी वाहवाही लूट चूके है। फिलहाल बिना तथ्यों की भ्रामक और झूठी खबर प्रकाशित करने के बाद भी उन्होंने अपनी गलती स्वीकार नहीं की।

Thursday, January 5, 2012

Few Sahariyas still await flood compensation

Anindo Dey, TNN Jul 19, 2011, 03.01am IST

JAIPUR: At a time when the government, moved by the plight of the Sahariyas in the state, announced a special package for their rehabilitation, it is these tribals that seem to have been most-affected in the aftermath of the floods in Baran. Independent surveys suggest there are at least 200 Sahariya families in Kishanganj whose houses have been affected but their names do not figure in the list of those who are to be provided compensation.
According to Lakhan Salvi of the Hadauti Media Research centre, which conducted a survey of the flood-hit areas, "Survey by the patwari after the floods in the area covered 36 villages under 17 gram panchayats and identified 860 damaged houses. But we have traced at least 243 houses, of which 200 belong to Sahariyas. The houses are damaged but have not been enlisted for compensation." "Patwari Ramesh Chandre said that he had submitted the report to the tehsildar, Bashir Mohammed, while the later maintained that a review of the survey will be ordered and if the houses are damaged they would be paid compensation," Salvi added.

The bias in the payment of compensation to flood victims, according to the Centre's survey, extends to others also. The survey disclosed that under the Cheenod village under Kishanganj tehsil, over 25 houses have been damaged but many have not got compensation. According to the Cheenod sarpanch, Hemraj, Jigraj, Morepla, Devendra, Puranmal and a few other people had intimated him about their damaged houses. Though the information was sent to the tehsildar's office, no name figures in the list of those to be given compensation.
Officials say over 10,000 houses were damaged in the floods. While 350 houses were washed away, 800 were badly damaged, 9,800 were partially damaged while 84 huts got washed away. Later, a total of Rs 2.25 crore was sanctioned by the disaster management department for compensation.
The survey identified many people in the Kishanganj tehsil whose houses were damaged and were covered by the patwari in his survey but their names did not figure in the compensation list. Morepal Gujjar, a disabled person of Rundi under the Kishanganj tehsil was covered in the survey but got no compensation.
Ramcharan Sahariya's one-room house was swept away in Dandra in Sodana but his name does not figure in the list. At present, he has left the village.
However, Gayatri Sahariya of Dandra in Sodana, who had saved every penny to build a one-room house, saw the front wall of her house being washed away. Her door was swept away as she took shelter in her neighbour's house. She received a compensation of mere Rs 1,500 which is too less to start life all over again.
When contacted, officials of the district refuted claims of any bias in giving compensations. "There may be some people who have been unintentionally left away from the survey. We will ensure that they get their compensation," they said.


NREGA wages fight gathers steam

NREGA wages fight gathers steam

State Writes To Centre On Raising The Wages,But Is Shy Of Taking A Stand

Anindo Dey | TNN

Jaipur: Seventy-year-old Dau Singh is dancing to the tune of a parody music being belted out in the background by a group of people sitting on the pavement.The song urges people to write letters to their brethren and come there to join the fight.Come on mazdoors,get into the act to get what you deserve, urges the song.The venue is the Statue Circle in Jaipur,where hundreds of people from villages of the state are sitting on an indefinite dharna demanding a revised minimum wage for NREGA workers.
A speaker,Lakhan Salvi,ensured that he did not mince a word.It is a fight for self-respect.You deserve to be paid the minimum wages even for NREGA.But beware! We have already got feelers that nothing may happen with this satyagrah.So all of you plan your next step to ensure that you get your rights, Lakhan blared through the public address system.
At stake is the UPA government's flagship programme,the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA).Though petitions have been filed at Andhra Pradesh and Karnataka high courts by individuals and workers' groups questioning the competence of the Union government to fix wages under NREGA which is less than the wages prescribed under Minimum Wages Act the ground battle is now being fought in the capital of Rajasthan.
If the minimum wages is undermined,then NREGA loses its meaning.One aspect of the Act was to ensure jobs for the unemployed,the other aspect was to ensure that they get the due value.In fact,it was NREGA which had ensured that the minimum wages are paid to workers but not paying the minimum wage is not only unconstitutional,but no one would be willing to work under it even if they get higher wages elsewhere, says social activist Aruna Roy of the Suchna Evum Rozgar Ka Adhikar Abhiyan,which is heading the satyagrah.
Currently,the wages for NREGA is governed by Section 6 of the Act and the Union ministry of rural development has been maintaining that the section is immune from the Minimum Wages Act.In fact,in response to a recommendation by the Working Group on Wagesformed under the National Employment Guarantee Council to raise the minimum wage,the ministry has said: This is not feasible.The wage rates fixed under Section 6 (1) of the Act are distinct from the minimum wages.The provisions of the Act have to be respected.
Earlier,on an order of the Andhra Pradesh High Court in a petition filed by one Karri Sanyasi Naidu against the government of India,the ministry said,... the state government is obliged to pay the minimum wages as notified by the Minimum Wages Act 1948.However,the government of India will reimburse the amount to the extent permissible under Section 6 (1) of the NREG Act. This was stated by Satyendra Kumar Singh,director,NREGA,in the court.
This stance of the Centre put the onus of paying the extra sum to the NREGA worker onto the state governments which they are refusing to buy.
In Rajasthan,after 17 days of sit in by the activists the government accepted that the NREGA wages should meet criteria of a minimum wage but instead of taking a stand on it just wrote to the Centre for the same.
It might well be a correct position that the Centre should pay the whole amount when it is a Central scheme.Especially since Section 22 (1) of the NREGA clearly states that the wage component must be entirely paid by the Centre, asserts Nikhil Dey,another activist of the Abhiyan,adding,in this battle between the two,it is again the poor NREGA worker who is the sufferer.The courts have consistently held that minimum wages are a Fundamental Right.How can anyone say that a section of the MGNREGA gives them the authority to overrule the most basic protection for workers of the unorganised sector
When contacted,C P Joshi,Union rural development minister said,The Sections 6 (1) and (2) of the NREG Act is very clear on the issue of wages.Whatever legal opinions are being given for making these wages at par with the minimum wages,are subject to scrutiny of the courts.However,the government understands that prices of goods have gone up and that is why the wages for NREGA workers has been increased from the initial sum of Rs 60 that was paid in the year 2000.This apart,on the issue of indexing the wages,the matter is pending with the Planning Commission.As soon as it clears,it we will be taken up with the finance ministry.


After 17 days of sit in by activists,the state government accepted that the NREGA wages should meet the criteria of minimum wages under Minimum Wages Act



आदिवासी सहरिया महिला को मिला ’’दी हॉल आफ फेम पुरस्कार 2011’’

लखन सालवी
इस साल का ‘‘दी हॉल आॅफ फेम पुरस्कार’’ बारां जिले के सहरिया आदिवासी क्षेत्र किशनगंज के भंवरगढ़ गांव की ग्यारसी बाई सहरिया को मिला है। लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव लाने पर दिए गए इस पुरस्कार को पाने वाली यह पहली सहरिया महिला है। क्षेत्र में समाज के हित में कार्य कर रहे जाग्रत महिला संगठन की महिला कार्यकर्ताओं के साथ उसके द्वारा इस वर्ष बंधुआ मजदूरों को मुक्त कराने के लिए किए गए कार्य के लिए उसे यह पुरस्कार दिया गया है।


Gyarasi Bai Sahariya

अजीम प्रेमजी फाउण्डेशन के सहयोग से सिविल सोसायटी मैगजीन द्वारा देश के 6 राज्यों के 6 लोगों को यह पुरस्कार दिया गया है। जिनमें राजस्थान के बारां जिले की ग्यारसी बाई सहरिया भी शामिल है। दिल्ली में इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेन्टर में 30 नवम्बर को आयोजित हुए सम्मान समारोह में यह पुरस्कार दिया गया। समारोह में मुख्य अतिथि राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की सदस्य एवं रैमन मैग्सैसे अवार्ड विजेता श्रीमति अरूणा राॅय ने कहा कि छोटी-छोटी जगहों पर छोटे-छोटे कार्य करते हुए बड़े बदलाव करने वाले लोग मुख्यधारा के टीवी चैनल व समाचार पत्रों में दिखाई नहीं देते है। लेकिन वे बड़े बदलाव के कार्य कर रहे है।
उल्लेखनीय है कि ग्यारसी बाई कोई 20 सालों से बारां जिले के सहरिया बाहुल्य क्षेत्र किशनगंज  व शाहबाद के गांवों में सामाजिक कार्यों में जुटी है। सन् 2002 में बने जाग्रत महिला संगठन से जुड़कर जन मुद्दों पर कार्य कर रही है। उसके द्वारा किए गए सराहनीय कार्यों की बदौलत ही उसे आज नई पहचान मिली है। लेकिन वो इस नई पहचान का दंभ नहीं भर रही है, यह उसकी सरलता की निशानी है। वो इस पुरस्कार के बारे में पूछने पर कहती है कि ‘‘बीने कांई केवे बो तो मूं भूलरी छूं, पण आ खबर छे के आच्छो काम करबा काण यो पुरस्कार दियो छे मने।’’  (उस पुरस्कार को क्या कहते है यह तो मैं भूल रही हूं पर इतना जरूर जानती हूं कि अच्छा कार्य करने पर यह पुरस्कार दिया गया है मुझे)
ग्यारसी बाई ने सूचना के अधिकार कानून को लागू करने की मांग को लेकर किए गए आंदोलनों से शुरू से ही जुड़ी रही। सूचना के अधिकार के लिए राजस्थान के ब्यावर से शुरू हुए आंदोलन सहित इसके लिए राज्य भर में हुए आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। यहीं नहीं महानरेगा की मांग व महानरेगा के तहत ग्राम पंचायतों द्वारा करवाए जा रहे कार्यों में पारदर्शिता स्थापित करने के लिए किए गए सामाजिक अंकेक्षणों में भी भाग लिया। झालावाड़ के अकलेरा में हुए सामाजिक अंकेक्षण में भ्रष्टाचार उजागर होने से घबराए भ्रष्टाचारियों द्वारा किए गए हमलों में घायल हुई, लेकिन वो हमलों से नहीं घबाराई और अपने इरादों पर अटल रही।
जाग्रत महिला संगठन के बैनर तले उड़ीसा के नीलगिरी पहाड़ पर बसे लोगों के लिए वहां जाकर आवाज उठाई। सहरिया बाहुल्य क्षेत्र में ही बसे खैरूआ जाति को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिलवाने, सहरिया समुदाय के लोगों को महानरेगा में 100 दिन की बजाए 200 दिन का रोजगार मुहैया करवाने, शाहबाद व किशनगंज क्षेत्र को आदिवासी क्षेत्र घोषित करवाने, वन भूमि पर काबिज लोगों को वन भूमि अधिकार अधिनियम 2005 के तहत पट्टे दिलवाने के लिए जिला स्तर, राज्य स्तर व राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा उठाया। इसके लिए वो सोनिया गांधी, राहूल गांधी, राजस्थान के राज्यपाल व मुख्यमंत्री से भी मिली।
उल्लेखनीय है पिछले वर्ष जयपुर में स्टेच्यू सर्किल पर किए गए मजदूर हक सत्याग्रह के दौरान जाग्रत महिला संगठन ने बंधुआ मजदूरी का मुद्दा उठाया था। इस मुद्दे पर कार्य करते हुए साझे प्रयासों से अब तक 146 बंधुआ मजूदरों को मुक्त करवाया है। इस कार्य से क्षेत्र के किसानों का विरोध भी झेलना पड़ा, धमकियां भी मिली नहीं वह नहीं डरी। महिलाओं पर अत्याचार को वह सहन नहीं करती है। संगठन के साथ महिला अत्याचारों के खिलाफ पीडि़त महिलाओं का साथ देकर अत्याचारियों के खिलाफ आवाज उठाई।
ग्यारसी बाई किशनगंज तहसील के फल्दी गांव में जन्मी और पली बढ़ी। वह बताती है कि बचपन में उसके माता पिता ने उसे बताया कि उसका जन्म ग्यारस (एकादशी) को हुआ था इसलिए उसका नाम ग्यारसी रखा गया। उसकी माता का नाम पांची व पिता का नाम बिहारी था। उसके दो बड़े भाई थे, सबसे बड़े भाई रामलाल की मृत्यु हो गई। ग्यारसी के पिता एक पुत्री की इच्छा रखते थे, उसकी माता पांची ने तीसरी संतान के रूप में कन्या को जन्म दिया था लेकिन उसकी मृत्यु हो गई। उसके बाद से पिता बिहारी दुःखी रहने लगे और एक साल बाद उनकी मृत्यु हो गई। ग्यारसी का जन्म उसके पिता की मृत्यु के करीब एक माह बाद हुआ।
ग्यारसी पढ़ना चाहती थी लेकिन उसे स्कूल जाने का मौका ही नहीं मिला। उसके सबसे बड़े भाई भैरूलाल के बच्चों की देखभाल में ही वक्त गुजरता रहा। 8 साल की उम्र में उसकी शादी भंवरगढ़ गांव के बक्सु सहरिया से कर दी गई। शादी के 3-4 साल बाद उसका गौना कर दिया गया। महज 12 साल की उम्र में वह अपने ससुराल में रहने लगी।
जब वह ससुराल आई तो उसने देखा कि घर में खाने पीने को भी कुछ नहीं था। उसके जेठानी की कुछ माह पूर्व ही प्रसव के दौरान मृत्यु हो गई थी। सास तो बहुत पहले ही मर चुकी थी। खेती के लिए इंच भी जमीन नहीं थी। ससुर पुन्या सहरिया किसानों के यहां रखवाली का काम करते थे। वहीं जेठ और पति जमींदारों के यहां हाळी का काम करते थे। कुछ समय तो वह घर का काम ही करती रही। लेकिन घर में खाने को कुछ नहीं था, एक समय ही रोटी बनती थी, रोजाना शाम को पानी में गलाए गेहूं खाकर भूख बुझती थी।
उसने अपने पति को जमींदारों के यहां हाळी का काम करने से रोका और दोनों ही चूने के भट्टे पर  मजदूरी करने लगे। कोई 20 साल पहले क्षेत्र में महिला विकास पर व शिक्षा के प्रति जागरूक कर रही चारू मित्रा नाम की सामाजिक कार्यकर्ता को उसने एक बैठक में बोलते हुए देखा। असल में हुआ यूं था कि चारू मित्रा ने अपने साथियों के साथ मिलकर भंवरगढ़ गांव में एक बैठक का आयोजन किया गया था। गांव की महिलाओं को संगठित होने के लिए व शिक्षा के प्रति जागरूक करने के लिए वह बैठक आयोजित की गई थी। चारू मित्रा के एक साथी रमेश सेन ने चूने के भट्टे पर आकर सभी महिलाओं को बैठक में आने को कहा था। ग्यारसी बाई ने अपने पति बक्सु सहरिया से बैठक में जाने की इजाजत मांगी। बक्सु ने ग्यारसी को बैठक में जाने से नहीं रोका। बैठक में 5 महिलाओं का ग्रुप बनाकर जाना था। ग्यारसी के मन में बैठक में जाने की तीव्र इच्छा थी सो उसने अपनी सहेलियों को बैठक में जाने के लिए तैयार किया और चल पड़ी बैठक में भाग लेने के लिए। इस बैठक में चारू मित्रा को महिला अत्याचार, समानता का अधिकार, शिक्षा जैसे विषयों पर बोलते देखा। उसने ठान लिया कि चारू मित्रा की तरह काम करना है। भंवरगढ़ की बैठक के कुछ समय बाद ही वहां के तेजाजी के डांडे पर लोक जुम्बिश परियोजना की शुरूआत हुई। परियोजना का संचालन क्षेत्र में शिक्षा पर कार्य कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता मोतीलाल व चारू मित्रा द्वारा किया जाना था। परियोजना संचालित करने के लिए कार्यालय भवन की आवश्यकता थी। वहां भवन की स्वीकृति हुई। भवन निर्माण किया जाना तो चारू मित्रा ने महिलाओं को मिस्त्री का प्रशिक्षण देकर उनसे भवन निर्माण करवाने की सोची। उन्होंने क्षेत्र की महिलाओं को इसके लिए तैयार किया। ग्यारसी को जब इसकी जानकारी मिली तो वह भी मिस्त्री बनने के लिए तैयार हो गई। 10-10 महिलाओं के ग्रुप बनाए जाने थे, ग्यारसी ने अपने साथ और महिलाओं को जोड़ा और अपना ग्रुप बनाया। मिस्त्री का प्रशिक्षण प्राप्त किया और लोक जुम्बिश परियोजना के कार्यालय के लिए बनाए गए भवन में मिस्त्री का काम किया।
उस समय चारू मित्रा संकल्प संस्था की कार्यकर्ता थी। संकल्प संस्था द्वारा शिक्षा व महिला विकास के मुद्दे पर कार्य किया जा रहा था। इसी दरमियान शाहबाद तहसील के मामोनी गांव में स्थिति संकल्प संस्था में 5 दिवसीय महिला विकास व बालिका शिक्षा पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस प्रशिक्षण में महिलाओं को संगठित करने, महिला अत्याचार, समानता का अधिकार, अनुसूचित जाति एवं जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम सहित शिक्षा के महत्व के बारे में बताते हुए बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए उन्हें शिक्षा की ओर अग्रसर करने की जानकारियां दी गई। यह प्रशिक्षण ग्यारसी के लिए वरदान साबित हुआ। उसने शिक्षा के महत्व को जाना और ठान लिया कि महिलाओं को संगठित करना है तथा बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ना है। वह इन कार्यों में जुट गई, उसकी क्षमता का ही उदाहरण है कि हर गांव की हर समुदाय की महिलाओं को संगठित किया। बालिकाओं को शिक्षा से जोड़ा। क्षेत्र में ग्यारसी बेनजी के नाम से ख्याति मिली। उसकी सोचने समझने की क्षमता व बेझिझक अपनी बात कहने के साहस ने लोगों के दिलों पर असर किया है। हर वर्ग उसका सम्मान करता है।
अनपढ़ होते हुए उसने शाहबाद क्षेत्र में शिक्षाकर्मी स्कूलों व रात्रिशालाओं में महिलाओं व बालिकाओं को जोड़ने का कार्य किया। उसने वहां देखा कि शिक्षाकर्मी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को कपड़े व अन्य सामग्री मिलती थी। जबकि उसके घर के पास संचालित रात्रिशाला में पढ़ने वाले बच्चों को कपड़े आदि नहीं मिलते थे। उसने अपनी साथी चारू मित्रा से इस बारे में पूछा तो उन्होंने उससे कहा कि वो रात्रिशाला में पढ़ने वाले बच्चों को दिन में पढ़ने के लिए प्रेरित करेगी और अधिक बच्चों को जोड़ेगी तो उन बच्चों को भी सुविधाएं मिलेगी। तब ग्यारसी ने अपने मोहल्ले की महिलाओं को इसके बारे में बताया व उन्हें संगठित कर उनके सहयोग से लकड़ी की एक टापरी बनाई। रात्रिशाला में पढ़ाने वाले अध्यापक गोबरी लाल सहरिया को उस टापरी में बच्चों को पढ़ाने के लिए कहा। सभी महिलाएं अपने बच्चे-बच्चियों को पढ़ने भेजने लगी। तब ग्यारसी ने चारू मित्रा से वहां पढ़ रहे बच्चों के लिए सुविधाएं मांगी। चारू मित्रा ने प्रयास कर टापरी में संचालित स्कूल को शिक्षाकर्मी स्कूल का दर्जा दिलवाया तथा बाद में स्कूल के लिए भवन भी बनाया गया, सिंचाई काॅलोनी के समीप वह शिक्षाकर्मी स्कूल आज भी संचालित है।
ज्ञातव्य है कि अकाल के दौरान क्षेत्र में भूख से हुई मौतों के बाद सन् 2002 में 8 मई महिला दिवस के दिन संगठित महिलाओं ने जाग्रत महिला संगठन बनाया गया था। संकल्प संस्था के मोतीलाल कहते है कि ग्यारसी जैसी ईमानदार, अहंकार रहित व काम के प्रति समर्पित महिला और नहीं देखी, वह स्वाभिमानी है तथा निडरता सामाजिक बदलाव के लिए संघर्ष कर रही है।
वहीं ग्यारसी बाई के पति बक्सु सहरिया कहते है कि हमें तो नीच और गंवार समझा जाता था, जब ग्यारसी ने पहली बार मुझसे चारू मित्रा की बैठक में जाने की इजाजत चाही तो मैंनें उसे जाने दिया। घर की चारदिवारी में बंद रहने वाली महिला दूनियादारी को नहीं समझ पाती, वो चारदिवारी से बाहर निकली तो आज मुझसे भी अधिक जानकार है। उसे जो पुरस्कार मिला है, यह जानकर मुझे बहुत खुशी हुई है। बहरहाल ग्यारसी बाई संगठन की महिला साथियों के साथ महिला अत्याचार के विरोध में खड़ी है तथा जनहित के मुद्दों को हर स्तर पर उठा रही है। क्षेत्र के हर वर्ग के लोगों को ग्यारसी पर नाज है।