Friday, July 14, 2017

एक दलित समुदाय के लोग दिन-रात श्मसान भूमि में दे रहे है धरना

देवगढ़ के मुर्दे अब कहां जाएं ?

सर्वण हिन्दू, दलित हिन्दूओं को दबाकर रखने के लिए हर संभव कार्य करते है। मारपीट करना, गाली गलौच करना, उनके आवासों व कृषि की जमीनें हड़पना आम बात है। अब दलितों के श्मसानों पर इनकी नजर है, अब वे दलित मुर्दों को भी खदेड़ना चाहते है। भारत में सवर्ण हिन्दू विभिन्न अवसरों पर विभिन्न संगठनों के माध्यम से भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की दहाड़े मारते है, दूसरी ओर वो अपने ही धर्म के लोगों के साथ ऐसा अन्याय करने को आमादा हो जाते है जो हिन्दू धर्म में अति निन्दनीय है। पर वास्तव में धर्म की पड़ी किसे है, यहां धर्म की आड़ में सत्ता और स्वार्थ का बोलबाला है।



राजसमन्द जिले में दलित अत्याचार की घटनाएं होना आम बात है। यहां कभी किसी दलित की पगड़ी उतार पर आग की भट्टी में डालकर ये कहते हुए जला दी जाती है कि ‘‘तुमने हमारे जैसी पगड़ी क्यों बांध ली’’। कभी जमीन हड़पने की नियत से सोलंकियों का गुढ़ा के दलित परिवार की महिला को डायन कह दिया जाता है तो कभी घोड़े पर बिन्दौली निकालने पर मारपीट की जाती है। इन सभी प्रकार के अत्याचारों को दलित समुदायों के लोग सदियों से सहते आए है, पिछले कुछ सालों से विरोध भी करने लगे है। विरोध किया तो कहीं जीते, कहीं हार का मूंह भी देखना पड़ा। खास बात यह रही है कि बिखरे-बिखरे रहने वाला दलित समुदाय अब संगठित होकर संघर्ष करने लगा है, फिर चाहे मुद्दा सामूदायिक हो या व्यक्तिगत, अत्याचार का हो या अधिकारों के दमन का।

अभी रात के 11.30 बज चुके है, दिन है 10 जुलाई 2017 का। देवगढ़ के सालवी समाज के लोग अभी रात में कस्बे के शास्त्रीनगर में स्थित श्मसान भूमि में धरने बैठे हुए है। समाज के महिला-पुरूष आज दिन भर श्मसान भूमि में धरने पर बैठे रहे थे। शाम होने के बाद महिलाएं घरों पर चली गई और परिवार के बड़े, बुजुर्ग व युवा श्मसान में ही रूके रहे है। धरने में भंवर लाल, नारायण लाल, अर्जुन लाल, तुलसीराम, हिरा लाल, शंकर लाल, निशांत, नारायण लाल, रमेश चन्द्र, शोभा लाल, श्रवण लाल, केसूराम, धर्मेश कुमार, रोशन लाल, देवी लाल, सुरेश चन्द्र, जीतेन्द्र कुमार, चम्पा लाल, कैलाश, गोपाल लाल, राहुल, नेपल सहित करीब 100 लोग श्मसान भूमि में ही धरने पर बैठे हुए है।

2013 में जनसहभागिता योजना में स्वीकृत हुई चारदिवारी, समाज ने जमा करवा दी 10 प्रतिशत राशि, टेण्डर भी हो गए पर नहीं बना रहे चारदिवारी

2013 में नगरपालिका ने इनकी सुनवाई की, जनसहभागिता योजना के तहत चारदिवारी स्वीकृत कर दी। इस योजना के नियमानुसार समाज के समाज के लोगों ने 19 सितम्बर 2013 को रसीद क्रमांक 59 के जरिए नगरपालिका में 58 हजार 800 रूपए जमा करवा दिए। यानि योजनानुसार 10 प्रतिशत राशि सालवी समाज के लोगों ने जमा करवा दी, जिसके आधार पर नगर पालिका ने 5 लाख 88 हजार रूपए की चारदिवारी स्वीकृत कर दी। चारदिवारी बनाने के लिए टेण्डर आमंत्रित किए। टेण्डर ठेकेदार ने कार्य आरम्भ करना चाहा तो श्मसान भूमि के पास आकर बस चुके सवर्ण परिवारों के लोगों ने आपत्ति जताते हुए शिकायत कर दी और चारदिवारी निर्माण का कार्य रूकवा दिया। उसके बाद से सालवी समाज के लोग नगरपालिका के चक्कर काट रहे है लेकिन चारदिवारी का कार्य नहीं करवाया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार यहां केवल श्मसान भूमि ही थी। समाज के बुजुर्ग व्यक्ति नाथूराम मेमात ने बताया कि श्मसान आज-कल का नहीं है। इस भूमि में हमारी दसियों पीढ़ियों के पूर्वज दफन है। समाज के शिक्षित युवाओं ने बताते है कि देवगढ़ कस्बे के बसने के साथ ही यह श्मसान बनाया गया था। धर्मेश सालवी ने बताया कि उनके परिवार की चार पीढ़ी के लोगों का यहीं पर अंतिम संस्कार किया गया। पहली पीढ़ी के भैराराम चिताणिया, दूसरी पीढ़ी के पिताराम चिताणिया, तीसरी पीढ़ी के गंगाराम चिताणिया, चौथी पीढ़ी के चेनाराम चिताणिया के शरीर यहीं जमींदोज हैं। इससे साफ होता है कि करीब सौ सालों से यह श्मसान भूमि सालवी समाज की ही है।

अब बात करे उन लोगों की जो बेनामी शिकायतें प्रशासन से कर रहे है। इस श्मसान को यहां से हटाने का प्रयास इसके आस-पास बस चुके सवर्ण परिवारों के लोग कर रहे है जो पिछले 10-15 सालों में यहां आकर बसे है। इन लोगों ने नगरपालिका के भूखण्ड़ों को निलामी में खरीदा। तब इन लोगों को श्मसान की जानकारी होते हुए भी चूंकि जरूरत थी इसलिए नीलामी में भूखण्ड खरीद लिए। नगरपालिका की स्कीम में उनके भूखण्ड़ों के दरवाजे श्मसान भूमि के विपरित दिशा में है, बावजूद कई लोगों ने श्मसान भूमि की ओर भी दरवाजे लगा दिए और अब येनकेन प्रकारेण श्मसान को बंद करवाना चाह रहे है। इनका बस चले तो श्मसान की भूमि पर महल बना दे।

धरने पर बैठे श्रवण सालवी ने बताया कि नगरपालिका द्वारा चारदिवारी का निर्माण कार्य नहीं करवाए जाने के कारण समाज के लोगों ने 07 जुलाई को चारदिवारी का कार्य शुरू कर दिया। कार्य शुरू करने के कुछ देर बाद उपखण्ड अधिकारी ने मौके पर आकर कार्य रूकवा दिया। उन्होंने बताया कि लोगों ने फोन पर शिकायत की, जिसके बिहाफ पर वे काम बंद करवाने आए है। इससे साफ जाहिर हो जाता है सालवी समाज के श्मसान की चारदिवारी के कार्य बंद करवाने में निश्चित तौर पर बड़े राजनेताओं का हाथ भी है। सालवी समाज के लोगों ने एसडीएम को सच्चाई से अवगत कराया, जनसहभागिता योजना के चारदिवारी की स्वीकृति की बात भी बताई पर वे नहीं माने और काम बंद करवाकर ही माने।

उसके बाद से सालवी समाज के लोग चारदिवारी निर्माण की मांग को लेकर श्मसान पर बैठ गए। जो अभी तक बैठे हुए है। 10 जुलाई को दोपहर में उन्होंने जिला कलेक्टर के नाम एसडीएम को ज्ञापन दिया और चेतावनी दी है कि अगर 3 दिन में चारदिवारी का कार्य आरम्भ नहीं किया गया तो वे आमरण अनशन करेंगे।

समाज के लोग श्मसान भूमि में धरने पर बैठे है, यहीं पर खाना बनाकर खाया है, सुनवाई नहीं हुई तो यहीं पर आमरण अनशन करने की चेतावनी दे रहे है। कुछ लोग सो चुके है, कुछ आगे की रणनीति बना रहे है।

Monday, November 28, 2016

मेरे पास बीबी है, बच्चे है, घर है, गाड़ी है, तुम्हारे पास क्या है ? हैं

फाल्कन ट्रावेल्स मुझे अलसुबह मुम्बई पहुंचा देगी इसकी उम्मीद नहीं थी। ऐसा मालूम होता तों मैं 17 सितम्बर की शाम को उदयपुर से रवाना होता। खैर . . अब मुम्बई पहुंच गया हूं तो वैचारिक दोस्तों से मिलने की ठान ली। टाटा इंस्टीट्यूट अॅाफ सोशल सांइन्सेज मुम्बई के न्यू कैम्पस में पहुंचना था मुझे। एक साथी ने बताया था कि बांद्रा से बस पकड़कर वहां पहुंचना है लेकिन बस का नम्बर तो मैंनें उससे पूछा ही नहीं। अब ? अब क्या करूं ? बारिश भी हो रही थी। पास ही एक टैक्सी पड़ी थी, नाटे कद के ड्राइवर ने मेरी ओर देखते हुए ठोड़ी ऊपर करते हुए कहा - कहां जाओगे सर ? सर सुनकर अपन में भी सर वाली फिलिंग आ गई। मैंनें कहा - भाई मुझे चेम्बूर में देवनार बस डिपो के पास जो TISS का न्यू कैम्पस है ना, वहां जाना है। वो बोला बैठिए। मैं बोला-क्या लोगे ? उसने कहा- दूर है 350 रूपए लगेंगे। मैंनें कहा- मीटर नहीं है क्या ? उसने कार में बैठते हुए कहा - ये अच्छा है आप मीटर से चलिए। मैंनें मन में सोचा, साला कहीं बिल ज्यादा तो नहीं आ जाएगा, मीटर से चलने की कहने पर ये ड्राइवर लोग घूमा-फिरा के किलोमीटर निकालते है। कन्फ्यूज्ड था लेकिन हिम्मत की और कह दिया - मीटर से चलो। उसके चेहरे की खुशी देखकर मुझे लग रहा था कि वो कुछ ना कुछ गड़बड़ी करेगा।
अभी कार एक-दो किलोमीटर ही चली थी, मैंनें उससे पूछा-क्या नाम है आपका ? वो बोला पंकज कुमार (30 Year)।
मैंनें पूछा-कहां के हो ?
उसने कहा-बिहार का हूं।
मैंनें फिर पूछा- यहां कब आए ?
उसने कहा - 15 साल हो गए।
मैं चाह रहा था कि वो अपनी पूरी कहानी बताए लेकिन वो मेरे सवाल का जवाब देकर रूक जाता था। मैंनें सवाल करने का अंदाज बदला।
मुम्बई तो बड़ा महंगा शहर है, मंहगाई के इस दौर में घर चल जाता है ?
बस पंकज कुमार शुरू हो गया, बोला - हां सही कह रहे है, मुश्किल तो बहुत है, पर क्या करें, 15 साल से यहीं रह रहे है तो सेट हो गया है। दो बच्चों का, पत्नि का, बूढ़े मां-बाप का और दो छोटे भाईयों का देखना पड़ता है। बहुत मेहनत की तब जाकर इतना कर पा रहा हूं। 8 साल से तो यह कार चला रहा हूं। अपनी ही है। 6 लाख में नई आती हैं।
बिहार के गया स्टेशन से 10 किलोमीटर दूर ही है मेरा गांव। एक बड़ा भाई है जो दिल्ली में सेट हो गया है। भाभी और बच्चे भी उसी के पास है। गांव में पूरे 10 बीघा जमीन है। ट्यूबवेल खुदवा दी मैंनें। बंटाई पर दे देता हूं। खूब अनाज हो जाता है परिवार के लिए। दो भाई है, एक तो प्राईवेट संस्थान से आईटीआई में डिप्लोमा कर रहा है, दूसरे ने एग्जाम देकर इंजीनियर में प्रवेश पाया है, उसकी फीस कम है। प्राईवेट वाले की अधिक है। उसके लिए पूरे 60,000 रूपए का बंदोबस्त करना पड़ा था मुझे। दोनों भाईयों की पढ़ाई का खर्चा में ही उठाता हूं। दोनों को अलग-अलग बाइक दिलवा रखी है। कॅालेज जाने के लिए चाहिए न सर। अभी भाईयों को सारा खर्च में देता हूं, क्या है क नहीं दो तो गांव वाले हसेंगे, कि दोनों भाई बाहर चले गए, जिन्दगी भर बोलेंगे कि भाईयों को पढ़ाया नहीं। अपने को इज्जत से रहने का। गांव में इज्जत तो बना के रखनी पड़ती है न सर। मैं तो पढ़ नहीं पाया। 10 तक ही पढ़ा। हां अभी बीबी को पढ़ा रहा हूं। वो अभी गया से ही बी.ए. कर रही है। इस साल फाइनल ईयर है उसका। मैं छोड़ के आ जाता हूं वहां। वो पढ़ना चाह रही है तो अपन काय को रोके?
अच्छा आप कब आए यहां ? और क्यों आए ? इतने महंगे शहर में घर बना लिया, इतना सब कैसे किया ? मैंनें पूछा
सर मैं 2001 में मुम्बई आ गया। मैं तो नहीं आता पर क्या है मां-बाप शादी करवाने पर तुले हुए थे। सर आप ही बताओ, उस समय मैं कुछ कमाता नहीं था तो शादी कैसे कर लेता ? शादी करना मतलब जिम्मेदारी संभालना। मेरे गांव के बहुत लड़के यहां मुम्बई में अॅाटो चलाने का काम करते थे। मैं भी घर से भाग कर यहां आ गया। बहुत तकलीफें झेली सर यहां। क्या बताउं आपको, खाने को तक नहीं मिलता था। कुछ दिनों तक एक दोस्त के साथ गाड़ी चलाई उसके बाद बस चलाने का काम मिल गया। बस चलाई, फिर एक सेठ मिल गया। बरसों तक उसकी कार चलाई। सेठ अच्छा आदमी था। खूब पैसे वाला था। पर उसके परिवार वाले हरामी थे। कुछ सालों तक तो ठीक चला लेकिन बाद में कभी 2-5 मिनिट लेट हो जाता तो परिवार वाले चिड़चिड़ करते थे। अपने को यह सब पसंद नहीं था। मैंनें तो सेठ को बोल दिया कि मैं अब काम नहीं करूंगा।
पर सर सेठ था बहुत अच्छा। उसने मुझे बचत करना सिखाया। मैंनें पूरे छः साल तक सेठ की कार चलाई थी। उसने ही मुझे 2.50 लाख रूपए में घर दिलवाया। सेठ मुझे 8000 रूपए देता था। इसमें से 5000 हर महीने की किस्त कट जाती थी। मेरा तो कोई खर्चा थाइज नइ। 2010 में मैंनें शादी की। पहीले घर बनाया, फिर शादी की। पहीले शादी कर लेता तो बीवी को कहां रखता ? सर, घर तो पहीले चाहिए न ?
जब से पंकज कुमार बोलने लगा तब से मैं - सही बात है, सही बात है कहता जा रहा था। बीच-बीच में कहानी समझने के लिए कुछ हल्के फुल्के सवाल भी करते जा रहा था।
उसकी कहानी दनादन चल रही थी.... मेरे दो बच्चे है। दोनों स्कूल जाते है। मैं दूसरों के भरोसे नहीं रहीता। मैं खूद बच्चों को स्कूल छोड़ने जाता हूं और लाता भी खूद ही हूं। धंधे पे बाद में जाने का, पहीले घर का मामला देखने का। सर बच्चों की पढ़ाई पर ही ज्यादा खर्च हो रहा है। पर कमा भी तो उन्हीं के लिए रहे है न सर। बाकी क्या है, अपना तो हो गया है।
अब क्या है कि मुम्बई में सेट हो गया है अपना मामला। बीवी बच्चे सब यहीं है। कभी कभार गांव जा आते है। गांव में करे भी तो क्या करें। गांव में खर्चा तो कम है। पर कमाई नहीं है। यहां कमाई अच्छी है पर खर्चा बहुत है। पर एक बात है सर यहां कभी हाथ खाली नहीं रहता है। बच्चों को अच्छा ऐज्यूकेशन मिल रहा है। वहां क्या करेगा गांव में ? हैं ?. . . इधर 25-30 हजार रूपया महीना का कमा लेता हूं, कुछ रूपए गांव भी भेजता हूं। बचत भी करता हूं।
मैं जब मुम्बई में आया तब इतना ट्राफिक नहीं था, धीरे-धीरे बढ़ा। ट्राफिक बढ़ने से हमारा धंधा बढ़ता है सर।
अच्छा सर अन्दर ले लूं ? बात बंद करके वह बोला।
क्या न्यू कैम्पस आ गया ? मैंनें पूछा।
कार TISS के न्यू कैम्पस के बाहर आ चुकी थी। वो मुझे कैम्पस के अंदर तक छोड़कर गया।
पंकज के साथ हुई बातचीत का दौर समाप्त हो गया। जाते वक्त वो जो मुस्कुराया... उसे देखकर मुझे लगा जैसे वो कह रहा है -
मेरे पास बीबी है, बच्चे है, घर है, गाड़ी है, तुम्हारे पास क्या है ? हैं ?

आखिर कब तक मरीजों को चारपाई पर लाद कर ले जाना है हमें

गोगुन्दा (उदयपुर) - पाटिया ग्राम पंचायत के राजस्व गांव भारोड़ी की मेघवाल बस्ती के बाशिन्दों को रास्ता नसीब नही है। भारोड़ी गांव व मेघवाल बस्ती के बीच में बड़ा नाला है। वर्षा के मौसम में कई महीनों तक इस नाले में पानी का तेज बहाव रहता है। बहाव के कारण बच्चे कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाते है। वहीं किसी के बीमार होने की स्थिति में उसे अस्पताल ले जाना मुश्किल हो जाता है। कई बार प्रस्ताव लिखवाए, सरकार आपके द्वार, प्रशासन आपके द्वार जैसे अभियान में इस मुद्दे को उठाया लेकिन अभी तक पुलिया का निर्माण नहीं करवाया गया है।  

बुधवार शाम बस्ती के धर्मा लाल मेघवाल (उम्र-33) को तेज बुखार आ गया। उसी समय तेज बारिश भी आ गई। नाले में पानी भी अधिक आ गया। धन्ना लाल को तुरन्त अस्पताल ले जाना था लेकिन बस्ती के लोग बारिश व नाले में बह रहे पानी के आगे बेबस थे। अंत में सबने हिम्मत की और मरीज को चारपाई पर लिटाकर नाला पार करवाकर सड़क तक ले गए। वहां से मरीज को जीप द्वारा गोगुन्दा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया। 

60 वर्ष के बुर्जुग प्रताप लाल मेघवाल अपनी बात शुरू करने से पहले ही रो पड़े। बताते है कि उन्होंने अपनी बस्ती में ऐसे हालात सैकड़ों बार देखें है। कभी बच्चों ने आंखों के सामने दम तोड़ा, कभी गर्भवती महिलाएं रात-रात भर तड़फती रही। हर बार बेबसी पसरी रही। वे कहते है कि हम गरीब है और दलित भी। सरकार ने पर्यटन स्थलों, धार्मिक स्थानों यहां तक की एक मंदिर पर जाने के लिए करोड़ों रूपए की सड़क बना दी लेकिन हम 250 से अधिक की आबादी वाली इस बस्ती में जाने के लिए पुलिया नहीं बना सकी। 

गांव के एक युवा तुलसीराम मेघवाल ने बताया कि इनकी बस्ती मुख्य रोड़ से महज 500 मीटर दूर है। बस्ती में जाने के लिए रास्ता तो है लेकिन एक बड़ा नाला मुसीबत बना हुआ है। बारिश का मौसम आते ही इस बस्ती के बाशिन्दों पर परेशानियों का पहाड़ टूट पड़ता है। बस्ती व रोड़ के बीच में इस बड़े नाले पर एक पुलिया की जरूरत है। बस्ती के लोग बरसों से पुलिया की मांग कर रहे है लेकिन अभी तक इनकी मांग पूरी नहीं हुई है। उन्होंने बताया कि बारिश के मौसम में बच्चे कई महीनों तक स्कूल नहीं जा पाते है। 

दलित आदिवासी एवं घुमन्तु अधिकार अभियान राजस्थान (डगर) के लखन सालवी ने कहा कि दलित बस्ती की उपेक्षा की जा रही है। नाले के दोनों ओर किनारे पर प्रभावशाली लोगों ने अतिक्रमण कर रखा है, प्रशासन अतिक्रमण नहीं हटवा पा रहा है। इस कारण पुलिया का निर्माण भी नहीं करवाया जा रहा है। 250 की जनसंख्या वाली बस्ती में बारिश के दिनों में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व एएनएम नहीं पहुंच पाती। लोगों को राशन की दूकान तक जाने में समस्या आती है। सरकार आपके द्वार अभियान के दौरान इस समस्या को गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया के ध्यान में लाया गया जब वे पंचायतीराज व ग्रामीण विकास विभाग में मंत्री थे लेकिन वे भी दलितों की इस समस्या का समाधान नहीं करवा पाए। यह सरकार की नाकामी है। 

बीडीओ जानू व एएओ सुखवाल को दी विदाई, विश्नोई का किया स्वागत

गोगुन्दा - गोगुन्दा पंचायत समिति के विकास अधिकारी बीरबल सिंह जानू और एएओ मनोहर लाल सुखवाल को आज विदाई दी गई। बीरबल सिंह ने 21 मार्च 2016 को पदभार ग्रहण किया था। 5 अक्टूबर को उनका स्थानान्तरण नागौर जिले में हो गया। उनकी जगह मनहर विश्नोई गोगुन्दा के नए विकास अधिकार होंगे। जानू की विदाई से पूर्व विश्नोई को पदभार ग्रहण करवाया गया। 

बीरबल सिंह ने पंचायत समिति के बीडीओ के तौर पर केवल 6 माह कार्य किया लेकिन इस दौरान उन्होंने अपने व्यवहार से क्षेत्र के लोगों में, जनप्रतिधियों में और कर्मचारियों के दिलों में जगह बना ली। शुक्रवार को पंचायत समिति सभागार में विदाई समारोह आयोजित किया गया। समारोह को सम्बोधित करते हुए विधायक प्रताप गमेती ने कहा कि बीरबल सिंह ने 6 माह में न केवल व्यवस्था को ठीक किया बल्कि तंत्र का सक्रिय कर विकास कार्यों को गति प्रदान की इसके लिए वे हमेशा याद किए जायेंगे। 

इस अवसर पर प्रधान पुष्कर तेली ने कहा कि बीरबल सिंह जानू को कार्य प्रणाली हम सभी को प्रेरणा प्रदान करती है। कामों का समय पर निपटारा करना और सकारात्मक सोच के साथ काम करना उनकी खासियत है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन के कार्य हो या ग्राम पंचायतों को खुले में शौच मुक्त बनाने का कार्य हो, विकास अधिकारी ने हमेशा आगे रहकर कार्य किया और अन्य कर्मचारियों, अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों को भी सक्रिय किया। 

सभा के दौरान बीरबल सिंह जानू ने सभी को धन्यवाद दिया। उन्होंने कहा कि गोगुन्दा क्षेत्र के लोगों ने उन्हें बहुत स्नेह दिया। उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र के लोगों में सकारात्मकता है, सकारात्मकता के कारण ही विकास को गति दी जा सकी। 

समारोह में उपस्थित विभिन्न ग्राम पंचायतों के सरपंच, वार्ड पंच सहित अन्य जनप्रतिनिधियों, सरकारी कर्मचारियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं व अन्य विभागों के अधिकारियों ने नम आंखों से बीरबल सिंह जानू और एएओ मनोहर लाल सुखवाल को विदाई। 

करवा चौथ आज, गांवों में दुल्हन की तरह संवरी महिलाएं


करवा चौथ आज, गांवों में दुल्हन की तरह संवरी महिलाएं
गोगुन्दा - आज कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्थी यानि करवा चौथ है। महिलाएं अपने पति की लम्बी उम्र की कामना को लेकर करवा चौथ का व्रत रखेंगी। सुहाग पर्व करवा चौथ पूरे जिले में धूमधाम से मनाया जाता है। शहरों में आज महिलाएं घरों से बाहर निकलती है, नए वस्त्र धारण करती है, सजती संवरती है। कस्बों व गांवों में भी इस पर्व का माहौल देखने को मिलता है। ब्यूटीर्पालरर्स पर इस दिन महिलाओं की अच्छी भीड़ रहती है। करवा चौथ के एक दिन पूर्व ही महिलाएं सजने-संवरने लगती है। ब्यूटीपार्लर्स पर महिलाओं की भीड़ उमड़ रही है, वहीं ब्यूटीशिएन्स की अच्छी चांदी हो रही है।
 
गांवों व कस्बों में धूल फांक रहे ब्यूटीपार्लर्स पर सुहागिनों की भारी भीड़ देखी जा रही है। मोटागांव गोगुन्दा की महिलाएं भी सजने संवरने में पीछे नहीं है। यहां 10 से अधिक ब्यूटी पार्लर है। सभी पार्लर पर सोमवार से ही भीड़ है। 

राजपूतों का मोहल्ला स्थित मुस्कान ब्यूटीपार्लर की किरण वेद ने बताया कि पिछले कुछ सालों से करवा चौथ पर सजने-संवरने के लिए महिलाओं की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। इस पर्व पर महिलाएं दुल्हन की तरह सजती है। उन्होंने बताया कि करवा चौथ के दिन भीड़ अधिक रहने के कारण महिलाएं करवा चौथ से दो-चार दिन पहले से ही आना शुरू हो जाती है।

डेढ़ साल बाद किया मजदूरी का भुगतान

मजदूरी भुगतान की मांग को लेकर मिनी बैंक के बाहर बैठी महिलाएं
गोगुन्दा - 40 मजदूरों में से 29 मजदूरों को डेढ़ साल पूर्व महानरेगा में किए गए कार्य का 19725 रूपए का भुगतान बुधवार को गोगुन्दा मिनी बैंक में किया गया। गोगुन्दा पंचायत समिति क्षेत्र के राणा गांव के 40 श्रमिकों ने महानरेगा के अन्तर्गत जून-2015 में काम किया था। तब काम का भुगतान मजदूरों के मिनी बैंक के खातों में जमा होता था। इस काम का भुगतान पंचायत समिति द्वारा जुलाई 2015 में मजदूरों के मिनी बैंक खाते में जमा करवा दिया गया था मगर मिनी बैंक द्वारा मजदूरों को भुगतान नहीं किया जा रहा था। 

मजदूरी भुगतान की मांग को लेकर मजदूरों ने ग्राम सेवक से लेकर जिला कलक्टर को अपनी समस्या बताई थी लेकिन भुगतान नहीं किया गया। महिलाओं को हर बार आष्वासन दे दिया गया। 

मंगलवार को पीड़ित मजदूरों अपनी मांग को लेकर विकास अधिकारी मनहर विश्नोई को पुनः ज्ञापन दिया था। विकास अधिकारी ने भुगतान करवाने का आश्वासन देकर बुधवार को मजदूरों को मिनी बैंक जाने को कहा था। बुधवार को महिलाएं गोगुन्दा स्थित मिनी बैंक पहुंची, दोपहर 12 बजे तक मिनी बैंक ताला लगा हुआ था। महिलाएं मिनी बैंक के बाहर ही धरने पर बैठ गई और विकास अधिकारी से इसकी शिकायत की। विकास अधिकारी ने मिनी बैंक पहुंच कर मिनी बैंक के मैनेजर को लताड़ लगाई तब जाकर मजदूरों को बकाया मजदूरी का भुगतान किया गया। 

मजदूरी भुगतान की मांग को लेकर मिनी बैंक के बाहर बैठी महिलाएं
मिनी बैंक के कर्मचारियों के विरूद्ध हो कार्यवाही

अरावली निर्माण मजदूर सुरक्षा संघ के अध्यक्ष तखत सिंह राजपूर का कहना है कि जून-15 में मजदूरों ने काम किया। जुलाई-15 में पंचायत समिति द्वारा वेज लिस्ट जारी कर भुगतान राशि के एफटीओ मिनी बैंक को जारी कर दिए गए। भारी दबाव लगाने के बाद मिनी बैंक द्वारा डेढ़ साल बाद भुगतान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि मिनी बैंक के विरूद्ध जिला कलक्टर से शिकायत की जाएगी।
सामाजिक कार्यकर्ता गुलाबी परमार का कहना है कि ऐसे मामलों में मजदूरों को मजदूरी का भुगतान ब्याज सहित करना चाहिए एवं दोषी कर्मचारियों के विरूद्ध कार्यवाही करनी चाहिए। 

दिवाली पर विधायक डॉ. बालूराम चौधरी को खुला-पत्र

आदरणीय (हमारे हर दिल अजीज मित्र के जीजाजी होने के नाते) चौधरी साहब, दिपावली की शुभकामनाएं कि ईश्वर आपको ऐसी मति दे कि आप बतौर विधायक भी कुछ करें। एज ए डॉक्टर तो आप अपने चौधरी हॉस्पीटल के लिए बहुत कुछ कर ही रहे है।

आप मुझे जानते भी नहीं है। आपके टिकट की घोषणा होने के बाद से आपके विधायक चुने जाने तक मैं आपकी टीम से जुड़ा रहा था। मुझे बहुत खुशी हुई थी आपके विधायक चुने जाने पर। क्योंकि आप से पहले हमारे क्षेत्र के एक प्रभावी नेताजी बाल विवाहों, मृत्युभोजों और रातीजगा कार्यक्रमों में जाकर अफीम पीने में और सत्ता के मद में मस्त थे। नैतिक पतन हो चुका था। तमाम पार्टियों के नेता उसके आगे नतमस्तक थे। अंततः जो मस्त थे वे पस्त हो गए और आप विधायक बन गए, आप विज्ञान पुत्र थे, आपसे उम्मीद जगी कि आप हमारे क्षेत्र का विकास करेंगे। हालांकि मेरी उम्मीद अभी जिंदा है, क्योंकि अभी आपके कार्यकाल का बहुत समय शेष है। 

श्री चौधरी जी, आप को मालूम ही होगा कि सहाड़ा विधानसभा क्षेत्र की सहाड़ा व रायपुर तहसील क्षेत्र से प्रतिदिन 20 से 25 लोगों को सोनोग्राफी करवाने के लिए भीलवाड़ा जाना पड़ रहा है। इनमें सर्वाधिक संख्या गर्भवती महिलाओं की है। गरीब परिवारों की गर्भवती महिलाओं को तो परिजन बसों में ले जाते है, जिसमें न केवल धन बल्कि समय भी अधिक लगता है। कई बार कार, जीप किराए पर ले जाने पड़ते है, ऐसे में उनका खर्च और बढ़ जाता है। भीलवाड़ा जाकर भी हाथोंहाथ सोनोग्राफी नहीं हो पाती है, कई-कई घंटों के इंतजार के बाद नम्बर आता  है। 
मैं आपको याद दिलाना चाहता हूं कि अपनी चुनावी सभाओं के दौरान आपने घोषणा की थी कि आप गंगापुर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सोनोग्राफी मशीन लगवायेंगे। मैं पूरी ईमानदारी से बयां कर रहा हूं कि इस विधानसभा क्षेत्र की जनता ने आपसे कम से कम चिकित्सा व्यवस्था को बेहतर बनाने की उम्मीद तो की ही थी। हमने उम्मीद की थी कि आप स्वास्थ्य केंद्रों, उप स्वास्थ्य केंद्रों व सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर व्यवस्थाएं माकूल कर देंगे। आप से पहले हमें सबने बारी-बारी से लूटा। पर आपसे हमें यह उम्मीद थी कि आप हमें नहीं लूटेंगे। 
विधायक बनने के बाद आप गंभीर रूप से बीमार हो गए थे, लम्बे समय तक आप बीमार रहे। बीमारी के कारण शायद आप पुरानी बहुत सारी बातें भूल गए। शायद आप अपने चुनावी वायदों को भी भूल गए। वैसे आपके बहुत सारे चुनावी वादों को हम भी भूल चुके है। गाहे-बगाहे आपका एक चुनावी वादा हमें याद आ जाता है और वो है - सोनोग्राफी मशीन वाला। मैंनें सुना है कि अब आप पूर्ण रूप से स्वस्थ है, ईश्वर से अरदास है कि वो आपको हमेशा स्वस्थ रखें। चूंकि आप पूर्ण रूप से स्वस्थ है और विधायक का दायित्व निभाने को सक्षम है, अतः आपसे निवेदन है कि आप अपने चुनावी वायदे को तुरन्त पूरा कर दिजिए। गंगापुर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में सोनोग्राफी मशीन लगवा दिजिए और यह काम आप आसानी से करवा सकते है। 

आपको याद दिला दूं कि चिकित्सा विभाग ने सोनोग्राफी से जुड़ी गांवों की इस समस्या से राज्य सरकार को अवगत कराया था। राज्य सरकार ने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सोनोग्राफी मशीनें लगवाने की पहल की। इसके लिए विधायक रिकमण्डेशन भेज सकते है और विधायक मद से सोनोग्राफी मशीन लगवाने की स्वीकृति भी दे सकते है। साथ ही सरकार ने कई डॉक्टरों को रेडियोलॉजिस्ट बनाने की शुरूआत की। वर्तमान में कई डॉक्टर उदयपुर स्थित आरएनटी मेडिकल कॉलेज में रेडियोलॉजिस्ट का डिप्लोमा/प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे है। जिन-जिन सामुदायिक केंद्रों पर सोनोग्राफी मौजूद होगी वहां-वहां इन रेडियोलॉजिस्ट्स को नियुक्तियां दी जाएगी। आपको यह जानकार खुश होना चाहिए कि गंगापुर निवासी डॉक्टर सतीश डाबी के सुपुत्र मनोज डाबी भी रेडियोलॉजिस्ट का डिप्लोमा कर रहे है। 

आपके विधानसभा क्षेत्र के सबसे बड़ा चिकित्सालय यानि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र गंगापुर में स्थित है। आवश्यतानुरूप भवन है। संध्या नलवाया जैसी अनुभवी डॉक्टर यहां नियुक्त है। बस कमी है तो सोनोग्राफी मशीन की। सोनोग्राफी लगभग 15 लाख रूपए में आती है। आप विधायक मद से यह मशीन लगवा सकते है।

गंगापुर के निजी महाविद्यालय को सरकारी महाविद्यालय में मर्ज करने या नया सरकारी महाविद्यालय खुलवाने की हमारी मांग भी आपसे है। राजस्थान के 10वीं-12वीं पास विधायकों ने अपने विधानसभा क्षेत्रों में महाविद्यालय खुलवा दिए, आवासीय स्कूलें खुलवा दी, खैल मैदान बनवा दिए, गिनाने के लिए बहुत कुछ है मेरे पास लेकिन फिलहाल यह सब गिनाने के पीछे मकसद आप विधायकों के कार्यों की तुलना करना नहीं है। मकसद है कि आप बहुत कुछ कर सकते है, फिर कर क्यों नहीं रहे है ?

मैं ही नहीं इस विधानसभा क्षेत्र के कई लोग फोन पर आपसे बात करना चाहते है, कई जनप्रतिनिधि व प्रशासनिक अधिकारी आपके ऐसे ही चुनावी वायदों को याद दिलवाने या उन्हें पूरा करवाने के लिए आपसे फोन पर बात करना चाहते है पर आपका अजय है कि आप से बात ही नहीं कराता है। सर आप ऐसे अजय को अपने साथ रखेंगे तो मैं पूरे दावे के साथ कह सकता हूं कि आगे आप कभी विजय नहीं पायेंगे। तुरन्त बदलिए इसे।

और हे! विधायक महोदय,

आप को बैसाखियों की जरूरत नहीं है। आपके लेफ्ट व राइट में ये जो दो बैसाखियां है ना, इन्हें तुरन्त हटाइए . . . ये दीमक लगी बैसाखियां जो खुद बहुत कमजोर है आपको अधिक कमजोर करेगी।

कई लोग ऐसा कह रहे है कि डॉ. चौधरी अपने कार्यकाल में सोनोग्राफी मशीन नहीं लगायेंगे। वो तो  मोदी लहर में विधायक बन गए और इन पांच सालों का लाभ ले रहे है। वो डॉ. रतन लाल जाट व भाजपा के लिए कुंआ खोदकर पुनः चौधरी हॉस्पीटल की मुख्य कुर्सी पर बैठ जायेंगे। हालांकि मुझे उनकी बातों में दम नजर नहीं आता है लेकिन अगर मशीन नहीं लगी तो उन लोगों की बातें सही ही साबित होगी। पिछले दो सालों में कई विधायकों के कार्य देखें, एक विधायक ने आम जनता की मांग पर सरकारी महाविद्यालय खुलवा दिया, एक ने आम जनता की मांग पर 4 करोड़ की सड़क स्वीकृत करा दी, अनेकों कार्य करवा दिए।

सोनोग्राफी मशीन लगा दिए जाने से किसी एक को नहीं बल्कि क्षेत्र की आम जनता को राहत मिलेगी।  इस खुले पत्र को पढ़ने के बाद या तो आप जनहित में सोनोग्राफी मशीन लगवायेंगे या फिर व्यक्तिगत दुर्भावना रखकर सोनोग्राफी मशीन नहीं लगवायेंगे । 

आपके पॉजिटीव या नेगेटिव रेपोन्स की प्रतिक्षा में

लखन सालवी 
आपके विधानसभा क्षेत्र के कोशीथल गांव का एक अदना-सा युवक।