Wednesday, March 20, 2019

गुरू बिन गौर अंधेरा - 2 : इस तरह हासिल हुई प्राथमिक शिक्षा (मैं गुरूजनों को भजन सुनाकर भाग जाया करता था)

Lakhan Salvi : 9828081636
बंशी महाराज की पाठशाला में आखर ज्ञान और गिनती व पहाड़ें सीख लिए तो पिताजी ने मुझे उला बसस्टेण्ड वाले राजकीय प्राथमिक विद्यालय में भर्ती करवा दिया। इस स्कूल का वो स्वर्णिम समय था। 35 वर्ष की आयु में से देखा जाए तो सबसे अच्छा समय वो ही था जो इस स्कूल में बीता। स्कूल में उत्तर पूर्व में पूर्व से पश्चिम की ओर क्रमवार बड़े-बड़े कमरे बने हुए थे, जिनके आगे बरामदा था और केंद्र में बड़ा सा चबूतरा, जिसे हम स्टेज कहते थे। स्टेज के आगे बहुत बड़ा ग्राउण्ड, जिसके एक कोने में कब्बड्डी का व स्टेज के ठीक सामने खो-खो का ग्राउण्ड तथा उसके बगल में ओपन पानी का होद (टेंक) था। टैंक को पानी पीने की टंकी से एक ओपन कच्ची नाली के द्वारा जोड़ रखा था, ताकि टंकी से व्यर्थ बहने वाला होद में एकत्र हो जाए। इस टैंक में कछुएं, केकड़े और मैंढ़क तैरते दिखाई देते थे, जिनसे हम बालमन बहुत खेलते थे। 
जब मैं बंशी महाराज की पाठशाला में पढ़ता था तब हम गांव के बीच हमारे मोहल्ले में रहते थे। मुझे प्राथमिक विद्यालय में भर्ती करवाने के दौरान ही पिताजी ने बसस्टेण्ड के पास व राजकीय प्राथमिक विद्यालय के भवन के एकदम समीप मकान बना लिया था। यह 1987-88 की बात है।

प्राथमिक स्कूल के चारों ओर आदमकद दिवारें थी। मुख्यद्वार पर लोहे का बड़ा गेट था। इस स्कूल में मैं पहली से लेकर 5वीं तक पढ़ा। ब्लू कलर का शर्ट और खाकी कलर की हाफ पेंट, ये स्कूल का ड्रेस कोड़ था।  स्कूल में ये गुरूजन थे और उनसे क्या सीखा और गुरूजनों के साथ क्या वाक्ये हुए पढ़िए इस भाग में - 

यह आज की तस्वीर है, स्कूल के बाहर ऐसी गंदगी पहले नहीं रहती थी
रूस्तम जी (प्रधानाध्यापक) : ये मस्जिद के पास रहते थे। बाद में भीलवाड़ा चले गए। हम बच्चों में इनको लेकर बड़ा भय था। बुलंद आवाज थी, हम सभी उनसे काफी डरते थे। पर मैंनें कई मौको पर देखा वो क्रूर नहीं थे। वे मन से स्नेही थे। बच्चों पर नियंत्रण के लिए वे रोद्र रूप दर्शाये रखते थे। 
सीख - कहां, कब और कैसा व्यवहार करना।  

शिवप्रसाद जी शर्मा - (रायपुर वाले) : रायपुर से रोजाना अपडाउन करते थे। एकदम सफेद जक्क पेंट-शर्ट पहनते थे। शर्ट सलीके से इन रहती थी, ब्लैक बेल्ट लगाते थे। उनकी आवाज बड़ी तेज थी लेकिन वे हंसते भी खूब थे। बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ खो-खो, कब्बड्डी जैसे कई खेल सिखाते थे। शायद वे शारीरिक शिक्षक थे। सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर होती थी इसलिए वे मेरे सबसे प्रिय थे। 
सीख - नैसर्गिक चरित्र नाम की चिड़िया भी होती है, जीवन को केवल नियमों में ही नहीं बांधे। 

सोहन जी बागरिया - (गंगापुर) : ये गंगापुर के मैलोनी के थे। तात्या टोपे के जैसी मूंछ रखते थे। इनके संदर्भ कहा जाता था कि ये कड़ाके की सर्दी में भी ठण्डे पानी से नहाते है, रोजाना नहाते है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमने टूर्नामेंट के दौरान देखा जब एक साल हमारी स्कूल की कई खेलों की टीमों को काला का खेड़ा में आयोजित टूर्नामेंट में ले जाया गया था। ये पेंट-शर्ट (शर्ट इन), बेल्ट व जूते पहने हुए ही आते थे। नियमित जीवन शैली के ये तगड़े उदाहरण थे। जो बच्चे पढ़ते नहीं थी उनकी ये खूब सूताई करते थे। मैं इनसे काफी डरता था। ये खानाबदोश बागरिया समाज के पहले ऐसे व्यक्ति थे जो अन्य समाजों के लोगों पर भी अपनी गहरी छाप छोड़े हुए थे। ये पढ़ाने के साथ गेम्स भी सीखाते थे।
सीख - नित नियम का जीवन में महत्व। 

लक्ष्मीकांता जी पालीवाल - (कोशीथल) : अध्यापक गणों में तीन सबसे बड़े थे। रूस्तमअली जी, असगर अली जी और लक्ष्मीकांता बेनजी। लक्ष्मीकांता बेनजी का हम बच्चों में खौफ रहता था। उनका रवैया स्कूल में ठीक वैसा था जैसा घर पर दादी का होता है। वे बोलती सबसे लास्ट वाले कमरे में और आवाज आती सबसे फर्स्ट कमरे में, मल्लब इतनी तेज आवाज थी उनकी। मैं एक बार उनसे नाराज हो गया, वो नाराजगी आज तक मन में है। दरअसल, एक दिन नहाकर बालों में बिना तेल लगाए मैं स्कूल चला गया, थोड़ा लेट भी हो गया था इसलिए प्रार्थना के समय लेट आने वालों की लाइन में खड़ा रहना पड़ा। लक्ष्मीकांता बेनजी लेट आने वालों का रिमाण्ड ले रही थी, वो सजा देने के नाम पर कान खिंचती थी। मेरा नम्बर आया तो - बोली बालों में तेल क्यों नहीं लगाया ? मैं बोला - भूल गया बेन जी। तब उन्होंने मेरे कान खिंचते हुए मेरे बड़े पाप्पा के लड़के लीलाधर को आवाज देकर बुलाया, उसके बालों में ज्यादा तेल दिखाई दे रहा था। बेन जी हम दोनों के सिर आपस में रगड़वाए, जैसे सांड एक दूसरे से लड़ते है, एक दूसरे को सिर लगाकर . . . ठीक वैसे ही। उस दिन मुझे बहुत शर्मन्दगी महसूस हुई। ये बात शायद न तो लक्ष्मीकांता बेनजी को याद होगी और ना ही लीलाधर या अन्य देखने वालों को लेकिन मुझे पूरा दृश्य साफ-साफ याद है। 
सीख - टेक ओवर करना, कैप्चर करना। 

असगर अली जी - (रायपुर वाले) : ये रायपुर के थे। बच्चों को सजा देने की सबकी अलग-अलग स्टाइल होती है, ये कांख के नीचे बाजू के अंदर की तरफ चुंटिया (चिमटी काटना) भरते थे। पर उनका सानिध्य बहुत अच्छा लगता था। 
सीख - अपने काम को प्राथमिकता देना। 
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जब मैं गुरूजनों को भजन सुनाकर भाग जाया करता था

हीरा लाल जी सुथार - (रायपुर वाले) : सबसे लम्बे मारसाब थे ये। लम्बे और पतले दूबले भी। हर वक्त हंसते रहते। चलते ऐसे जैसे उचकते उचकते चल रहे हो। हाथ एक छोटा पर्स रहता था इनके। ये लकड़ी की स्केल से पिटाई करते थे। मारते तो ऐसा लगता हल्के से मार रहे है लेकिन लगती बहुत तेज थी। 

बहुत दुःख के साथ बता रहा हूं कि एक बार मैंनें इनके साथ बदतमिजी कर दी। दरअसल मेरा स्वभाव बचपन से ही ऐसा रहा है कि मैं गलत को बर्दास्त नहीं कर सकता। शायद तब मैं कक्षा 4 या 5 में पढ़ता था। एक दिन इंटरवेल के बाद हिरा लाल जी की क्लास थी। मेरे पास मांगी लाल जी सालवी का रमेश सालवी बैठा हुआ था। हिरा लाल जी हम चुप रहने की चेतावनी देकर किसी काम से कक्षा से बाहर चले गए, वापस आए तब रमेश मुझसे कुछ कह रहा था। यानि मैं कुछ नहीं बोल रहा था, रमेश ने शायद मुझसे स्केल मांगा था। इधर हिरा लाल जी क्लास में एंटर हुए - रमेश को बोलते हुए और मुझे उसे स्केल देते हुए देख लिया और गुस्से में आकर मेरी हथेलियों पर स्केल से जड़ दी। मैं गुस्से से आग बबूला हो गया और दौड़कर क्लास के दरवाजे से बाहर निकल कर वापस क्लास की ओर मुड़ा, हीरा लाल जी को भजन सुना दिए और भाग गया। मल्लब मेरा कहना था कि मैं तो नहीं बोला था ना। फिर मुझे क्यों मारा ? मेरे साथ कभी अन्याय हुआ तो फिर मैंनें ये नहीं देखा कि अन्याय करने वाला कौन है। मैंनें अपने सामर्थ्य के अनुसार विरोध किया। (भाग कर मैं कहां जाता था और आगे क्या होता था, यह जानने के लिए आप पढ़ते रहे मेरा ब्लॉग) 
सीख - हंसते रहो, मस्त रहो। 

कौशल्या जी पालीवाल (खैराबाद के)  : कौशल्या बेनजी। ये सबसे सीधे साधे थे। बैलेंसिंग। ना अधिक लोकप्रिय और ना ही शून्य। इतने दुबले पतले की धक्का लग जाये तो नीचे गिर जावे। न कभी बच्चों को मारते देखा न ही डांटते डपटते। कोई गलती करता तो उसे ये हिकारत भरी नजरों से देखते थे, बस यह ही काफी था, बच्चों पर नियंत्रण के लिए। 
सीख - अपने काम से काम रखो। 

पहली व दूसरी क्लास में इन अध्यापकगणों ने ही हमें पढ़ाया। शायद में तीसरी कक्षा में आया तब अध्यापक सलेक्शन हुए थे, और गांव के ही सुरेश जी खटीक व धन्ना लाल जी रेगर, ये दो अध्यापक नए आए। 

धन्ना लाल जी रेगर - (कोशीथल वाले) : नाटे कद के धन्ना लाल जी मारसाब सरल स्वभाव के थे। शर्ट को पेंट में इन किए हुए धीरे-धीरे चलते आते थे। 

धन्ना लाल जी मारसाब ने बहुत ही कम समय में बच्चों में मन जगह बना ली थी। वे बहुत अच्छा पढ़ाते भी थे। मेरी ही बुरी किस्मत रही कि मेरे प्रिय अध्यापक होने के बावजूद भी मैंनें उनके साथ बुरा बर्ताव कर दिया। इसके पीछे भी कारण वहीं रहा गलत का विरोध करने का। मैं तीसरी में पढ़ता था, धन्ना लाल जी दूसरे या तीसरे कालांश में पढ़ाने आए थे। पढ़ाने के बाद बच्चों को रिडिंग करने का बोल के वे किसी काम से बाहर गए। कक्षा के बच्चे जोरजोर से बातचीत करने लग गए जिससे हो हल्ला होने लगा। फिर अचानक धन्ना लाल जी कमरे आए, दरवाजे के सीध में मैं बैठा हुआ था, उन्होंने गुस्से में आव देखा न ताव देखा मेरी हथेलियों पर बांस की लकड़ी से मार दी। बांस की लकड़ी का एक तंतु मेरी हथेली में घुस गया, जिससे मुझे भारी पीड़ा हुई। मुझे भयंकर गुस्सा आ गया, इतना गुस्सा पहले कभी नहीं आया। मुझे मारकर धन्ना लाल जी ब्लेक बोर्ड के पास कुर्सी पर जाकर बैठ गए। क्लास में सन्नाटा पसर गया। मैं अचानक उठा, दरवाजे के बाहर गया और अंदर झांकते हुए धन्ना लाल जी मारसाब को भजन सुना दिए और भाग गया। (भाग कर मैं कहां जाता था और आगे क्या होता था, यह जानने के लिए आप पढ़ते रहे मेरा ब्लॉग) 
सीख - सादगी व शांतचित्त।

सुरेश जी खटीक - (कोशीथल वाले) : बड़े डिप्लोमेटिक परसन। डिप्लोमेटिक की परिभाषा तो मुझे नहीं आती थी लेकिन मेरे जीवन में फर्स्ट परसन सुरेश जी खटीक ही थे जिनसे मैंनें डिप्लोमेसी को समझा। इनकी मुझे एक दो क्लासें ही याद है। जोर जोर से बोलकर पढ़ाते थे और ऐसे पढ़ाते थे कि हम बच्चे यह महसूस कर लेते थे कि वे किसी ओर को बताने के लिए हमें इस तरह पढ़ा रहे है। इसे आप या सुरेश जी मारसाब हम बच्चों का एन्ज्म्पशन भी कह सकते है। 

स्कूल के अंदर का दृश्य (यह चित्र आज ही लिए गए है।)
तो ऐस थे मेरे गुरूजन। और उनसे ऐसी प्रारम्भिक शिक्षा मैंनें प्राप्त की। जो वाकये मैंनें बताए है शायद गुरूजन उन्हें भूल चुके होंगे। मुझे इसलिए याद रहे कि मुझे उनके व्यवहार से दुःख पहुंचा था और मेरे द्वारा किए गए व्यवहार से भी मुझे दुःख पहुंचा था। जब इतना दुःख पहुंचा तो वाकये याद रहना लाजमी भी है।

काकी जी - (कोशीथल वाले) : काकी जी, बोले तो श्याम जी तम्बोली की माता जी। स्कूल में करीब 200 बच्चे थे। रोजाना अंतिम कालांश के बाद व छुट्टी के पहले दलिया बंटता था। काकी जी दलिया बनाती थी। इतना स्वादिष्ट होता था पूछिए मत। अंतिम दो कालांशों के दौरान तो पूरे स्कूल में दलिये को खुश्बू फैल जाती थी। गेहूं के दलिए को तेल में भुनने के बाद पानी में पकाती थी काकी जी। जिन-जिन ने काकी जी के हाथ का दलिया खाया, मैं दावे के साथ कह सकता हूं वैसा स्वादिष्ट दलिया और कहीं नहीं खाया होगा। सब बच्चे बड़ा गोला बनाकर ग्राउण्ड में बैठ जाते थे। चार-पांच बड़े बच्चों को बांटने की जिम्मेदारी दी जाती थी। हम अपने साथ कागज का टुकड़ा रखते थे, जिस पर दलिया लेते थे और फिर चाव के साथ खाते थे। 

मेरे कई नाम रहे। कई लोग लच्छु कहते, कई लक्ष्मण, तो कई लक्ष्मीकांत। मोहल्ले के कुछ लोग गणेश कैसे कहने लग गए, ये आज तक समझ में नहीं आया। मेरे नाम में लोचा भी इसी स्कूल से हुआ। 

जब में 8-10 साल था, तब मेरे हाथ में मेरी जन्म पत्री लगी। किसी पंडित जी ने मेरे जन्म की तारीख और समय के साथ कई नाम लिखे हुए थे, उनमें से दो-तीन नाम ये थे - लक्ष्मण, लक्ष्मीकांत, लखन, लालकृष्ण, लक्ष्मीनारायण। जब मैं कक्षा 5 में था तब मन में सवाल उठा कि स्कूल के रजिस्टर मेरा नाम लक्ष्मी लाल कैसे हुआ ? 

एक तथ्य है कि किसी भी बालक का नाम लक्ष्मीकांत, लक्ष्मी लाल, लक्ष्मीनारायण, लक्ष्मण, लखन, लच्छीराम होता है तो खासकर गांव में उसका सोर्ट नाम लच्छु हो जाता है। मैंनें अपनी तफ्तीश में पाया कि स्कूल के दौरान मेरा नाम लच्छु बताया गया था जिसे नाकांकनकर्ता ने अपनी सूझबूझ से लक्ष्मी लाल लिख दिया। मल्लब में लच्छु के नाम से स्कूल में घुसा और लक्ष्मी लाल बनकर स्कूल से निकला। 

इस स्कूल में कौन-कौन थे मेरे दोस्त। सहपाठियों के साथ कैसा बीता मेरा समय और यहां क्या-क्या सीखा, कितना हुआ सर्वांगिण विकास . . . क्या असल जिन्दगी में मैं लक्ष्मी का लाल बन पाया ? पढ़ते रहिए मेरा ब्लॉग -  

लगता है आज होली है !


  • लखन सालवी


Lakhan Salvi
मयखानों पर भीड़ है,
हर चौगान में रेलमपेल है,
बाजारों में रंगत है,
शबाब को शब का इंतजार है,
लगता है आज होली है।


सब अपने-अपने अनोखे रंगों में रंगे हुए है,
परदेशी आया है गांव में सब सजे हुए है,
जंगल है, यहां अभी मंगल ही मंगल है,
लगता है आज होली है।

कईयों ने खाए है पान,
किसी ने पी है भांग,
कोई देशी तो कोई इंग्लिस पीकर फुल मस्त है,
लगता है आज होली है।

कोई सज धज कर आया है सूरत-मुम्बई-अहमदाबाद से।
प्रियतम के लिए लाया है लहंगा-चोली परदेश से।

कोई लगा के कानों में ईयर फोन,
चबाते हुए दांतों से तानसेन,
गुनगुना रहा है जैसे वो हो पलास सेन।

आज होटल-रेस्टोरेंट नहीं मिलेंगे खाली,
यहां भी बिकेगी मय, बंद कमरों में मिलेगी शबाब की टोली।
मिलेंगे हमजोली क्योंकि है ना होली।

चौगानों-चौराहों में,
गलियों और मोहल्लों में,
होली में उड़लेंगे घी-तेल, फिर आग लगायेंगे,
बुराई को जलायेंगे।

प्रेम से जलाना सीख गए हम,
लगाकर कुमकुम का तिलक,
देकर नारियल की सप्रेम भेंट,
सम्मान सहित जलायेंगे,
अंत में जाते-जाते पानी की चार बूंदें छिड़केंगे,
बुझ ना जाये आग, ध्यान पूरा लगायेंगे।

Tuesday, March 19, 2019

अभी तो आबकार ही साहूकार है, इसी के भरोसे चल रही सरकार है . . .

  • लखन सालवी 
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Lakhan Salvi (lakhandb@gmail.com)
कोई तन दुःखी, कोई मन दुःखी, 
कोई धन बिन रहत उदास,
थोड़े थोड़े सब दुःखी,
सुखी राज के दास।
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कहां चली गई लक्ष्मी ?
और क्यों अनमेने है सब ?
क्यूं नहीं जम रही होली की रौनक ?
पता करने में मैं चला, साईकिल पर हो सवार चला . . .
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पता चला लक्ष्मी रूंठ गई,
नेताजी और सेठजी से,
जनता और जनसेवकों से,
व्यापारियों और ठेकेदारों से,
सरपंचों और सचिवों से।
रूंठ गई वो चुनाव लड़नारों से।
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दुःखी हो रहे है सड़कों के ठेकेदार।
परेशान है शराब के दूकानदार।
चिंता में है किसान, पीड़ा झेल रहे है कामगार।
वसूली पर अड़े हुए है अखबार इसलिए खुश नहीं है पत्रकार।
हम सब है परेशान आखिर क्यों नहीं सुन रही है राजस्थान सरकार।
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ओह . . . आड़े आ रहा है निर्वाचन आयोग का एक अधिकार।
रूकवा दिया है भुगतान इसलिए बढ़ गया हम सब पर भार।
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समझ में आ गया अर्थशास्त्र,
जैसी करनी वैसी भरनी,
कुछ ऐसा ही बताते है हमारे धर्मशास्त्र,
आओ अब मिलकर खोजे ब्रह्मास्त्र।
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अरे, पर लक्ष्मी रूंठ कर आखिर कहां गई ?
चुप . . . ये मत पूछो,
अभी तो गए है चुनाव विधानसभा के,
विधायक बनने को कुछ तो खुद ही लुटे थे,
कुछ को कईयों ने लूटा था,
लक्ष्मी को रखा था गिरवी,
फिर शराब, शबाब परोसा था,
कंगाल होना तो लाजमी ही था।
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सब के सब कंगाल है,
समस्या बड़ी जटिल है,
अब तो कदम भी बोझिल है,
हाय रब्बा हम कितने बुझ दिल है।
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अड़े बाबा तुम बताओ लिक्षमी कहां गई ?
सुनो,
चली गई महत्वाकांक्षियों संग,
जम गई सत्ता नशीनों की हवेलियों में
ट्रांसफर हो गई पार्टियों के बैंक खातों में।
कुछ जमा हो गई आबकार में।
फिर उतरेगी तुम्हारे पेट में।
और चढ़ेगी दिमाग में,
इस तरह तुम किसी को भेज दोगे संसद में।
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अभी सब दिवालिये हो गए का ?
नहीं नहीं अभी तो आबकार साहूकार है,
इसी के भरोसे चल रही सरकार है।

Saturday, March 16, 2019

गुरू बिन गौर अंधेरा - 1 : बंशी महाराज की पाठशाला में तैयार हुई खेंप का एक नमूना हूं मैं


कबीरा जब हम पैदा भये, प्ले स्कूल थी नाय,

चलने लगे पैरों पे तो भेज दिए गए पाठशाला माय।

मैंनें अपनी पढ़ाई उस पाठशाला से आरम्भ की, जहां ज्ञान को मापने का पैमाना परीक्षा परिणाम वाला कागज का टुकड़ा नहीं था . . . 40 तक पहाड़े बिना देखे फुल कांफिडेंस से 30-40 बच्चों के बीच मारसाब के सामने बोल लेते, हिन्दी में बोले हुए को सुनकर लिख लेते और बंशी महाराज कह देते - शाबास . . .। बस यह शाबासी ही परीक्षा का परिणाम थी।


ऐसे थे बंशी महाराज - बंशी महाराज लगभग 60-65 के रहे होंगे तब। सिर के उपर का भाग एकदम बंजर था। चारों ओर सफेद व हल्के काले बाल। सफेद जग चेहरा, शायद तब भी रोजाना दाढ़ी मूंढ़वाते थे। कभी चेहरे पर दाढ़ी-मूंछ नहीं देखी। सफेद कुर्ता व सफेद धोती। चौड़े होकर चलते थे, इसलिए नहीं कि दंभी थे बल्कि शायद पैरों या घुटने में तकलीफ थी। धीरे-धीरे चलते थे। रास्ते में जो भी मिलता उससे राम-राम, हरिओम कहते थे और लोग उनका बड़ा सम्मान करते थे।

80 के दशक में प्राईवेट स्कूल नहीं हुआ करते थे, गांव में तीन सरकारी विद्यालय थे। दो विद्यालय उला बसस्टेण्ड पर और एक विद्यालय पेला बसस्टेण्ड के पास। उला बसस्टेण्ड पर स्थित दो विद्यालयों में से एक प्राथमिक था, जिसमें बालक-बालिकाएं साथ पढ़ते थे, दूसरा है उच्च माध्यमिक विद्यालय। जिसमें कक्षा 6 से 10 तक केवल बालक पढ़ते है और उसके बाद 11 व 12वीं में बालक-बालिकाएं साथ पढ़ते है। तीसरा है, बालिका माध्यमिक विद्यालय, जो कि पेला बसस्टेण्ड के समीप जाटों का मोहल्ला में स्थित है।

गांव में दो बसस्टेण्ड है, एक को उला बसस्टेण्ड (गंगापुर की ओर से जाने पर पहला वाला बसस्टेण्ड) व दूसरे को पेला बसस्टेण्ड (गंगापुर से रायपुर जाते समय कोशीथल मुख्य बसस्टेण्ड से आगे वाला दूसरा बसस्टेण्ड) कहते है।

जब मैं चलने-फिरने लग गया मतलब 3-4 साल हो गया तो मोहल्ले के बच्चों के साथ मुझे भी बंशी महाराज की स्कूल में भेजा जाने लगा। एक प्लास्टिक का थैला पकड़ा दिया जाता था, जिसमें एक पट्टी (ब्लैक स्लेट) व बर्तन (सफेद चॉक) होते थे। मेरे सिर पर लड़कियों की तरह लम्बे बाल थे, जिन्हें कभी-कभी मेरी मां और कभी-कभी हमारे पड़ौस वाली लक्ष्मी बाई तेली व लक्ष्मी बाई नटराज गूंथ कर जुड़ा बना देती थी। मैं अपने मोहल्ले के अल्लामों के साथ बंशी महाराज की स्कूल (पाठशाला) में जाने लगा। तब मेरा पक्का दोस्त लेहरूनाथ रावल था। हम दोनों आते वक्त अकसर साथ आते थे, मेरे पाप्पा मुझे कुछ पैसे देते थे, कभी 5 पैसे, कभी 20 पैसे तो कभी-कभी 50 पैसे। 50 पैसे में जेब भर जाए इतनी मिट्ठी गोलियां आ जाती थी। गढ़ से निकलकर घर जाते समय मुख्य बाजार में मोहन लाल जी सेठिया की दूकान के ठीक सामने मीठा लाल जी मेहता की दूकान हुआ करती थी। वे अपनी दूकान के चबूतरे पर चुम्बक, बर्तन, ईमली और खट्टी मिट्ठी छोटी व बड़ी गोलियां रखते है, ये ही हमारे लिए केडबरी, एल्पनलिबे, किस्मी हुआ करती थी। मैं मिठा लाल जी की दूकान से ही खरीदी करता था, वे बोलते कम थे पर एक-दो गोली ज्यादा दे देते थे। वो इसलिए भी मुझे अच्छे लगते कि पहली बार जब मैं उनकी दूकान से गोलियां लेने गया तब उन्होंने मुझे पूछा - तू म्हारे प्यार जी रो भायो है रे ? वो मेरे पाप्पा को जानते थे, ये जानकर मुझे खुशी हुई और मिठा लाल जी मुझे अपने-से लगने लगे।

अब न तो मोहन लाल जी सेठिया की वो दूकान रही और ना ही मिठा लाल जी मेहता की दूकान। हां दोनों की दूकानें और वो बाजार का दृश्य मेरी दृष्टिपटल पर अभी भी ज्यों का त्यों छाया हुआ है।

पक्का दोस्त लेहरूनाथ रावल भी महादेव का भक्त हो गया और उनका प्रसाद ग्रहण करते करते न जाने अब किस दशा में है।

हमारे पूर्वज जैसलमेर से पलायन कर कोशीथल आए थे, सो हमारे कुल जमा तीन-चार ही परिवार है गांव में। सभी भाटों के मोहल्ले में रहते है, जिसमें भाट परिवार एक भी नहीं है :)। हम बच्चे भाटों के मोहल्ले से निकलकर आण (आसण-जहां नाथ सम्प्रदाय के घर होते है) से होकर बाजार में होते हुए गढ़ परिसर में पहुंचते थे।

धीरे-धीरे गांव के लोग, बाजार के लोग, गढ़ के लोग, बंशी महाराज की पाठशाला में पढ़ने वाले मेरे सहपाठी और मोहल्ले में मेरे खेलने वाले मेरे साथियों से मिलकर मेरे जीवन जीने का दायरा बढ़ता जा रहा था, और ये सब मेरे दिलोदिमाग में जगह बनाते जा रहे है। कुछ सकारात्मक तो कुछ नकारात्मक . . . .

बंशी महाराज की स्कूल का दृश्य :

मेरा गांव मेवाड़ रियायत का एक ठिकाना था। चुण्ड़ावत राजपूत यहां के ठिकानेदार थे। आजकल अपर प्राइमरी की एक बुक में मेरे गांव का जिक्र आता है, जिसमें ठिकाने की ठकुराइन द्वारा मेवाड़ रियासत की राजधानी उदयपुर के महाराजा के आव्हा्न पर युद्ध में योगदान दिया। ठिकाने के समय से ही गांव में एक गढ़ है। गढ़ के द्वार के समीप गढ़ परिसर के अंदर हिंगलाज माता का मंदिर है, जो चुण्ड़ावत राजपूत परिवारों की ईष्ट देवी है। हालांकि गांव के सभी जातियों के लोग हिंगलाज माता को मानते है, और यदाकदा मंदिर में दर्शन व पूजा-अर्चना करने आते है। गढ़ परिसर में प्रवेश करने के साथ ही दांयी ओर बड़ा ऊंचा चबूतरा है, जिसकी सीढ़ियां चढ़ने के बाद चबूतरे पर होते हुए आगे मंदिर में प्रवेश किया जाता है। इस मंदिर व चबूतरे के बगल में एक अहाता है। जिसमें तब कच्ची फर्श हुआ करती थी। इस अहाते और चबूतरे के बीच एक नीम का बड़ा वृक्ष था, शायद अब भी होगा। इस वृक्ष की छाया में बंशी महाराज की स्कूल चलती थी। बंशी महाराज के स्कूल में कोई किताब नहीं हुआ करती थी, वे वर्णमाला व गिनती तथा पहाड़ें सिखाते थे। कुर्सी पर बैठे बंशी महाराज के हाथ में हर वक्त एक छड़ी रहती थी। वे बच्चों को खड़ा करके उनसे पहाड़े बुलवाते थे। पाया, आधा, पूण्या, ढ़ाया जैसे पहाड़ें भी पढ़ाते थे। एक ढ़ायो ढ़ायो, दो ढ़ाया पांच। इस प्रकार पहाड़ें बोले जाते थे। मैं भी याद करने और बोलने का अभ्यास करता था।
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मुझे मालूम है हम दो बच्चे बंशी महाराज से काफी डरते थे। एक बार मेरे पास एक लड़की बैठी हुई थी, उसने अपनी पट्टी से मेरे सिर में ठोक दी। मैंनें भी वापस ठोक दी। मैं बंशी महाराज से इतना डरता था कि मैंनें उनसे शिकायत नहीं की लेकिन जैसे ही मैंनें उस लड़की के ठोकी तो उसने बंशी महाराज से मेरी शिकायत कर दी। बंशी महाराज ने मुझे बहुत की हेय की दृष्टि से देखा। मैं याद करता हूं तो उनकी वो हिकारत भरी सूरत आज भी मेरी आंखों के आगे छा जाती है। उन्होंने मुझे अपने पास बुलाकर मेरे हाथ आगे करवाए और छड़ी से दो-तीन मार दी। मेरे हाथ तो सामने ही रहे; छड़ी की मार झेलने के लिए; लेकिन आंखों से अश्रुओं की धाराएं बह निकली। तब आंखों से जैसे कोई धुंधलापन साफ हो गया, मानो आंसूओं से आंखों में छपी कोई ऐसी तस्वीर धुल गई हो, जैसे पानी के फव्वारे से दीवार पर छपी हुई तस्वीर धुपती है। साथ ही एक दूसरी तस्वीर उभरी जिसमें वो कुर्सी पर बैठे हुए है और मैं उनके पास खड़ा हूं, वे मेरे कंधों पर हाथ रखे हुए है और मुस्कुराते हुए देख रहे है। मैं जिद्दी आज या कल का नहीं हूं, तब का ही हूं। इससे ही समझ लिजिए कि जब तक बंशी महाराज के पास पढ़ा, उसी समय में मैंनें इस तस्वीर को हकीकत बना दिया।
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Sunday, May 13, 2018

ऐसे है भीलवाड़ा वाले भंवर मेघवंशी . . .

  • लखन सालवी
आप भी उनके बारे में अपने अनुभव अपनी वॉल पर लिखिए और हेश टैग करिए और खास लोगों को टैग भी करिए। ये करना इसलिए जरूरी हो गया है क्योंकि समाजसेवी, लेखक, पत्रकार व चिंतक भंवर मेघवंशी ने हाल ही में सोशल मीडिया पर एक पोस्ट की और उस आखिरी पोस्ट के बाद उन्होंने फेसबुक को डिएक्टीवेट कर दिया, व्हाट्सएप्प बंद कर दिया, जितनी भी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर वे सक्रिय थे, सब से निष्क्रिय हो गए। देशभर के लाखों लोगों के मोबाइल में सेव उनके नम्बर भी अब बंद आ रहे है। उनकी आखिरी फेसबुक पोस्ट से ज्ञात होता है कि पूर्व में उनके साथ काम कर चुके उनके साथियों, कुछ दलित संगठनों व अन्य संगठनों के लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर तथा माउथ पब्लिसिटी के माध्यम से उनके खिलाफ उलजलूल बातें लिखी और कही गई है। उन लोगों ने जगह-जगह प्रचार किया है कि एक दलित उत्पीड़न के प्रकरण को दबाने की एवज में भंवर मेघवंशी ने विपक्षियों से 15 लाख रूपए लिए है। ऐसे कई मिथ्या आरोपों से भंवर मेघवंशी आहत हुए है और उन्होंने फेसबुक पर घोषणा कर दी कि अब वो संघर्षों वाले काम को विराम देकर शांति के साथ सृजन वाले काम करेंगे। उनका ऐसा करना लाजमी है, क्योंकि है तो वो भी इंसान ही, आखिर जिस वर्ग के लोगों के लिए वे आधी उम्र तक लड़ते रहे है, जिन वर्ग के लोगों को जागरूक करने के लिए काम करते है आज उसी वर्ग में से चंद लालची लोग उन पर मिथ्या आरोप लगा रहे है और गांव-गांव जाकर उनके खिलाफ दुष्प्रचार कर रहे है और इस वर्ग के हम जैसे कथित जागरूक लोग चुपचाप बैठे देख-सुन रहे है, न सच्च को सामने लाना चाह रहे है और ना सच्च को जानना चाह रहे है तो ऐसे में भंवर मेघवंशी के इस कदम को मैं उचित मानता हूं . . . जिंदा है तब तक काम तो करने ही है, मगर जिस वर्ग के लोगों को संघर्ष करना सिखाया, जागरूक करने का प्रयास किया अगर वे इतने सालों बाद भी ये सब कुछ नहीं सीख पाए है या जानबूझ कर सीखे हुए का उपयोग नहीं करना चाह रहे है तो फिर इसका अंत क्या है ? आज यही सबसे बड़ा सवाल है।


भंवर मेघवंशी ने संघर्षों की राह छोड़ने का फैसला लिया है और इस फैसले से दलित, आदिवासी एवं घुमन्तू समुदायों के जागरूक लोगों को गहरी पीड़ा हो रही है। खासकर युवा वर्ग हतोत्साहित हो रहा है। मुझे भी बड़ा दुःख हुआ। उन पर इस प्रकार के आरोप लगाने, उन्हें भ्रष्ट, बिकने वाला, और सौदेबाजी करने वाला बताने वालों की मैं कड़े शब्दों में भर्त्सना करता हूं। मैं हवाई बातें नहीं लिख रहा हूं, तथ्यों सहित बात करूंगा। भंवर मेघवंशी का जीवन एक खुली किताब की तरह है। अब तक जिस किसी स्वच्छ मन के, ईमानदार, सहज तथा निःस्वार्थ व्यक्ति का भंवर मेघवंशी से वास्ता पड़ा है, वो उनके बारे में अच्छी और सच्ची जानकारी दे सकता है। मेरा मानना है कि आज हर उस व्यक्ति को भंवर मेघवंशी के बारे में अपने अनुभव लिखकर सोशल मीडिया के माध्यम से जगजाहिर करने चाहिए। जैसे कि मैं कर रहा हूं . . . यह एक नवाचार है, जिसके माध्यम से हम किसी भी व्यक्ति की अच्छी या बूरी छवि को समाज के सामने स्पष्ट कर सकते है। तो इसकी शुरूआत मैं कर देता हूं . . . आप भी लिखिएगा . . .
मुझे ऐसे मिले भंवर जी (पहली मुलाकात) . . .
Bhanwar Meghwanshi
मैं भीलवाड़ा जिले के कोशीथल गांव का हूं, 2006 या 2007 की बात है, तब मैं स्ट्रींगर के रूप में दैनिक भास्कर के साथ काम कर रहा था। मैं अपने केबिन में बैठा था, तब पड़ौसी गांव गलवा के बद्री लाल जाट मुझसे मिलने आए। उसके चारदिवारी युक्त बाड़े को ग्राम पंचायत ने जेसीबी द्वारा नस्तेनाबूत कर दिया था इसलिए वो कई दिनों से ग्राम पंचायत से पीड़ित थे। वो अपने भूखण्ड व ग्राम पंचायत द्वारा की गई कार्यवाही से संबंधित दस्तावेज ग्राम पंचायत से मांग रहे थे लेकिन ग्राम पंचायत द्वारा नहीं दिए जा रहे थे। बद्री लाल मुझसे सलाह लेने आए थे कि अब उन्हें क्या करना चाहिए ? मैंनें उन्हें सूचना का अधिकार कानून के बारे में बताया और सूचना लेने के लिए आवेदन करने की बात कही। साथ ही सूचना प्राप्त करने का आवेदन पत्र भी दिया जो उदयपुर की आस्था संस्था द्वारा तैयार किया गया था। वो आवेदन पत्र थोड़ा मटमेला हो गया था और उसका एक कॉलम समझ में नहीं आ रहा था। उसके बारे में जानने के लिए मैंनें उसके नीचे लिखे हुए भंवर सिंह चंदाणा के नम्बर पर कॉल किया और जानकारी चाही तो उन्होंने मेरा पता पूछने के बाद मुझे भंवर मेघवंशी के नम्बर देते हुए उनसे मदद लेने को कहा। मुझे भंवर मेघवंशी के पत्रकार होने, समाजसेवी होने की बात भी भंवर सिंह चंदाणा ने ही बताई। इससे पहले मैंनें भंवर मेघवंशी का नाम न कभी कहीं पढ़ा था और ना ही कहीं सुना था। चंदाणा द्वारा दिए गए नम्बर पर मैंनें कॉल किया और भंवर मेघवंशी से पहली बार बात हुई। मैंनें अपनी समस्या पहले बताई, उन्होंने मेरा परिचय लिया। बहुत ही शांत व सभ्य तरीके से बात की। इस दिन से पहले मुझसे इतने सभ्य तरीके से किसी ने बात नहीं की। फोन कॉल पर ही उन्होंने मेरी समस्या का समाधान कर दिया यानि कि मुझे जानकारी दे दी। उसके बाद उन्होंने मुझे आगामी एक सप्ताह के बीच की कोई तारीख बताते हुए आग्रह किया कि मैं उस तिथि को ज्यादा से ज्यादा संख्या में लोगों के साथ रायपुर आऊं। उन्होंने बताया कि सगरेव गांव में दलित समुदाय के लोगों पर अत्याचार किए गए है, उन्हें न्याय दिलवाने के लिए रायपुर में सम्मेलन रखा गया है। फोन कॉल डिस्कनेक्ट होने के बाद मैंनें खूब सोचा। पत्रकार के दिमाग में जितने नेगेटिव/पॉजिटिव सवाल आते है, वे सभी मेरे दिमाग में उमड़े। यहां मैं उल्लेख करना चाहूंगा कि भंवर मेघवंशी में कोई तो पॉजिटिव एनर्जी है, जिसने मुझ जैसे दंभी और आडू बुद्वि को सम्मेलन की ओर खिंच लिया, मैंनें अपने स्तर पर भंवर मेघवंशी के बारे में जानकारी जुटाई, सगरेव की घटना की जानकारी ली और उसके बाद तीन दिन तक अपने स्तर पर सम्मेलन का प्रचार-प्रसार किया और अंततः कई साथियों के साथ सगरेव सम्मेलन में पहुंचा। भीलवाड़ा व राजसमन्द जिले के विभिन्न गांवों के कोई 3000 से अधिक लोग थे वहां। ज्यादातर मेरे परिचित थे। पाण्डाल के पास खड़े डिवाईएसपी रघुनाथ गर्ग से पूछा कि भंवर मेघवंशी कौन है ? तो उन्होंने बताया कि - जो मंच संचालन कर रहे है, वो ही भंवर मेघवंशी है। सामने देखा तो मंच पर समाजसेविका अरूणा रॉय, निखिल डे और कई लोग डाइस पर बैठे हुए है और एक डेढ़ पसली युवक मंच संचालन कर रहा है, और वो ही भंवर मेघवंशी है! मैं पाण्डाल के बाहर पीछे ही पीछे डीवाईएसपी रघुनाथ गर्ग और गंगापुर एसएचओ राम सिंह चौधरी के पास खड़ा-खड़ा मंच संचालनकर्ता को देखता रहा। टेंट की वजह से अंधेरा-सा होने व बहुत दूर होने के कारण मंच संचालनकर्ता की शक्ल साफ नहीं दिखाई दे रही थी इसलिए कान खोलकर उसके शब्दों को सुनकर रहा था। सधे हुए, साफ और असरदार शब्द और वाक्यों को सुनकर मेरा रौम-रौम खिल उठा। शरीर में सिहरन दौड़ उठी। मुझे गर्व हुआ कि मेरे वर्ग में ऐसा बंदा भी है। अब मैं धीरे-धीरे मंच की ओर बढ़ने लगा, पहुंचा तब तक सम्मेलन समापन की घोषणा हो चुकी थी और एमकेएसएस के मोहन बा, चुन्नी बाई व शंकर सिंह के साथ कम्प्यूनिकेशन टीम ढ़ोल की थाप जागरूकता और आंदोलन के गीत गा रहे थे।
कई लोग अरूणा रॉय को घेर के खड़े थे तो कई लोग निखिल डे को। भंवर मेघवंशी भीलवाड़ा मीडिया के जिला स्तरीय पत्रकारों के साथ बातचीत कर रहे थे। मैं भी पास जाकर खड़ा हो गया और मौका देखकर परिचय देते हुए हाथ आगे बढ़ा दिया और उन्होंने भी बड़ी सहजता के साथ मेरा थाम लिया जो आज तक नहीं छूटा। वो बहुत व्यस्त होते जा रहे थे, अरूणा रॉय व निखिल डे का इंटरव्यू करवाने की रिक्वेस्ट लिए मीडिया के लोग बार-बार उनके पास आ रहे थे। कई सामाजिक कार्यकर्ता आ रहे थे उनसे मिलने के लिए। वहीं कभी पुलिस के लोग आकर मिल रहे थे। कंधे पर कपड़े का थैला लटकाए भंवर मेघवंशी हर व्यक्ति से बड़े आराम के साथ मिल रहे थे और साथ ही अपने कुछ साथियों को दिशा निर्देश भी देते जा रहे थे। सारी व्यवस्थाएं भंवर मेघवंशी ही कर रहे थे। अभी तक मैंनें पीड़ित परिवार के लोगों को नहीं देखा। अंत में भंवर मेघवंशी से मिलकर रवाना हुआ तो वे बोले - इस मुद्दे पर भी कुछ लिखना लखन जी। मैंनें सोचा लिखकर क्या करूंगा, अखबार में तो रायपुर संवाददाता की ही खबर छपेगी, मैं लिखकर कहां छपावाउंगा।
पढ़ाकू और लिखाकूं है मेघवंशी, युवाओं को मोटिवेशन देना कोई इनसे सीखें


Bhanwar Meghwanshi Address the Third National Youth convention In Udaipur 
हमारी पहली मुलाकात के कुछ दिनों बाद भीलवाड़ा में सूचना एवं रोजगार का अधिकार अभियान राजस्थान के द्वारा राष्ट्रीय युवा सम्मेलन का आयोजन किया गया। भंवर मेघवंशी के आग्रह पर मैं भी इस सम्मेलन का हिस्सा बना और यहां से भंवर मेघवंशी को करीब से देखने और समझने के अवसर मिलने लगे। वे बहुत ही शानदार मैंनेजमेंट करते है। मंच संचालन में उनका कोई सानी नहीं। मैनजमेंट करना, बोलना, लिखना व पढ़ना। उनके जीवन की ये चार बातें मैं बहुत ही कम समय में अच्छे से जान गया। चूंकि मैं पत्रकारिता कर रहा था इसलिए उन्होंने हर अवसर पर मुझे लिखने की सलाह दी। जयपुर से प्रकाशित विविधा फीचर्स की कॉपी दी और अपनी मासिक पत्रिका डायमण्ड इंडिया की प्रति देकर युवा सम्मेलन के संदर्भ में डायमण्ड इंडिया के लिए लिखने का आग्रह किया। यही दौर था मेरा लेखन कार्य शुरू करने का। अब आए दिन उनसे मिलने का मौका ढूंढ़ा करता था मैं। कभी भीलवाड़ा, कभी सिरड़ियास तो कभी कहीं ओर। मिलने का कोई मौका नहीं छोड़ता था। उनके बैग में कई किताबें हुआ करती थी, घर के कमरे की हर ताक में किताबों की ढे़री लगी रहती थी। महीने के कोई पचास से अधिक साप्ताहिक और मासिक अखबार राज्य भर से डाक द्वारा उनके घर पर आते थे। मैं तो कहता हूं भंवर मेघवंशी खुद एक चलती फिरती लाइब्रेरी है। अब मैं किताबें पढ़ने लगा, कई प्रकार के अखबार पढ़ने लगा। महिला हिंसा, दलित उत्पीड़न सहित कई मुद्दों को उनके साथ रहकर समझा। फिर नौकरी करने चला गया मगर हमारा संपर्क बना रहा। ये सच है कि उनसे सम्पर्क नहीं हुआ होता तो मैं आज जिस जगह हूं, वहां नहीं होता। मेरे सोचने, समझने, कार्य करने का दायरा इन्हीं की वजह से बढ़ा। मेरे जैसे कई युवा साथी है, जो इनसे प्रेरणा पाकर आगे बढ़े है।
ऐसा है मेघवंशी का काम करने का तरीका
In Kala KheraVillage for fact Finding
जहां कहीं भी दलित, आदिवासी एवं घुमन्तू समुदाय के लोगों पर अत्याचार होता, भंवर मेघवंशी अपने युवा साथियों के साथ बैठकर रणनीति बनाते, युवा टीम के साथ वहां पहुंचते। सबसे पहले फैक्ट फाइंडिंग करते, यानि मामले की छानबीन करते, ताकि पहले स्वयं संतुष्ट हो सके कि मामला कितना सही है। बाद में फैक्ट फाइंडिंग की रिपोर्ट बनाते और उसे प्रशासनिक अधिकारियों को सौंप कर पीड़ित को न्याय देने की मांग करते। जो पीड़ित न्याय की लड़ाई लड़ने के लिए अडिग पाया जाता, वे ऐसे पीड़ितों की मदद करते। जो पीड़ित खुद ही ढुलमुल रवैये का पाया जाता, तब वे अपने स्तर पर प्रशासनिक अधिकारियों को पत्र भेजकर अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करते। 


पूछिए कस्तुरी इनकी क्या लगती है जो ये बड़ारड़ा पहुंच गए मदद करने ! पीड़ितों की मदद करने का कोई दायरा नहीं
Meeting with Kasturi Bai at Balarada (Chittorgarh)
केवल दलित, आदिवासी एवं घुमन्तू वर्ग के पीड़ित लोगों के लिए ही भंवर मेघवंशी ने संघर्ष नहीं किए बल्कि हर पीड़ित व शोषित इंसान की मदद के लिए वे हमेशा तैयार रहते है। सूलिया के दलितों का मंदिर प्रवेश मामला, सगरेव के दलितों पर अत्याचार का मामला, बनेड़ा के दलितों का यज्ञ से बहिष्कार का मामला, शंभूगढ़ के दलितों का यज्ञ से बहिष्कार का मामला, काला का खेड़ा के दलित परिवार पर उत्पीड़न का मामला, सूलिया के बालू जी गुर्जर पर उत्पीड़न मामला, हलेड़ की कमला बाई जाट व उनकी बहनों पर उत्पीड़न का मामला, बाला का खेड़ा में नायक जाति के किशोर को जिंदा जलाने का प्रयास करने का मामला, रायपुर की घाटी निवासी कालबेलिया परिवार की नाबालिग लड़की पर अत्याचार का मामला, बड़ा महुआ के दलित परिवारों का सामूहिक बहिष्कार का मामला, राजसमन्द जिले के गुणिया गांव के दलित व्यक्ति की पगड़ी जला देने और जान से मारने की धमकी का मामला, चित्तौड़गढ़ जिले के कपासन ब्लॉक के बलारड़ा गांव की कस्तुरी बाई के परिवार पर अत्याचार का मामला, भीलवाड़ा जिले की लीला भील की हत्या का मामला, पोण्डरास में दफन के लिए दो गज जमीन का मामला, राजसमंद के सोलंकियों का गुढ़ा की दलित महिला को डायन कहकर प्रताड़ित करने का मामला . . . अनगिनत मामलें है, बहुत लम्बी सूची है, जिनमें मेघवंशी ने प्रत्यक्ष रूप से पीड़ितों की मदद की। 

Meeting With Ad DM of Rajasmand Regarding Guniya Issue
उन्होंने हर पीड़ित की मदद करने का प्रयास किया, चाहे वो दलित हो, आदिवासी हो, घुमन्तू वर्ग से हो या किसी भी वर्ग से। युवाओं को संगठित किया, उनकी प्रतिभा को पहचाने कर उसे निखारने का कार्य भी बखूबी किया। कई बार ऐसा हुआ जब अत्याचार का कोई मामला उन तक पहुंचा, पीड़ित लोग उनसे मिले, न्याय दिलवाने के लिए मदद करने की गुजारिश की, मेघवंशी ने रणनीति बनाई, टीम बनाकर रणनीति के अनुसार प्रक्रिया की, फैक्ट फाइंडिंग की, धरने, प्रदर्शन किए, कलेक्टर-एसपी से मिलकर उन्हें ज्ञापन दिए और पीड़ित को न्याय दिलवाने के लिए संघर्ष किया, मैं पूरे समय इस प्रक्रिया में शामिल रहा। मैंनें देखा ऐसे कार्य के लिए उन्होंने पीड़ित परिवार, उसके रिश्तेदार या किसी से एक रूपए की मांग नहीं की। उन्होंने कुछ समूहों से बात कर उल्टा पीड़ित को आर्थिक मदद दिलवाई। कुछ समूहों से बात कर उन्हें आंदोलन को सफल बनाने की जिम्मेदारी दी। इससे लोगों में नेतृत्व की क्षमता भी बढ़ी और उन्होंने आगे आकर जिम्मेदारियां ली। किसी ने तख्तियां बनाने की जिम्मेदारी ली तो किसी ने टेंट लगाने की जिम्मेदारी ली। मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि उन्होंने जितने भी आंदोलन किए, धरने-प्रदर्शन किए, सब लोकतांत्रिक तरीके से किए। समुदायों के लोगों को मुद्दे से जोड़ा और नेतृत्व सौंपकर सामूहिकता का भाव पैदा किया। मतलब उनके द्वारा किए गए संघर्ष बहुउद्देशीय रहे है।
संघर्ष के कई साथी खिलाफ भी हुए . . . वे वास्तविक साथी थे ही नहीं
जन अधिकारों की पैरवी के लिए किए गए संघर्षों में भंवर मेघवंशी के साथ कई लोग जुड़ते गए और कारवां बढ़ता गया। वो जब भी अपनी मुख्य टीम में किसी नए व्यक्ति को शामिल करते थे तो मैं हमेशा विरोध किया करता था। मेरा मानना था व्यक्ति को जांच परख कर कोर ग्रुप में शामिल किया जाए। इस मामले में मेघवंशी ने तानाशाही रवैया अपनाया। अपने अनस्ट्रक्चर्ड कोर ग्रुप में अपनी मर्जी से लोगों को शामिल कर लिया। जो बाद में उनके ही विरोधी बन गए। मेघवंशी अपनी व्यस्ततम जीवन शैली के कारण अपने साथ जुड़े लोगों की कुण्डली की जांच नहीं कर पाए।
Ambedkar Jayanti Samaroh 2013 at Azaad Chouk Bhilwara
होता यूं था कि जैसे किसी गांव का कोई मुद्दा सामने आया। पीड़ितों ने न्याय दिलवाने में सहयोग की अपेक्षा की। तब उस गांव के या उस क्षेत्र के या उस जाति समुदाय के कुछ लोग भंवर मेघवंशी से मिलने आ जाते और संघर्ष की लड़ाई में साथ जुड़ जाते। धीरे-धीरे वे अपने स्वार्थ को सिद्ध करने के लिए दिन - रात भंवर मेघवंशी के पीछे-पीछे घूमने लगते। दरअसल वे अपनी राजनीति चमकाने की मंशा पाले हुए होते थे। कई ऐसे थे जो धरने, प्रदर्शन को सम्बोधित करने की चाह में उनसे जुड़ जाते, कई ऐसे भी होते जो धरने प्रदर्शन का नेतृत्व कर नायक बनने का ख्वाब पाले हुए होते थे। कई लोग अपनी रोटियां सकने के लिए भंवर मेघवंशी का इस्तेमाल करने की गरज से साथ जुड़ते। पर जब कई दिनों-महीनों तक मेघवंशी के साथ चलने के बाद भी उनके ख्याब, सपने, अरमान पूरे नहीं होते तब वे भंवर मेघवंशी का साथ छोड़ देते और हर जगह उनका दुष्प्रचार करना आरम्भ कर देते। यह मैंनें प्रत्यक्ष रूप से देखा है और समय-समय पर भंवर मेघवंशी को अवगत भी कराया और कई बार तो ऐसे लोगों को मूंह पर भी बोला कि स्वार्थी लोगों को भंवर मेघवंशी से नहीं जुड़ना चाहिए।

अभावों में भी खुद्दारी और मजे से जीने वाले इंसान है भंवर मेघवंशी !
Bhanwar Meghwanshi
भंवर मेघवंशी संघर्ष पूर्ण जीवन को भी मस्ती से जीने वाले इंसान है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर के विचारों को अंगीकार किए हुए और कबीर की वाणी का रस पीए हुए इंसानियत पर चलते है। चूल्हे के पास बैठकर बेंगन, टमाटर की सब्जी बनाकर हमें खिला देते है। कभी जीप में साथ लेकर चलते है तो कभी 15 किलोमीटर पैदल चला देते है। अलमस्त है, फक्कड़ है। कई बार हमारे पास भीलवाड़ा से सिरडियास आने का कोई साधन नहीं होता, आज भी बसों की गैलेरी में खड़े होकर सफर कर लेते है। कभी कोई साथी रेवदर, तो कभी कोई साथी जालोर, फालना, बूंदी बुलाते है कार्यक्रमों में। तब सोच में पड़ जाते है कि कैसे जाया जाए। बड़ा बैग कंधे पर लेकर रोड़वेज बस में चढ़ जाते है। तब मुझे बहुत दुःख होता है कि मैं उनकी कोई मदद नहीं कर पाता। कई बार बसों में चढ़ाने, उतारने के अवसर मिलते रहे है मुझे। बुलाने वालों को नहीं पता होता है कि उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है, वे कैसे आयेंगे। कैसे अपना परिवार चलाते होंगे। कहीं-कहीं लोग उन्हें भेंट स्वरूप 1000-2000 के लिफाफे जरूर पकड़ा देते है। कई ऐसे चाहने वाले भी है उनके, जो इनकी फक्कड़ता को जानते है, वे जब भी किसी अवसर पर इनसे मिलते है तो धीरे से उनकी जेब में कुछ नोट सरका देते है। प्रहलाद राय मेघवंशी को तो इनका क्रेडिट कार्ड ही समझ लिजिए।
फक्कड़ होने के बावजूद भंवर मेघवंशी के चेहरे पर कभी सीकन के भाव नहीं आते। कभी स्पूर्ति खत्म नहीं होती, उत्साह का कभी अवसान नहीं होता। समय के अनुसार हवाई जहाज, ट्रेन, बस, जीप में सफर करते है और जरूरत पड़ने पर कंधे पर बैग लटका कर पैदल भी चल पड़ते है। होटल में खा लेते है, रेस्टोरेंट में भी खाते है और कभी कभी तो रोड़ साइड़ ढ़ाबे पर मिलने वाले पराठें से भी काम चला लेते है। कभी कुछ नहीं मिला तो सड़क पर खड़े पानी पताशें खाकर ही संतुष्ट हो जाते है। ऐसा कईयों बार हुआ और आज भी होता रहता है, मैं कई अवसरों पर साथ रहा हूं। हर माहौल, हर परिस्थिति में जीना, चलना और संघर्ष करना आता है उन्हें।
कई काम शुरू किए और एक साल में ही बंद कर दिए गए
डायमण्ड इंडिया का पाक्षिक प्रकाशन आरंभ किया था। अच्छी डिमाण्ड हो चली ही अखबार की, भीलवाड़ा में। सम्पादन का कार्य भंवर मेघवंशी के जिम्मे था। मैं सह सम्पादक था। पर भंवर मेघवंशी तो भंवर मेघवंशी ठहरे, इनके पैरों में नहीं बल्कि दिमाग में भंवरी (चकरी) सेट है। जैसे ही कहीं अत्याचार, उत्पीड़न के समाचार इन्हें मिलते है, ये पहुंच जाते वहां। फिर न्याय समानता की लड़ाई लड़ते हुए कई दिनों तक वापिस ऑफिस नहीं आते। मैं बहुत जोर देता बुलाने पर तो फिर एक दिन बैठाकर प्यार से कह देते यह काम अपने लिए नहीं है लखन जी, अपन तो संघर्ष ही कर सकते है और अखबार का प्रकाशन कर आखिर हम क्या हासिल कर लेंगे। और एक दिन डायमण्ड इंडिया फिर से बंद हो गया।
कभी खबरकोश डॉटकॉम की शुरूआत की, उसे भी एक साल से अधिक नहीं चला पाए। जयपुर में एक दफ्तर खोलकर कंसलटेंसी का कार्य आरम्भ किया लेकिन भंवर मेघवंशी की संघर्षों की ताकत के आगे उसने भी दम तोड़ दिया। रिखिया, बाबा रामदेव पीर एक पुर्नविचार जैसी कई पुस्तकें प्रकाशित की जिनमें भी लाखों का दिवाला आया।

ऐसे होती है थोड़ी बहुत आय
Discuss with Youth in a Workshop at Kotra (Udaipur)
खेती के कारण इनके घर का अनाज भण्डार सदैव भरा रहता है, खेत से ही सब्जियां आदी आ जाती है। परिवार के लोग मिलकर खेती व घर का काम करते है। भंवर मेघवंशी को देश भर में कई सामाजिक संगठनों के लोग विभिन्न मुद्दों पर बोलने के लिए, डॉक्टूमेंटशन के लिए, मुद्दे आधारिक किताबें लिखने के लिए बुलाते रहते है। कई शैक्षणिक संस्थान भी इन्हें रिसोर्स परसन के रूप में बुलाते है। वहीं कुछ सालों से इन्हें सेमीनार, कार्यशालाओं व सम्मेलनों में भी बुलाया जाने लगा है। इन सब कार्यों की एवज में इन्हें मानेदय दिया जाता है। विगत कुछ माह से इनके यूट्यूब चैनल शून्यकाल से इन्हें आय होने लगी है। इन सब से इनका जीवन चल रहा है।
Hira Lal Megwhanshi
जीप की पूरी कहानी तो सुनिए हीरजी की जबानी

कुछ साल पहले इन्होंने एक बोलेरो जीप खरीदी थी। विरोधी लोगों ने खूब सवाल उठाए कि समाजसेवी भंवर मेघवंशी ने जीप कैसे खरीदी, खरीदन के लिए रूपए कहां से आए, आदि-आदि। दरअसल रायपुर सम्मेलन के दौरान ही मित्र बने रेह गांव के हीरा लाल मेघवंशी (हीरजी) जो कभी ड्राइवर चलाया करते थे, उस सम्मेलन के बाद सदा के लिए भंवर मेघवंशी के साथी हो गए और वे हर समय भंवर मेघवंशी के साथ रहने लगे। हीरजी को साथ जोड़े रखने के लिए जीप की आवश्यकता महसूस की गई। तब भंवर मेघवंशी ने लोन पर जीप ली। लोन की कुछ किस्ते हीरजी ने जीप किराये पर चलाकर जमा कराई, वहीं कुछ किस्ते भंवर मेघवंशी के दोस्तों ने जमा कराई, जिनका भुगतान भंवर मेघवंशी ने बाद में किया। अब तो वो जीप भी थक चुकी है, जिसे पुनः ऊर्जावान बनाने की जरूरत है।
अंत में . . . मैं यह कहना चाहता हूं कि 2007 से लेकर आज तक कई यात्राओं, संघर्षों, आंदोलनों आदि में मैं कई समय भंवर मेघवंशी के साथ रहा। कभी मैंनें उन्हें किसी से अनैतिक सौदेबाजी करते हुए नहीं देखा। आज पीड़ित भी जिंदा और पीड़ितों को पीड़ा देने वाले भी जिंदा है, उनसे मुखातिब होकर भी हम भंवर मेघवंशी के बारे में उनके विचार जान सकते है। मैंनें तो देखा और जो अनुभव किया वो लिख दिया। अगर आपका भी इनसे कोई वास्ता पड़ा है तो अपने अनुभव शेयर किजिए, मुझे लगता है इस माध्यम से भी हम सच्चाई को सबके सामने रख सकते है। 

Friday, May 4, 2018

ये विदाई नहीं थी, ना ही बहुत स्नेह था, ये तो ताकत को सलाम था

आदरणीया डॉ. अंजली जी,

आप हवा के झोंके की तरह आए और उसी तरह चले गए। बहुत सारी यादें, बहुत सारी मुस्कुराहटें, बहुत सारी सकारात्मक ऊर्जा और न्याय व समानता की डगर हमारे लिए छोड़कर। आपका बहुत-बहुत आभार। आज बहुत खुशी हुई ये देखकर कि आपको सैकड़ों लोग शुभकामनाएं देकर, शॉल ओढ़ाकर, फूलमालाएं पहनाकर, बुके भेंट कर आपको विदा कर रहे थे, वहीं आपके कुछ सहकर्मी अश्रुपुरित आंखों से विदाई दे रहे थे। कई स्वार्थी लोग थे, सभी अपने-अपने एजेण्ड के तहत विदाई दे रहे थे। कई मौके की नजाकत को देखकर कदम उठा रहे थे लेकिन कड़वा मगर सच्चा तथ्य यह है कि चंद लोगों को छोड़कर बाकी सभी लोग ताकत को सलाम कर रहे थे। कुछ अपनी अपेक्षाओं को साकार करने की जुगत में अवसर का सदुपयोग कर रहे थे। उम्मीद है आप भली भांति जान रहे होंगे क्योंकि मैं मानता हूं कि चेहरों को पढ़ने में अब आप पारखी हो ही चुके है। 


इन सब बातों से इतर मुझे आपका अघोषित विदाई समारोह बहुत अच्छा लगा। अच्छी लगी आपकी उत्सुकता, आपकी मुस्कुराहट, आपकी बिना किसी मन में मेल रखे सबको साथ लेकर चलने की सोच। मैंनें आपके चहरे पर विदाई के दर्द को भी महसूस किया। अपने सहकर्मी व्यास जी, मांगी लाल जी, धर्मेन्द्र जी और आपके ड्राइवर साहब से विदा लेते समय आपने अपने आंसुओं को आंखों से सीधे अपने दिल में खींच कर गालों पर लुढ़कने से रोक कर भी ये साबित कर दिया कि आप वाकई ताकतवर हो। फिर भी आपके हार्दिक वियोग को वहां खड़े सहज वृत्ति वाले लोगों ने आसानी से देख लिया। वैसे आप कोई एलियन तो है नहीं जो आपको न समझा जा सके।
विदाई समारोह में लोग आपकी खिदमत में कसीदे पढ़ रह थे और आप कसीदे सुन-सुनकर कुर्सी पर बिदक रहे थे। आखिर क्यूं नहीं बिदकेंगे, आपने महज 7 माह में अपने इतने फॉलोअर जो बना लिए। सो वन अनादर पॉइंट इज देट ‘यू आर ए गुड लीडर एलसो’ मैं भी देखकर न केवल गौरवान्वित हो रहा था बल्कि मेरा मन प्रफुल्लित हो रहा था। आप अक्टूबर-17 में गोगुन्दा आए, चर्चाएं थी कि आप महज तीन माह तक यहां सेवाएं देंगे। मगर इस क्षेत्र के हम लोगों का सौभाग्य ही रहा। आप करीब 7 माह तक यहां रहे और कई इनोवेटिव व अविस्मरणीय कार्य यहां किए। 

सादगी की मिशाल है आप

विगत 7 माह में मैंनें नोटिस किया कि आप वंचितों, गरीबों एवं महिला सशक्तिकरण की हिमायती है। सरल व्यवहार, मृदुभाषा और सकारात्मक कार्य शैली की धनी है आप। आईएएस जैसे ओहदे पर मैंनें आप जैसी विलक्षण प्रतिभा कहीं नहीं देखी। आपने एक दिन दिव्यांग आईएएस ईला जी का विडियो साझा किया था। ये देखकर आपके मानवीय दृष्टिकोण की झलक मिली। आज सुबह ही गोगुन्दा के दो 60 वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों से चर्चा कर रहा था। राज घरानों से संबंधित इन दोनों नागरिकों ने बताया कि वे क्यूं आपने मिलने आपके चैम्बर में आए थे और आपने किस तरह उन्हें सम्मान देकर उनकी व्यथा सुनी। छोटे-बड़ों को सम्मान देना यानि समानता का व्यवहार करना तो कोई आपसे सीखे। वाकई आप मिशाल है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर की समानता की अवधारणा को लागू होते हुए मैनें आपसे देखा। 


आप को जब भी कॉल करता था तो सामने से आप की आवाज आया करती थी - हां पत्रकार साहब बताइए। शुरू-शुरू में मैं झेंप जाया करता था, दिमाग दौड़ाता था कि मैंने तो कहीं पत्रकारिता की धौंस नहीं दिखाई। कई बार कई-कई घंटों तक सोचता रहता था कि एसडीएम साहिबा ने मुझे पत्रकार साहब क्यों कहा ? एक बार तो शायद मैंनें आपसे पूछ ही लिया था। पर फिर कई मौको पर आपको आपके वाहन के ड्राइवर को ड्राइवर साहब, ग्राम पंचायत के सचिव को सचिव साहब कहते हुए देखा तो पता चल गया कि ये आपका हर नागरिक को सम्मान देने का नैचर है। सॉरी मैं एक वाक्य भूल गया, राजघरानों से ताल्लुक रखने वाले उन दो बुजुर्गों में से एक ने मुझे कहा कि ये एसडीएम कोई अच्छे मेनर्स वाली फैमिली की लगती है। बोले - अजी संस्कारवान परिवार के लक्षण तो संतानों में साफ नजर आते है। बहुत संस्कारित परिवार की बेटी है ये। आगे बोले - कमबख्त ये लोग इन्हें कैसे नहीं समझ पाए, कीड़े पड़ेंगे इन लोगों के। जब आज ही आपकी विदाई होने की खबर मैंनें उन्हें दी तो वे दुःखी हो गए। आपके धूर विरोधियों को इतने श्राप दे दिए कि पूछिए मत। यहां मैंनें तय किया कि जीवन में इस प्रकार जो किसी को सर्वाधित चाहता है, उसके बारे में उन्हें सेड़ न्यूज कभी मत दो। 

काम जो बाकी रहे गए, आप जहां भी जाए पूरे करना

आपने हर चैलेंज को सहर्ष स्वीकार किया। मजावड़ी व विसमा में आयोजित की गई चौपाल हो या आकस्मिक निरीक्षण करने की बात हो। आपने आते ही हॉस्पीटल में निरीक्षण किया। आपकी जानकारियों का खजाना देखकर आश्चर्य हुआ। मेडिकल फिल्ड की महत्वपूर्ण जानकारियां आप बखूबी जानती है। क्षेत्र में मरीजों के जीवन से खिलवाड़ कर रहे बंगाली व झोलाछाप डॉक्टरों के विरूद्ध ठोस कार्यवाही देखने का मेरा सपना आपने अधूरा रख दिया। आप जहां भी जाएं ऐसे लोगों के खिलाफ जरूर कार्यवाही करिएगा। मैंनें देखा है ऐसे लोग पानी के इंजेक्शन मरीजों को लगाकर उनसे 300-400 वसूल लेते है। 


कई बार जो जैसे दिखते है, वे वैसे होते नहीं है 

आपने एक आवासीय विद्यालय पर काफी मेहरबानी की। निश्चित तौर पर आपकी मेहरबानी से उस विद्यालय के स्टाफ, वहां अध्ययनरत छात्राओं व जनप्रतिनिधियों में उत्साह का संचार हुआ। वहां उत्तरोत्तर वृद्धि देखने को मिली। उस विद्यालय के सर्वसर्वा अच्छे गुणों वाले है, साफ छवि के है, सब कुछ ठीक करते है, इन्हें लेकर सत्य जुदा है। ये ऐसे लोग है जो जैसे दिखते है वैसे है नहीं है। चरित्र तो इनका लंगोट खोल कर तार पर टंगा हुआ है। बस इनकी नंगाई को अबोध बालिकाएं नहीं देख ले कहीं। मैं तो आप से पहले वहां कभी गया ही नहीं लेकिन आपके साथ महज दो बार जाने में सभी अच्छाइयों के पीछे खतरनाक वाली बुराई को भी देख-समझ आया। ये बहुत ही खतरनाक वाला अनुभव है। इस नकारा गया तो यह सब कुछ नस्तेनाबूत कर देता है। 


मेरा अंज्म्पशन . . . 

जब गोगुन्दा के एसडीएम बनकर आए थे। मेरा अंज्म्प्शन था कि आप आईएएस है और आप निश्चित तौर पर इस क्षेत्र के लिए अच्छा करेंगे और एक एसडीएम की तरह कार्य करेंगे और आपने कर दिखाया। एक मसले को हल करने के लिए आपने मध्यस्तता की। मेरी जानकारी के अनुसार वह सफल मध्यस्तता थी। एक बार तो यह मध्यस्तता सफल रही। लेकिन स्वयंभू सत्ताधीश ने राजी खुशी मध्यस्तता कर लेने के बाद दूसरे दिन मध्यस्तता को ठुकुरा दिया जिसका नतीजा हम सभी ने देख लिया। 

शुरूआती दिनों में स्वयंभू सत्ताधीश के यहां लंच करते हुए देखा तो मानो धरती तले से जमीं खिसक गई। मन में सोचा - कहां है आईएएस का प्रॉटोकॉल। कहां है एसडीएमगिरी की तटस्थता। उस दिन लगा कि गई भैंस पानी में। 

लगा कि पुरूष वर्ग के उपखण्ड व जिला स्तर के अधिकारी जिन कथित सत्ताधीशों के आगे साष्टांग दण्डवत करते पाए जाते हो वहां आप क्या कर लेंगी। लेकिन आपने कर दिखाया। अंतिम 15 दिनों में तो आपने जो डेयरिंग कार्य किए है, काबिल तारीफ है। खेद है यहां का उत्साही युवा आपको नहीं समझ पाया . . . 

याद रहेंगे सामाजिक बदलाव के आपके अनुकरणीय प्रयास 


आदिवासी क्षेत्र के छात्रावासों व स्कूलों की छात्राओं की माहवारी से जुडे मुद्दों पर कोई नहीं सोचता। अधिकारी वर्ग में से भी कई आदिवासी क्षेत्रों से बटोरने में लगे रहते है। आपने अलग किया। बालिकाओं को मशीन के माध्यम से सेनेटरी पेड मुहैया करवाने की शुरूआत आपके होते ही संभव हो पाई। महात्मा ज्योति बा फूले की जयंती शायद ही इस क्षेत्र में मनाई गई हो। आपने शुरूआत करवा दी। स्कूली बालिकाओं को आत्मरक्षा के गुर सिखाने का बीड़ा भी आपने उठाया। आपके दफ्तर में आकर आपसे एक बार मिला हर नागरिक आपका कायल है। वे आपकी तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते है। बस आप भी अथक प्रयास करते रहिएगा। न्याय, समानता की डगर पर चलते हुए आप अथक चलते रहिएगा। आपके ड्राइवर साहब के मनोवियोग को ध्यान में रखते हुए कबीर साहेब की पंक्तियां - कबीरा जब हम पैदा भये, हम रोये जग हंसे, ऐसी करनी कर चलो कि हम हंसे, जग रोये। 

ताकत को सलाम है, हम साथ - साथ है . . . 

जिंदाबाद . . .

असीम शुभकामनाओं के साथ,

आपके पत्रकार साहब - लखन सालवी 

Friday, July 14, 2017

एक दलित समुदाय के लोग दिन-रात श्मसान भूमि में दे रहे है धरना

देवगढ़ के मुर्दे अब कहां जाएं ?

सर्वण हिन्दू, दलित हिन्दूओं को दबाकर रखने के लिए हर संभव कार्य करते है। मारपीट करना, गाली गलौच करना, उनके आवासों व कृषि की जमीनें हड़पना आम बात है। अब दलितों के श्मसानों पर इनकी नजर है, अब वे दलित मुर्दों को भी खदेड़ना चाहते है। भारत में सवर्ण हिन्दू विभिन्न अवसरों पर विभिन्न संगठनों के माध्यम से भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की दहाड़े मारते है, दूसरी ओर वो अपने ही धर्म के लोगों के साथ ऐसा अन्याय करने को आमादा हो जाते है जो हिन्दू धर्म में अति निन्दनीय है। पर वास्तव में धर्म की पड़ी किसे है, यहां धर्म की आड़ में सत्ता और स्वार्थ का बोलबाला है।



राजसमन्द जिले में दलित अत्याचार की घटनाएं होना आम बात है। यहां कभी किसी दलित की पगड़ी उतार पर आग की भट्टी में डालकर ये कहते हुए जला दी जाती है कि ‘‘तुमने हमारे जैसी पगड़ी क्यों बांध ली’’। कभी जमीन हड़पने की नियत से सोलंकियों का गुढ़ा के दलित परिवार की महिला को डायन कह दिया जाता है तो कभी घोड़े पर बिन्दौली निकालने पर मारपीट की जाती है। इन सभी प्रकार के अत्याचारों को दलित समुदायों के लोग सदियों से सहते आए है, पिछले कुछ सालों से विरोध भी करने लगे है। विरोध किया तो कहीं जीते, कहीं हार का मूंह भी देखना पड़ा। खास बात यह रही है कि बिखरे-बिखरे रहने वाला दलित समुदाय अब संगठित होकर संघर्ष करने लगा है, फिर चाहे मुद्दा सामूदायिक हो या व्यक्तिगत, अत्याचार का हो या अधिकारों के दमन का।

अभी रात के 11.30 बज चुके है, दिन है 10 जुलाई 2017 का। देवगढ़ के सालवी समाज के लोग अभी रात में कस्बे के शास्त्रीनगर में स्थित श्मसान भूमि में धरने बैठे हुए है। समाज के महिला-पुरूष आज दिन भर श्मसान भूमि में धरने पर बैठे रहे थे। शाम होने के बाद महिलाएं घरों पर चली गई और परिवार के बड़े, बुजुर्ग व युवा श्मसान में ही रूके रहे है। धरने में भंवर लाल, नारायण लाल, अर्जुन लाल, तुलसीराम, हिरा लाल, शंकर लाल, निशांत, नारायण लाल, रमेश चन्द्र, शोभा लाल, श्रवण लाल, केसूराम, धर्मेश कुमार, रोशन लाल, देवी लाल, सुरेश चन्द्र, जीतेन्द्र कुमार, चम्पा लाल, कैलाश, गोपाल लाल, राहुल, नेपल सहित करीब 100 लोग श्मसान भूमि में ही धरने पर बैठे हुए है।

2013 में जनसहभागिता योजना में स्वीकृत हुई चारदिवारी, समाज ने जमा करवा दी 10 प्रतिशत राशि, टेण्डर भी हो गए पर नहीं बना रहे चारदिवारी

2013 में नगरपालिका ने इनकी सुनवाई की, जनसहभागिता योजना के तहत चारदिवारी स्वीकृत कर दी। इस योजना के नियमानुसार समाज के समाज के लोगों ने 19 सितम्बर 2013 को रसीद क्रमांक 59 के जरिए नगरपालिका में 58 हजार 800 रूपए जमा करवा दिए। यानि योजनानुसार 10 प्रतिशत राशि सालवी समाज के लोगों ने जमा करवा दी, जिसके आधार पर नगर पालिका ने 5 लाख 88 हजार रूपए की चारदिवारी स्वीकृत कर दी। चारदिवारी बनाने के लिए टेण्डर आमंत्रित किए। टेण्डर ठेकेदार ने कार्य आरम्भ करना चाहा तो श्मसान भूमि के पास आकर बस चुके सवर्ण परिवारों के लोगों ने आपत्ति जताते हुए शिकायत कर दी और चारदिवारी निर्माण का कार्य रूकवा दिया। उसके बाद से सालवी समाज के लोग नगरपालिका के चक्कर काट रहे है लेकिन चारदिवारी का कार्य नहीं करवाया जा रहा है।

जानकारी के अनुसार यहां केवल श्मसान भूमि ही थी। समाज के बुजुर्ग व्यक्ति नाथूराम मेमात ने बताया कि श्मसान आज-कल का नहीं है। इस भूमि में हमारी दसियों पीढ़ियों के पूर्वज दफन है। समाज के शिक्षित युवाओं ने बताते है कि देवगढ़ कस्बे के बसने के साथ ही यह श्मसान बनाया गया था। धर्मेश सालवी ने बताया कि उनके परिवार की चार पीढ़ी के लोगों का यहीं पर अंतिम संस्कार किया गया। पहली पीढ़ी के भैराराम चिताणिया, दूसरी पीढ़ी के पिताराम चिताणिया, तीसरी पीढ़ी के गंगाराम चिताणिया, चौथी पीढ़ी के चेनाराम चिताणिया के शरीर यहीं जमींदोज हैं। इससे साफ होता है कि करीब सौ सालों से यह श्मसान भूमि सालवी समाज की ही है।

अब बात करे उन लोगों की जो बेनामी शिकायतें प्रशासन से कर रहे है। इस श्मसान को यहां से हटाने का प्रयास इसके आस-पास बस चुके सवर्ण परिवारों के लोग कर रहे है जो पिछले 10-15 सालों में यहां आकर बसे है। इन लोगों ने नगरपालिका के भूखण्ड़ों को निलामी में खरीदा। तब इन लोगों को श्मसान की जानकारी होते हुए भी चूंकि जरूरत थी इसलिए नीलामी में भूखण्ड खरीद लिए। नगरपालिका की स्कीम में उनके भूखण्ड़ों के दरवाजे श्मसान भूमि के विपरित दिशा में है, बावजूद कई लोगों ने श्मसान भूमि की ओर भी दरवाजे लगा दिए और अब येनकेन प्रकारेण श्मसान को बंद करवाना चाह रहे है। इनका बस चले तो श्मसान की भूमि पर महल बना दे।

धरने पर बैठे श्रवण सालवी ने बताया कि नगरपालिका द्वारा चारदिवारी का निर्माण कार्य नहीं करवाए जाने के कारण समाज के लोगों ने 07 जुलाई को चारदिवारी का कार्य शुरू कर दिया। कार्य शुरू करने के कुछ देर बाद उपखण्ड अधिकारी ने मौके पर आकर कार्य रूकवा दिया। उन्होंने बताया कि लोगों ने फोन पर शिकायत की, जिसके बिहाफ पर वे काम बंद करवाने आए है। इससे साफ जाहिर हो जाता है सालवी समाज के श्मसान की चारदिवारी के कार्य बंद करवाने में निश्चित तौर पर बड़े राजनेताओं का हाथ भी है। सालवी समाज के लोगों ने एसडीएम को सच्चाई से अवगत कराया, जनसहभागिता योजना के चारदिवारी की स्वीकृति की बात भी बताई पर वे नहीं माने और काम बंद करवाकर ही माने।

उसके बाद से सालवी समाज के लोग चारदिवारी निर्माण की मांग को लेकर श्मसान पर बैठ गए। जो अभी तक बैठे हुए है। 10 जुलाई को दोपहर में उन्होंने जिला कलेक्टर के नाम एसडीएम को ज्ञापन दिया और चेतावनी दी है कि अगर 3 दिन में चारदिवारी का कार्य आरम्भ नहीं किया गया तो वे आमरण अनशन करेंगे।

समाज के लोग श्मसान भूमि में धरने पर बैठे है, यहीं पर खाना बनाकर खाया है, सुनवाई नहीं हुई तो यहीं पर आमरण अनशन करने की चेतावनी दे रहे है। कुछ लोग सो चुके है, कुछ आगे की रणनीति बना रहे है।