Monday, July 18, 2011

ये पब्लिक है सब जानती है..

लखन 18 July 2011 -  बारां जिलें में हुई अतिवृष्ठी  से कई मकान क्षतिग्रस्त हुए... बारां शहर में बाढ़ आ गई... मंत्री प्रमोद जैन भाया स्वयं  ट्रेक्टर चलाते हुए बारां शहर में घूमें और भूखो को भोज़न दिया. . . उनके काम को मीडिया ने बहोत सराहा. . . ट्रेक्टर चलाते हुए मंत्री भाया की कई फोटोएं छापी. . पर मीडिया ने यह सवाल करने की ज़हमत नहीं उठाई कि खैरुना, सिम्लोद, दिगोद्पार, फतेहपुर, सोडाना का डांडा सहित सैकड़ो गाँवों में भूखे और बिना छत के रहे लोगो की सुध क्यों नहीं ली...
एक्के दुक्के  न्यूज़ पेपर को छोड़ कर सब तमाशेबिनो के तमाशो को  छापते  रहे...
विपक्ष भी मजे लेता नज़र आया... मदन दिलावर भी भाया की देखा देखी ट्रेक्टर पर बैठ कर बारां शहर के गरीबों की सुध लेने पहुंचे. . . मीडिया ना होता तो शायद वो मदद का दिखावा करने भी बाहर नहीं आते... लेकिन मीडिया कवरेज़ को देखते हुए वो भी ट्रेक्टर से लोगो के बीच आये... और तो और वो ट्रेक्टर के इंजन  के आगे लगे बम्पर पर बैठ कर जनता की सुध लेने आये...
और लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ उनके गुणगान करता रहा . . जैसे जनता कुछ समझती ही नहीं...अगर भाया और दिलावर गावों में उन गरीबों तक पहुचते जिनके सर पर साया ना रहा... जिनके बच्चे बरसाती बारिश में भीगते रहे.. जिनके आशियाने नहीं रहे... और जो भूखे थे..  तो जनता की जयादा सम्पेती पाते.. लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ.. राजनेताओं ने तो सुध ना ली पर मीडिया ने भी ना ली..

Tuesday, January 4, 2011

उठने लगी वंचित वर्ग की भूमि अधिकार की मांगे - लखन सालवी


 उठने लगी वंचित वर्ग की भूमि अधिकार की मांगे - लखन सालवी

      देशभर में भूमि के मामले में दलितों की स्थिति ठीक नहीं है। कमजोर शोषित वर्ग की जमीनें छीनी जा रही है, उनकी जमीनों की चंद रूपयों का लालच देकर खरीदी जा रही है। कभी कभार बड़ी जद्दोजहद के बाद दलितों को सरकार भूमि आवंटित करती है। उस पर भी प्रभावशाली उच्च वर्ग के लोग कब्जा कर लेते है। ये वंचित वर्ग के शोषित लोग उन लोगों के खिलाफ आवाज तक नहीं उठा पाते और अंतोगत्वा कृषि भूमि आवंटन 1970 के नियम 14 (4) के तहत दलित को किए गए आवंटन को निरस्त कर भूमि ले ली जाती है।
बारां जिले की किशनगंज तहसील की परानियां ग्राम पंचायत के बंजारा जाति के लोगों को 4 वर्ष भूमि आवंटित की गई। सीमांकन करवाने के लिए उन लोगों ने कई बार पटवारी तहसीलदार के चक्कर लगाए लेकिन सीमांकन नहीं करवाया। थक हार के उन लोगों ने खाली पड़ी भूमि पर कब्जा कर काश्त करना आरंभ कर दिया। संयोग से वो खाली भूमि वन विभाग की थी और वनाधिकारी ने उन पर जुर्माना कर दिया। तब से ही वो लोग उस वन भूमि पर काश्त कर रहे है और प्रतिवर्ष जुर्माना दे रहे है। 22 नवम्बर 2010 को परानियां में ‘‘प्रशासन गांव के संग अभियानके तहत शिविर का आयोजन हुआ। उन लोगों ने शिविर प्रभारी को सीमांकन के लिए आवेदन किया। शिविर प्रभारी ने पटवारी को सीमांकन के आदेश दे दिए लेकिन अभी तक सीमांकन नहीं हो पाया है। सीमांकन के अभाव में बंजारा जाति के उन सभी लोगों को पता ही नहीं है उन्हें आवंटित हुई भूमि कहां है। उन्हें  कुछ वर्षो तक और अंधेरे में रखा जाएगा और फिर कृषि भूमि आवंटन नियम 14(4) की कार्यवाही कर भूमि वापस छीन ली जाएगी। ऐसे में क्या उन दलितों को क्या मिलेगा ?
यह तो कृषि भूमि की बात थी। दलितों को तो रिहायशी भूमि भी नहीं दी जाती। कई जगहों पर तो मुर्दे दफनाने के लिए भी भूमि नहीं दी जा रही है। जबकि वंचित वर्ग के लोगों को राजस्थान पंचायतीराज अधिनियम के नियम 158(1) 158(2) के तहत रियायती दर पर रिहायशी भूखण्ड़ दिए जाने के प्रावधान है। लेकिन राजस्थान में इन नियमों के तहत दिए जाने वाले 7 प्रतिशत भूखण्ड़ कहीं भी दिए गए हो, ऐसा नहीं हुआ है। भीलवाड़ा जिले के कोशीथल गांव में वर्ष 2004 में प्रशासन आपके द्वार अभियान के तहत आयोजित हुए शिविर में 60 लोगों को रिहायती दर पर भुखण्ड़ आवंटित किए गए थे। लेकिन किसी को भी आज तक पट्टें नहीं दिए गए, क्योंकि उनमें 60 फीसदी लोग दलित थे। आवंटन के 6 साल बाद 22 दिसम्बर 2010 को ‘‘प्रशासन गांव के संग अभियानके तहत आयोजित हुए शिविर में इन लोगों ने पुनः पट्टों की मांग की तो विकास अधिकारी ने पुनः आवेदन करने को कहा, ताकि दलित पुनः आवेदन करे और उनके आवेदन को निरस्त किया जा सके। दूसरी तरफ पिछले दो सालों में उच्च वर्गो के करीबन 75 लोगों ने आबादी भूमि पर अवैध कब्जा किया है। उनके साथ 8 भील जाति के लोगों ने भी खाली पड़ी आबादी भूमि में अपने तंबू गाड़ दिए और रहने लगे। उच्च वर्ग को यह नागवार गुजरा और वो इनके तंबू उखाड़ने के प्रयास में लगे है। प्रशासन यह सब कुछ देखकर मौन है।
खैर राजस्थान में ऐसे कई मामले है और दलितों पर अत्याचार का एक बड़ा कारण भूमि है। दलितों की स्थिति में सुधार, खासकर भूमि सुधार पर चर्चाएं होती रही है और उन्हीं चर्चाओ का नतीजा है कि वंचित वर्ग के लोगों की भूमि बचाने उन्हें भूमि दिलवाने के लिए राजस्थान भूमि अधिकार अभियान चलाया जा रहा है। भूमि सुधार की दिशा में आन्दोलन की अतिआवश्यकता महसूस की जा रही है। भूमि सुधार के लिए तैयारी आरंभ हो चुकी है।
भूमि सुधार की उसी दिशा में पहला कदम था कि विकास अध्ययन संस्थान में 28 दिसम्बर 2010 को विकास अध्ययन संस्थान में राजस्थान भूमि अधिकार अभियान की ओर से सेमीनार आयोजित किया गया। एक्शनएड, आइडिया डगर संस्था के सहयोग से आयोजित इस सेमीनार में राजस्थान में दलितों के लिए काम कर रहे 70 लोगों ने भाग लिया और अपने-अपने क्षेत्रों में दलितों की भूमि की स्थिति के बारे में बताया उनकी स्थिति में सुधार के लिए विचार प्रस्ताव रखे। भूमि सुधार पर विकास अध्ययन संस्थान के प्रो. सूनील रे का कहना है कि सूचना के अधिकार, भोजन के अधिकार, शिक्षा के अधिकार कानूनों की तरह ही भूमि अधिकार कानून बनना चाहिए। भूमि के लिए हांलाकि पहले से ही कानून तो बने है लेकिन उनमें कई कमियां है, अनुपालना नहीं हो रही है। हर एक के पास खेती करने रहने के लिए भूमि हो, और यह हक दिलवाने के लिए भूमि अधिकार कानून की सख्त जरूरत है। दलितों को एक हाथ से भूमि देकर दूसरे हाथ से वापस छीनी जा रही है। कृषि भूमि आवंटन नियम के तहत सरकार ने गैर खातेदारी से खातेदारी देकर महज काश्त का अधिकार दिया है, मालिकाना हक नहीं। वंचितों को जमीन एलोट करने की बात पर सरकारें कहती है कि भूमि नहीं है दूसरी तरफ वहीं सरकारें पूंजीपतियों को जमीनें खरीद कर देती है। राजस्थान में सरपल्स भूमि है, भूमि बैंक बनाकर भूमिहीनों को भूमि दी जानी चाहिए।
भूमि अधिकार की मांग को लेकर देश व्यापी भूमि अधिकार जनसत्याग्रह की तैयारी शुरू हो गई है। इस संदर्भ में 26 राज्यों में राज्य स्तर पर वंचित वर्ग के लिए कार्य कर रहे संस्था-संगठनों के लोगों सामाजिक कार्यकर्ताओं के साथ विचार विमर्श बैठकों का आयोजन हुआ है। 2 अक्टुबर 2011 से भूमि अधिकार की मांग को लेकर देशभर में जीप यात्रा निकाली जाएगी तथा 2 अक्टुबर 2012 से ग्वालियर से दिल्ली तक पैदल यात्रा निकाली जाएगी।

Tuesday, October 5, 2010

सच बोला तो किया जाती से बाहर


बालू लाल गुर्जर का संवैधानिक कोर्ट में सच्च बोलना जाति पंचायत के पंचों को गंवारा नहीं गया। भीलवाड़ा जिले की मांडल तहसील के सूलिया गांव के बालूराम गुर्जर ने पुलिस के सामने कोर्ट में सच्च बोल दिया। जिसका फल मिला कि जाति पंचों से समाज से बहिस्कृत कर दिया।
हूआ यूं कि सूलिया गांव में  देवनारायण मंदिर में गुर्जर जाति के लोगों ने जबरन कब्जा कर लिया और दलितों को मंदिर में प्रवेश वर्जित कर दिया। दलितों ने मुकदमा दर्ज करवाया। बालूराम गुर्जर ने गवाही दी और तप्तीष करने आई पुलिस को सच्च बता दिया कि देवनारायण मंदिर की बरसों से बलाई जाति के व्यक्ति ही पूजा कर रहे है। इससे नाराज होकर गुर्जर जाति के लोगों ने पंचायत बुलाई। पंचायत में बालू लाल गुर्जर पर अपने बयान बदलने के लिए दबाव बनाया। बालू लाल ने पंचों की बात नहीं मानी तो पंचो ने उसे जाति से बाहर कर दिया। तब से ही बालू लाल अपने परिवार के साथ घूट-घूटकर जी रहे है। वह अपनी बहिन, अपने सगे संबंधी के घर नहीं जा सकते हैं और ना ही इनके सगे संबंधी ही इनके घर जा सकते है। बालू लाल गुर्जर ने जाति पंचों के खिलाफ दावा भी किया लेकिन जाति पंचों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई है।

मैं किस से शादी करूँ ..?


अधिकतर जाति पंचायत महिलाओं को लेकर ही आयोजित की जा रही है। समाज के पुरूषों की आपसी रंजिषों में महिलाओं के साथ कुठाराघात किया जा रहा है। अब इस मामले को ही देखिए इसमें यषोदा का क्या दोष हैं? उसे क्यों बली का बकरा बनाया जा रहा हैं? क्या वह अपनी मर्जी से विवाह नहीं कर सकती?
बड़ा महुआ निवासी उगमाराम जाट की पुत्री यषोदा की सगाई भोली गांव के भंवरलाल जाट के पुत्र गोवर्धन जाट के साथ की थी। गोवर्धन जाट के एक अन्य मुस्लिम समुदाय की युवती के साथ अवैध संबंध थे। जिसकी भनक जब मुस्लिम समुदाय के लोगों को लगी तो काफी लड़ाई झगडे़ हुए। जिसके बाद गोवर्धन जाट मुस्लिम युवती के साथ कई बरसों तक रहा। इसकी जानकारी यषोदा को भी मिल गई। यषोदा ने गोवर्धन से विवाह करने से अपने पिता को साफ मना कर दिया। तब यषोदा के पिता उगमाराम भोली गांव गए और गोवर्धन के पिता से मिलकर यषोदा के मन की बात बताई तो गोवर्धन के पिता भड़क उठे और गालियां निकाली। गोवर्धन उसी ‘‘आम चैकला जाट समाज एंव बदनौरा जाट समाज’’ नाम की जाति संस्था के पंचों से मिला। पंचों ने 9 सितम्बर 2010 को भीलवाड़ा के नजदीक स्थित सिंदरी बालाजी के मंदिर पर पंचायत बुलाई। उगमाराम जाट को धमकी भरा नोटिस देकर तलब किया। उगमाराम अपने दो भाईयों लादू लाल व सत्तू के साथ वहां गया। पंचों ने यषोदा का विवाह गोवर्धन के साथ कराने के लिए दबाव बनाया। तीनों भाईयों ने जब विरोध किया तो पंचों ने जाति से बाहर कर देने की धमकी दी। उगमाराम व उसके भाईयों ने पंचों के फैसलें को नहीं माना तो गोवर्धन व उसके साथियों ने हाॅकी स्टिकों तथा लोहे के सरियों से इनकी पिटाई कर दी। छोटु लाल जाट ने तुरंत 108 पर काॅल कर एंबुलेंस बुलाई और सरकारी अस्पताल में ईलाज करवाया। मामले की रिपोर्ट 26.9.2010 को सुभाषनगर, भीलवाड़ा में दर्ज कराई गई। लेकिन अभी तक अपराधियों के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई है। उधर यषोदा ने पुलिस अधिक्षक के समक्ष एक प्रार्थना पत्र किया है जिसमें मांग की है कि अगर मेरी शादी गोवर्धन के साथ करवाई जाएगी तो मैं आत्महत्या कर लूंगी। उसने अपने पिता व चाचा के साथ मारपीट करने वाले लोगों के खिलाफ कार्यवाही करने की मांग भी की।

Sunday, October 3, 2010

मजदूरी कर दी मुख्यमंत्री को दान

मै अपने कार्यालय में बैठा था कि बाहर से आवाज आई .... अल्लाह के नाम पर दे दे सेठ ... मैंने बाहर देखा तो एक बाबा अपने हाथों में लौबान का कटोरा लिए हुए खड़ा है..... मै जेब टटोलता हुआ बाहर आया और जेब से हाथ में आया हुआ एक रूपया बाबा के हाथ में थमा दिया........बाबा ने पहले तो सिक्के को और बाद में मुझे घूरकर देखा और सिक्के को वापस मेरे हाथ में देता हुए बोला..... ये ले सेठ.... तू ही रख ले इसे... तेरे काम आएगा...  यानि कि भीख में भी एक रूपये को स्वीकार नहीं किया भिखारी ने..... और यह बात है वर्ष 2003 की.
आज 7 वर्ष बाद टोंक जिलें में महानरेगा मजदूरों को कड़ी धूप में काम करने का.... प्रतिदिन का एक रूपये के हिसाब से पैसा दिया है सरकार ने.... सभी महानरेगा मजदूरों ने सरकार से पूरी मजदूरी देने की मांग की लेकिन जब सरकार ने दो माह बाद भी सुनवाई नहीं तो महानरेगा मजदूरों ने अपने पैसो से बस किराये पर की और जयपुर आकर महानरेगा में काम करने पर मिली मजदूरी को मुख्यमंत्री को दान में देते हुए राहतकोष में जमा कराई.