Tuesday, April 21, 2015

नहीं तो बेघर हो जाती धापू

आर्थिक सहायता दिलवाने व वित्तिय प्रबंधन में धापू का सहयोगी बना केंद्र


अबला धापू बाई की श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केंद्र द्वारा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ दिलवाने में मदद की गई। योजना के अंतर्गत मिली सहायता राशि से उसे मजबूती मिली, उसने अपने परिवार को बेघर होने से बचा लिया। अब वह सबला हो गई है।
धापू बाई गमेती
उस दिन को याद करते हुए धापू बाई ईश्वर को धन्यवाद देती हैं, जिस दिन उसने भवन निर्माण एवं संनिर्माण कर्मकार मण्डल से पंजीकृत होने के लिए आवेदन किया। जब आवेदन किया तब उसे नहीं पता था कि वो उसके लिए कितना लाभकारी होगा। उसे तो कर्मकार मण्डल के अस्तिव में होने की जानकारी भी नहीं थी। वह कहती है भला हो मजदूर आॅफिस वालों का जिन्होंने उसे कर्मकार मण्डल से जुड़वाया।
अत्यंत गरीब परिवार में पली बढ़ी धापू बाई को स्कूल की चौखट पर पैर रखने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हो सका। बचपन में ही उसका विवाह करवा दिया गया। 14 साल की उम्र में उसने बेटी को जन्म दिया। वर्तमान में उसके 7 संतानें हैं। बड़ी बेटी का विवाह करवा दिया, जो अब ससुराल रहती हैं। वर्तमान में धापू बाई के परिवार में 8 सदस्य हैं। उसके पति की पूर्व पत्नि, 4 बेटियां, 2 छोटे बेटे और वह स्वयं। इन सबका पालन पोषण धापू बाई ही करती हैं। परिवार की आय का स्त्रोत धापू बाई की मेहनत हैं। कभी-कभी उसकी दो बेटियां भी मजदूरी करने जाती हैं। जमीन का एक छोटा टुकड़ा हैं जिसमें महज खरीफ की फसल हो पाती हैं। मकान के नाम पर एक कच्चा कवेलूपोश कमरा हैं।
पिछले वर्ष उसके पति देवाराम गमेती की मृत्यु हो गई। लम्बे समय तक गंभीर बीमारी से पीडि़त रहे देवाराम का उसने खूब ईलाज करवाया लेकिन वो नहीं बच पाया। पति जब बीमार हुआ तब घर में फूटी कौड़ी तक नहीं थी। बैंक खाता होना तो दूर की बात, परिवार में से किसी ने बैंक में पैर तक नहीं दिया था। पति के ईलाज के लिए पैसे नहीं थे तो उसने सबसे पहले 20,000 रूपए में अपने गहने गिरवी रखे। गोगुन्दा व उदयपुर के अस्पतालों में ईलाज करवाया लेकिन पति का स्वास्थ्य सुधरने की बजाए बिगड़ता ही गया। परिवार की आय एकदम ढप्प हो गई थी। पति की हालत में दिनों दिन गिरावट आती जा रही थी। किसी ने उसे बताया कि गुजरात के ऊंजा के एक अस्पताल में अच्छा ईलाज होता हैं। उसने पति का ईलाज ऊंजा के अस्पताल में करवाने का निर्णय किया, मगर ऊंजा ले जाने के लिए उसके पास रूपए नहीं थे। मां व भाई से उधार लिए 17,000 रूपए तथा उसके पास जो रूपए थे वो पति के ईलाज व बच्चों के पालन-पोषण में खर्च हो गए थे। अब ईलाज के लिए उसके पास रूपए नहीं थे। उसने कईयों के आगे हाथ फैलाए लेकिन किसी ने उसकी आर्थिक मदद नहीं की। तब उसे अपने खेत को गिरवी रखने का ख्याल आया। उसने 10,000 रूपए में खेत गिरवी रख दिया। खेत में मक्का की फसल खड़ी थी लेकिन उसके लिए पति का ईलाज करना अधिक महत्वपूर्ण था। उसने बिना कुछ विचार किए फसल सहित खेत को 10,000 रूपए में गिरवी रख दिया और पति को ईलाज के लिए ऊंजा ले गई। ऊंजा के अस्पताल में भी बीमारी का ईलाज नहीं हो सका तब वह बीमार पति को लेकर पुनः घर लौटी।
परिवार, रिश्तेदार व समाज के लोगों का दबाव था कि वो अपने पति को देवी-देवताओं के वहां ले जाए। उनकी बात मानना धापू बाई के लिए मजबूरी थी, वह अपने पति को क्षेत्र में स्थित विभिन्न देवी-देवताओं के स्थानों पर ले गई, हर जगह नारियल, अगरबत्ती, चढ़ावा इत्यादि चढ़ाया मगर इन सब से भी उसका पति ठीक नहीं हुआ। पति की हालत दिनों दिन बिगड़ती ही जा रही थी।
गोगुन्दा, उदयपुर, अहमदाबाद, ऊंजा सहित कई शहरों के अस्पतालों में ईलाज करवाया लेकिन सब सिफर रहा और अंततः जून 2014 में उसके पति की मृत्यु हो गई। धापू बाई ने बताया कि उसका पति 2 वर्ष तक बीमार रहा। इन दो वर्षों में परिवार की आय नाम मात्र रही। पति के ईलाज व बच्चों के लालन पालन में उसने अपने जेवर, खेत व आबादी भूमि को गिरवी रख दिया। यही नहीं रिश्तेदारों से भी कर्जा ले लिया। 
पति की मृत्यु के बाद सामाजिक कुरीति (मृत्युभोज) मुंहबाय खड़ी थी। उसे पति का मृत्युभोज करना पड़ा। पति की मृत्यु के दिन से लेकर 12 दिन तक परिवार व समाज के लोगों ने रीति रिवाजों के नाम पर खूब खर्चा करवाया। गम से थोड़ी उबरी धापू बाई ने आर्थिक स्थिति की ओर ध्यान दिया तो आंखों से नीर टपकने लगा। आर्थिक स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि बच्चों का पेट भरना भी मुश्किल हो गया। अब उस आस तो महज भवन निर्माण एवं संनिर्माण कर्मकार मण्डल से मिलने वाली आर्थिक सहायता की। बकौल धापू बाई ‘‘घर वाला री मौत फचे आॅफिस वाला म्हारो फाॅर्म भरवायो हो, वे मने बतायो क 45,000 रूपया पास वई सकेगा।’’
आर्थिक तंगी के दौर में धापू का कोई सहारा बना तो वह था श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केंद्र। केंद्र के लोगों ने आवेदन करने में पूरी मदद की और उसे हौंसला बंधाया। उसके बैंक खाता नहीं था, केंद्र के कार्यकर्ता ने ही सहयोग कर खाता खुलवाया। 7 जुलाई 2014 को उसके बैंक खाते में 45,000 रूपए की सहायता राशि आई। केंद्र से जुड़े राजमल कुलमी ने उसे वित्तिय प्रबंधन का पाठ पठाया। वित्तिय प्रबंधन सीख इस राशि से उसने सबसे पहले अपनी मां व भाई से उधार लिए रूपए चुकाए। उसके बाद गिरवी रखे खेत को छुड़वाया और छोटे-मोटे कर्ज से छुटकारा पाया।
राजमल कुलमी
राजमल कुलमी कहते है कि ‘‘धापू बाई आत्मविश्वास से लबरेज एक संघर्षशील महिला हैं। उसकी खासियत यह है कि वो मुश्किलों से तनिक भी घबराती नहीं है। उसके पति की मृत्यु के बाद मैंनें उसकी हालत देखी, उसके बाद कई बार धापू बाई के बारे में सोचने पर मजबूर हुआ। उस पर बहुत कर्जा था और 7 लोगों को पालने की जिम्मेदारी भी। इसलिए मैं हर उस योजना का लाभ उसे दिलवाना चाहता था, जिसकी वो पात्र थी। क्योंकि आर्थिक प्रकोप से बचाने के लिए सरकारी सहायता ही एक मात्र उपाय मुझे नजर आ रहा था।’’
धापू बाई की एक बेटी व दो बेटे गांव के ही उच्च प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते हैं। राजमल कुलमी का ध्यान पालनहार योजना की ओर गया, उन्होंने धापू बाई के तीनों बच्चों को पालनहार योजना से जुड़वाया। 20 अप्रेल 2015 को धापू बाई की बैंक डायरी का अवलोकन किया तो पाया कि उसके बैंक खाते में कोषाधिकारी कार्यालय ने इस वर्ष 36000 रूपए जमा कराए हैं।
गरीबी के थपेड़ों से पक चुकी धापू बाई के सामने नित नई बाधाएं आन खड़ी होती हैं। एक तो कच्चा कवेलूपोश कमरा उपर से ओलावृष्टि। घर के आधे से अधिक कवेलू फूट चुके हैं। किसी ने बताया कि ग्राम पंचायत में आवेदन करने पर मुआवजा राशि मिलेगी। उसने आवेदन किया तो ग्राम पंचायत से कहा गया कि वह बीपीएल श्रेणी में शामिल नहीं है इसलिए उसे मुआवजा नहीं मिलेगा। बैंक खाते में जमा रूपयों की उसे जानकारी नहीं थी। उसने गांव के एक व्यक्ति से ब्याज पर 3000 रूपए उधार लेकर घर पर नए कवेलू डलवाए हैं। लेकिन कवेलू कम पड़ गए, अभी भी रात में चांद सितारे उसके घर में झांक रहे हैं।
बालिग हो चुकी एक बेटी का विवाह 24 अप्रेल 2015 को होने वाला हैं। उसने बताया कि मेरे आॅफिस (केंद्र को वह अपना आॅफिस बताती हैं।) वालों ने बेटी के विवाह पर मिलने वाली सहायता राशि के लिए मेरा आवेदन करवाने में सहायता की। डेढ़ माह पहले ही मैंनें विवाह आवेदन करवा दिया हैं। मुझे उम्मीद है कि बेटी के विवाह के लिए मुझे सरकार से 51,000 रूपए की सहायता जरूर मिलेगी।
बहरहाल संघर्ष की प्रतिमूर्ति धापू बाई संघर्षों का सहर्ष सामना करते हुए, स्वाभिमानी से जीवन जी रही हैं। हाल ही में उसने प्राकृतिक प्रकोप ओलावृष्टि का सामना किया। अब बेटी का विवाह करवाना उसके लिए बड़ी चुनौती हैं लेकिन आत्मविश्वास व केद्र के सहयोग के बूते वह इस चुनौती को भी पार कर ही लेगी।
उसे मलाल है कि वह गिरवी पड़े अपने चांदी के आभूषणों को नहीं छुडवा पाई हैं। वह कहती है कि मजदूर आॅफिस नहीं होता तो मैं इन चुनौतियों का सामना नहीं कर पाती। कर्ज चुकाने में मेरा घर व खेत बिक जाते, मुझे बेघर होना पड़ेपड़ता। मैं ताउम्र आॅफिस वालों की आभारी रहूंगी।
संगठन की बैठक को सम्बोधित करती धापू बाई
केंद्र से जुड़ने के बाद धापु बाई और अधिक जाग्रत हुई हैं। उसने अपने हकाधिकारों को जाना हैं। आज वह सशक्त महिला के रूप में पहचानी जाती हैं। सरकारी दफ्तरों से लेकर गोगुन्दा कस्बे के आस-पास के क्षेत्रों के विभिन्न समुदायों के लोग उसके नेतृत्व और बेबाकी से वाकीफ हुए हैं। वह बजरंग निर्माण श्रमिक संगठन की सक्रिय महिला नेत्री हैं। हाल ही में संगठन के लोगों ने उसे सर्वसम्मति से अरावली निर्माण सुरक्षा संघ के सदस्य के रूप में मनोनित किया हैं।
गुजारिश है धापू बाई के लिए दुआएं मगफिरत फरमावें . . .

Monday, March 30, 2015

महिला शक्ति सम्मेलन सम्पन्न


मजबूत बनो, हिम्मत रखो और आगे बढ़ो - रानू शर्मा

उदयपुर/गोगुन्दा/बरवाड़ा -  आजीविका ब्यूरो व श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केंद्र बरवाड़ा द्वारा सोमवार को बरवाड़ा में महिला शक्ति सम्मेलन का आयोजन किया गया। सम्मेलन में गोगुन्दा, बरवाड़ा, केलवाड़ा व खेरवाड़ा के प्रवासी श्रमिक परिवारों की करीब 600 महिलाओं ने भाग लिया। 
सम्मेलन में जागृति गीत गाती महिलाएं

सम्मेलन को सम्बोधित करती
डीवाईएसपी
सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए मुख्य अतिथि पुलिस उपाधिक्षक (डीवाईएसपी- गिर्वा) रानू शर्मा ने महिलाओं को मजबूत बनने, हिम्मत रखने और आगे बढ़ने का आव्हान् करते हुए कहा कि ‘‘औरत ही औरत की दुश्मन होती हैं’’, इस जुमले को समाप्त करना होगा। उन्होंने कहा कि  आज बाहरी तौर पर देखने पर महिलाएं एकजूट नजर आ रही हैं लेकिन असल एकता तब नजर आएगी जब महिलाएं एकता को आत्मसात कर परस्पर सहयोग करेंगी। उन्होंने महिलाओं से कहा कि वे घर, समाज में अत्याचार सहन करने की बजाए अत्याचार के खिलाफ आवाज उठाएं। मारपीट होने पर इसकी शिकायत पुलिस में करें, अगर थाने में नहीं जा सकती हैं तो कम से कम 100 नम्बर पर फोन करके शिकायत जरूर दर्ज करवाएं। डीवाईएसपी को महिला सम्मेलन इतना अच्छा लगा कि वो सम्मेलन में करीब 2 घंटे तक रूकी रही। इस दौरान उन्होंने विभिन्न प्रतियोगिताओं को देखा व विजेता महिला प्रतिभागियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया।


सम्मेलन में आयोजित की प्रतियोगिताएं
सम्मेलन में चम्मच रेस, मेहन्दी, रंगोली, कुर्सी सहित कई प्रतियोगिताएं आयोजित की गई। वहीं अतिथियों ने विजेताओं को पुरस्कार देकर सम्मानित किया।
   कुर्सी प्रतियोगिता में भाग लेती महिलाएं


ग्यारसी बाई सहरिया ने साझी की संघर्ष की कहानी
सम्बोधित करती ग्यारसी बाई सहरिया
बारां जिले के सहरिया आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के किशनगंज से आई सामाजिक कार्यकर्ता ग्यारसी बाई सहरिया ने बताया कि किशनगंज के जाग्रत महिला संगठन ने संघर्ष कर बड़े-बड़े सामाजिक बदलाव किए हैं, उन्होंने कहा कि आदिवासी बाहुल्य किशनगंज व शाहबाद क्षेत्र बंधुआ मजदूरी से व्याप्त था। वहां दमित जातियों के लोगों से बंधुआ मजदूरी करवाई जाती थी, उनकी जमीनों को दबंगों ने अपने कब्जे में कर रखा था। संगठन ने मजबूती के साथ इस मुद्द्े को राज्य व केंद्र स्तर पर उठाया, जिसकी बदौलत क्षेत्र में कार्य कर रहे 250 से अधिक बंधुआ मजदूरों को प्रशासन ने मुक्त करवाया और उनका पुर्नवास करवाया, अब भी पुर्नवास का कार्य चालू हैं। संगठन महिला हिंसा व वंचित वर्ग के दमन के विरूद्ध लगातार कार्य कर रहा हैं। उन्होंने कहा कि अगर महिलाएं संगठित नहीं होती तो यह बदलाव शायद ही हो पाते। सम्मेलन को सामाजिक कार्यकर्ता कल्याणी बाई सहरिया ने भी सम्बोधित किया।

राजीव खण्डेलवाल
संगठन से जुड़े हर प्रवासी श्रमिक परिवार की महिला - खण्डेलवाल
आजीविका ब्यूरो के निदेषक राजीव खण्डेलवाल ने कहा कि जिस प्रकार बारां जिले के आदिवासी क्षेत्रों में जाग्रत महिला संगठन ने महिलाओं को संगठित किया हैं एवं महिलाओं के हकाधिकारों की पैरवी की हैं, उसी प्रकार अपने क्षेत्र में महिलाओं को संगठित होकर सषक्त होना होगा।
उन्होंने कहा कि वर्तमान में क्षेत्र की करीब 2500 महिलाएं उजाला समूहों से जुड़ी हुई हैं। गोगुन्दा व केलवाड़ा क्षेत्र से मजदूरी के लिए 20 हजार से भी अधिक परिवारों से प्रवास होता हैं। इन सभी परिवारों की महिलाओं को उजाला समूहों से जोड़ना होगा, तभी यह संगठन अधिक मजबूत हो पाएगा।
वहीं केंद्र की गुलाबी परमार ने बताया कि आजीविका ब्यूरो द्वारा प्रवासी श्रमिक परिवारों की महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए सतत कार्य किए जा रहे हैं। इसके तहत गांववार महिलाओं के समूह बनाए गए हैं, जिन्हें गांवों में उजाला समूह के नाम से जाना जाता हैं। इन समूहों की नेत्रियों को उजाला किरण के रूप में पहचान मिली हैं। उन्होंने बताया कि सम्मेलन उजाला समूह से जुड़ी महिलाओं की अगुवानी में ही आयोजित किया गया हैं। उन्होंने बताया कि सम्मेलन में प्रवासी श्रमिक परिवारों की महिलाएं अपनी समस्याओं को साझा करती हैं तथा अपने मुद्दों पर रणनीति बनाती हैं।

प्रवासी श्रमिक परिवारों की महिलाओं ने बताई समस्याएं
सम्मेलन में महिलाओं ने रोजगार, पेंशन व राशन प्राप्त करने में आ रही परेशानियों के बारे में बताया। सम्मेलन में एफईएस संस्थान के कला जत्थे द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। वहीं सम्मेलन में मुख्य अतिथि के रूप में पुलिस उपाधिक्षक रानू शर्मा तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में संकल्प संस्था (बारां) की ग्यारसी बाई सहरिया, सामाजिक कार्यकर्ता कल्याणी बाई सहरिया, बसंती बाई (सरपंच-कुंचोली), जमना देवी (गुन्दाली-सरपंच), हेमा देवी (तिरोल-सरपंच), देऊ बाई (कणूजा-सरपंच), सविता देवी (रावलिया खुर्द-सरपंच) उपस्थित रही। 

कार्यक्रम की कुछ झलकियां - - - -








Monday, December 29, 2014

साड्डा हक ऐथ्थे रख

आजीविका ब्यूरो की कानूनी शिक्षण एवं पैरवी ईकाई भी है। इस ईकाई के द्वारा श्रमिकों के श्रम भुगतान, मुआवजे, दुर्घटना, मारपीट के विवादों में श्रमिकों को निःशुल्क परामर्श देने, उनके विवाद दर्ज कर कानूनी सहायता प्रदान करने तथा पीडि़त श्रमिक व विपक्षी के बीच सुलह करवाने का कार्य प्रमुखता से किया जाता है। यह ईकाई आजीविका ब्यूरो द्वारा संचालित विभिन्न श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केंद्रों के माध्यम से श्रमिकों को निःशुल्क कानूनी शिक्षण एवं पैरवी सेवा प्रदान की जाती है। इस सेवा के अंतर्गत गांवों मंे पैरालीगल नियुक्त किए गए है जो उन्हीं क्षेत्र के है तथा श्रमिकों के साथ होने वाले अन्याय के प्रति उन्हें सजग करते है, कानूनी शिक्षण प्रदान करते है और जिन श्रमिकों के साथ किसी प्रकार का शोषण होता है ऐसे श्रमिकों को कानूनी परामर्श देते है तथा उन्हें कानूनी सहायता करते है। एक केस स्टड़ी . . .

साड्डा हक ऐथ्थे रख : वेणी सिंह को मिला काम का मेहनताना

श्रमिक भरसक मेहनत करता है बावजूद उसका शोषण होता रहता है। असंगठित व निजी क्षेत्र में श्रमिकों को मेहनता ने का भुगतान समय पर नहीं करने, दुर्घटना घटित हो जाने पर मुआवजा नहीं दिए जाने, न्यूनतम मजदूरी से कम का भुगतान करने जैसे मामले अकसर सामने आते रहते है। गैर सरकारी संस्थानों में हीन हीं वरन सरकारी विभागों में संविदा पर नियुक्त श्रमिक भी शोषण से बचे नहीं है।
सरकारी विभागों में भी श्रमिकों की नियुक्ति की आवश्यकता पड़ती है। वर्तमान में सरकार प्लेसमेंट एजेन्सियों के मार्फत संविदाकर्मियों के द्वारा कार्य करवा रही है। कहीं कार्यक्रम अधिकारी तो कहीं इंजीनियर, कहीं कम्प्यूटरकर्मी तो कहीं बाबू, कहीं ड्राइवर तो कहीं रसोई श्रमिक के रूप् में संविदा पर नियुक्ति दी जा रही है। यह अच्छा भी, क्योंकि इससे श्रमिकों को भी सरकारी कामकाजों में रोजगार के अवसर मिले है लेकिन प्लेसमेंट एजेन्सियों द्वारा श्रमिकों के शोषण करने के मामले भी सामने आ रहे है। पीडि़त श्रमिकों द्वारा शोषण के खिलाफ शिकायत भी की जाती है तो विभाग प्लेसमेंट एजेन्सी का मामला बताकर हाथ खड़े कर देती है। ऐसे में श्रमिक अपने आपको ठगा-सा महसूस करने लगता है। ऐसा ही हुआ उदयपुर जिले के गोगुन्दा क्षेत्र के गायरियावास गांव के वेणी सिंह खरवड़ के साथ।

वेणी सिंह खरवड़
वेणी सिंह खरवड़ (54 वर्ष) रसोई श्रमिक है। उन्होंने गोगुन्दा कस्बे में स्थित आबकारी थाने की मेस में रसोई बनाने का कार्य किया। जानकारी के अनुसार प्लेसमेंट एजेन्सी एम एस एन्टरप्राईजेज (उदयपुर) ने 01 सितम्बर 2013 से वेणी सिंह खरवड़ को 3000 रूपए मासिक के आधार पर गोगुन्दा के आबकारी थाने में रसोई बनाने के लिए नियुक्त किया। आबकारी थाने से वेणी सिंह के गांव के बीच 4 किलोमीटर की दूरी है। सर्दी हो या गर्मी या फिर वर्षा ऋतु, वह रोजाना सुबह 6.30 बजे तक आबकारी थाने पहुंचता और थाने के कर्मचारियों के लिए खाना बनाता। सुबह का खाना बनाने के बाद घर चला जाता, दिन में घर व खेती का काम करता और शाम को फिर आबकारी थाने में आकर कर्मचारियों के लिए शाम का खाना बनाता रहा। वेणी सिंह ने बताया कि दोनों समय खाना बनाने के महज 100 रुपए ही मिलते थे लेकिन क्या करता ? इसके अलावा रोजगार का कोई अवसर भी तो नहीं था।

वेणी सिंह जब से काम पर लगा तब से लेकर 31 मार्च 2014 तक उसे प्लेसमेंट एजेन्सी द्वारा महज 3000 रुपए का भुगतान किया गया था। वेणी सिंह ने कई बार मेहनताने का तकाजा किया था लेकिन प्लेसमेंट एजेन्सी के डायरेक्टर ने भुगतान नहीं किया। वेणी सिंह ने आबकारी थानाधिकारी से भी इसकी शिकायत की लेकिन उन्होंने प्लेसमेंट एजेन्सी व श्रमिक के बीच हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।
स्थिति ऐसी थी कि कहीं नौकरी ना छूट जाए इस डर से उसे खाना दोनों समय बनाना था जबकि मेहनताने का भुगतान नहीं किया जा रहा था। इसी दौरान उसे एक स्थानीय वकील ने श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केंद्र के बारे में बताया। उसे बताया कि केंद्र श्रमिकों का अटका भुगतान कानूनी तरीके से दिलवाने में सहायता करता है।
तब 2 अगस्त 2014 को वेणी सिंह केंद्र पर उपस्थित हुए और अपनी समस्या बताई। केंद्र से उन्हें कानूनी परामर्श दिया गया। उनसे काम से जुड़े दस्तावेज मांगे तो उन्होंने बताया कि आबकारी थाने में रजिस्टर में रोजाना उपस्थिति दर्ज की जाती है, उस रजिस्टर के अलावा कोई प्रमाण नहीं है।
केंद्र के कार्यकर्ता ने उसे उसके मामले से जुड़े कानूनी पक्षों के बारे में बताते हुए, विवाद के समाधान हेतु परामर्श दिया और द्वितीय व तृतीय पक्ष के संदर्भ में जानकारियां ली। केंद्र के कार्यकर्ता द्वारा मामले में हस्तक्षेप करते हुए द्वितीय व तृतीय पक्ष से वेणी सिंह द्वारा दर्ज करवाए गए विवाद के बारे में चर्चा की गई। द्वितीय पक्ष ने तृतीय पक्ष को जिम्मेदार बताते हुए भुगतान करने से इंकार कर दिया।
इसी दरमियां ‘‘सरकार आपके द्वार अभियान’’ के तहत ग्राम पंचायत व ब्लाॅक स्तर पर जनसुनवाई शिविर आयोजित किए जाने की सरकार के कार्यक्रम की जानकारी मिली। इस अभियान के तहत राज्य सरकार के मंत्री और मुख्यमंत्री उदयपुर संभाग में रहे और ग्राम पंचायत व ब्लाॅक स्तर पर जनसुनवाई की। केंद्र के कार्यकर्ता ने इस अभियान का लाभ लेकर मामले का समाधान करने का विचार बनाया और 20 अगस्त को चांटिया खेड़ी ग्राम पंचायत में ग्राम पंचायत स्तरीय जनसुनवाई शिविर में वेणी सिंह खरवड़ से शिकायत दर्ज करवाई, जिसमें द्वितीय पक्ष से कार्य का भुगतान करवाने की मांग की। मंत्री से सुनवाई करते हुए आबकारी थानाधिकारी को 23 अगस्त तक वेणी सिंह को भुगतान करवाने के मौखिक आदेश दिए। 23 अगस्त को वेणी सिंह खरवड़ पंचायत समिति स्तरीय जनसुनवाई में नहीं पहुंच पाया लेकिन जनसुनवाई में उसकी शिकायत पर पुनः सुनवाई हुई। जैसे ही उसकी शिकायत मंत्री के हाथ में आई, मंत्री ने आबकारी थानाधिकारी को जवाब के लिए बुलाया और शिकायत निवारण के बारे में पूछा तो आबकारी थानाधिकारी ने कहा कि वेणी सिंह खरवड़ को बकाया राशि का भुगतान बीते कल कर दिया गया है। शिविर में मौजूद लोगों ने मंत्री द्वारा की गई कार्यवाही पर जमकर कर तालियां बजाई और मंत्री की हौसलां अफजाई की।
दूसरी ओर वेणी सिंह खरवड़ को ब्लाॅक स्तरीय जनसुनवाई शिविर में चले घटनाक्रम की जानकारी मिली तो वह जलभून कर रह गया। अब वह केंद्र द्वारा की जा रही कार्यवाही के भरोसे था। केंद्र द्वारा द्वितीय व तृतीय पक्ष को मामले के संदर्भ में अपना पक्ष रखने एवं विवाद में सुलह हेतु आमंत्रित किया। केंद्र नोटिस जाने के बाद द्वितीय व तृतीय पक्ष अपना पक्ष रखने केंद्र पर तो नहीं आए लेकिन वेणी सिंह को बकाया भुगतान कर दिया। वेणी सिंह ने बताया कि द्वितीय पक्ष ने 13000 रुपए का भुगतान 20 अक्टूबर 14 व 5000 रुपए 2 नवम्बर 14 को कर दिया।
वेणी सिंह खरवड़ रसोई कार्य में ही दक्ष है और गांव व परिवार को नहीं छोड़ना चाहते है इसलिए ही उन्होंने बहुत कम मेहनताने में भी आबकारी थाने में रसोई कार्य को निरन्तर चालू रखा। अब प्लेसमेंट एजेन्सी ने वेणी सिंह खरवड़ को नई नियुक्ति दी है और नियमित भुगतान भी किया जा रहा है।

Tuesday, December 23, 2014

साड्डा हक ऐथ्थे रख : वेणी सिंह को मिला काम का मेहनताना

श्रमिक भरसक मेहनत करता है बावजूद उसका शोषण होता रहता है। असंगठित व निजी क्षेत्र में श्रमिकों को मेहनता ने का भुगतान समय पर नहीं करने, दुर्घटना घटित हो जाने पर मुआवजा नहीं दिए जाने, न्यूनतम मजदूरी से कम का भुगतान करने जैसे मामले अकसर सामने आते रहते है। गैर सरकारी संस्थानों में हीन हीं वरन सरकारी विभागों में संविदा पर नियुक्त श्रमिक भी शोषण से बचे नहीं है।

सरकारी विभागों में भी श्रमिकों की नियुक्ति की आवश्यकता पड़ती है। वर्तमान में सरकार प्लेसमेंट एजेन्सियों के मार्फत संविदाकर्मियों के द्वारा कार्य करवा रही है। कहीं कार्यक्रम अधिकारी तो कहीं इंजीनियर, कहीं कम्प्यूटरकर्मी तो कहीं बाबू, कहीं ड्राइवर तो कहीं रसोई श्रमिक के रूप् में संविदा पर नियुक्ति दी जा रही है। यह अच्छा भी, क्योंकि इससे श्रमिकों को भी सरकारी कामकाजों में रोजगार के अवसर मिले है लेकिन प्लेसमेंट एजेन्सियों द्वारा श्रमिकों के शोषण करने के मामले भी सामने आ रहे है। पीडि़त श्रमिकों द्वारा शोषण के खिलाफ शिकायत भी की जाती है तो विभाग प्लेसमेंट एजेन्सी का मामला बताकर हाथ खड़े कर देती है। ऐसे में श्रमिक अपने आपको ठगा-सा महसूस करने लगता है। ऐसा ही हुआ उदयपुर जिले के गोगुन्दा क्षेत्र के गायरियावास गांव के वेणी सिंह खरवड़ के साथ।

वेणी सिंह खरवड़ (54 वर्ष) रसोई श्रमिक है। उन्होंने गोगुन्दा कस्बे में स्थित आबकारी थाने की मेस में रसोई बनाने का कार्य किया। जानकारी के अनुसार प्लेसमेंट एजेन्सी एम एस एन्टरप्राईजेज (उदयपुर) ने 01 सितम्बर 2013 से वेणी सिंह खरवड़ को 3000 रूपए मासिक के आधार पर गोगुन्दा के आबकारी थाने में रसोई बनाने के लिए नियुक्त किया। आबकारी थाने से वेणी सिंह के गांव के बीच 4 किलोमीटर की दूरी है। सर्दी हो या गर्मी या फिर वर्षा ऋतु, वह रोजाना सुबह 6.30 बजे तक आबकारी थाने पहुंचता और थाने के कर्मचारियों के लिए खाना बनाता। सुबह का खाना बनाने के बाद घर चला जाता, दिन में घर व खेती का काम करता और शाम को फिर आबकारी थाने में आकर कर्मचारियों के लिए शाम का खाना बनाता रहा। वेणी सिंह ने बताया कि दोनों समय खाना बनाने के महज 100 रुपए ही मिलते थे लेकिन क्या करता ? इसके अलावा रोजगार का कोई अवसर भी तो नहीं था।

वेणी सिंह जब से काम पर लगा तब से लेकर 31 मार्च 2014 तक उसे प्लेसमेंट एजेन्सी द्वारा महज 3000 रुपए का भुगतान किया गया था। वेणी सिंह ने कई बार मेहनताने का तकाजा किया था लेकिन प्लेसमेंट एजेन्सी के डायरेक्टर ने भुगतान नहीं किया। वेणी सिंह ने आबकारी थानाधिकारी से भी इसकी शिकायत की लेकिन उन्होंने प्लेसमेंट एजेन्सी व श्रमिक के बीच हस्तक्षेप करने से इंकार कर दिया।

स्थिति ऐसी थी कि कहीं नौकरी ना छूट जाए इस डर से उसे खाना दोनों समय बनाना था जबकि मेहनताने का भुगतान नहीं किया जा रहा था। इसी दौरान उसे एक स्थानीय वकील ने श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केंद्र के बारे में बताया। उसे बताया कि केंद्र श्रमिकों का अटका भुगतान कानूनी तरीके से दिलवाने में सहायता करता है।
तब 2 अगस्त 2014 को वेणी सिंह केंद्र पर उपस्थित हुए और अपनी समस्या बताई। केंद्र से उन्हें कानूनी परामर्श दिया गया। उनसे काम से जुड़े दस्तावेज मांगे तो उन्होंने बताया कि आबकारी थाने में रजिस्टर में रोजाना उपस्थिति दर्ज की जाती है, उस रजिस्टर के अलावा कोई प्रमाण नहीं है।

केंद्र के कार्यकर्ता ने उसे उसके मामले से जुड़े कानूनी पक्षों के बारे में बताते हुए, विवाद के समाधान हेतु परामर्श दिया और द्वितीय व तृतीय पक्ष के संदर्भ में जानकारियां ली। केंद्र के कार्यकर्ता द्वारा मामले में हस्तक्षेप करते हुए द्वितीय व तृतीय पक्ष से वेणी सिंह द्वारा दर्ज करवाए गए विवाद के बारे में चर्चा की गई। द्वितीय पक्ष ने तृतीय पक्ष को जिम्मेदार बताते हुए भुगतान करने से इंकार कर दिया।

इसी दरमियां ‘‘सरकार आपके द्वार अभियान’’ के तहत ग्राम पंचायत व ब्लाॅक स्तर पर जनसुनवाई शिविर आयोजित किए जाने की सरकार के कार्यक्रम की जानकारी मिली। इस अभियान के तहत राज्य सरकार के मंत्री और मुख्यमंत्री उदयपुर संभाग में रहे और ग्राम पंचायत व ब्लाॅक स्तर पर जनसुनवाई की। केंद्र के कार्यकर्ता ने इस अभियान का लाभ लेकर मामले का समाधान करने का विचार बनाया और 20 अगस्त को चांटिया खेड़ी ग्राम पंचायत में ग्राम पंचायत स्तरीय जनसुनवाई शिविर में वेणी सिंह खरवड़ से शिकायत दर्ज करवाई, जिसमें द्वितीय पक्ष से कार्य का भुगतान करवाने की मांग की। मंत्री से सुनवाई करते हुए आबकारी थानाधिकारी को 23 अगस्त तक वेणी सिंह को भुगतान करवाने के मौखिक आदेश दिए। 23 अगस्त को वेणी सिंह खरवड़ पंचायत समिति स्तरीय जनसुनवाई में नहीं पहुंच पाया लेकिन जनसुनवाई में उसकी शिकायत पर पुनः सुनवाई हुई। जैसे ही उसकी शिकायत मंत्री के हाथ में आई, मंत्री ने आबकारी थानाधिकारी को जवाब के लिए बुलाया और शिकायत निवारण के बारे में पूछा तो आबकारी थानाधिकारी ने कहा कि वेणी सिंह खरवड़ को बकाया राशि का भुगतान बीते कल कर दिया गया है। शिविर में मौजूद लोगों ने मंत्री द्वारा की गई कार्यवाही पर जमकर कर तालियां बजाई और मंत्री की हौसलां अफजाई की।

दूसरी ओर वेणी सिंह खरवड़ को ब्लाॅक स्तरीय जनसुनवाई शिविर में चले घटनाक्रम की जानकारी मिली तो वह जलभून कर रह गया। अब वह केंद्र द्वारा की जा रही कार्यवाही के भरोसे था। केंद्र द्वारा द्वितीय व तृतीय पक्ष को मामले के संदर्भ में अपना पक्ष रखने एवं विवाद में सुलह हेतु आमंत्रित किया। केंद्र नोटिस जाने के बाद द्वितीय व तृतीय पक्ष अपना पक्ष रखने केंद्र पर तो नहीं आए लेकिन वेणी सिंह को बकाया भुगतान कर दिया। वेणी सिंह ने बताया कि द्वितीय पक्ष ने 13000 रुपए का भुगतान 20 अक्टूबर 14 व 5000 रुपए 2 नवम्बर 14 को कर दिया।

वेणी सिंह खरवड़ रसोई कार्य में ही दक्ष है और गांव व परिवार को नहीं छोड़ना चाहते है इसलिए ही उन्होंने बहुत कम मेहनताने में भी आबकारी थाने में रसोई कार्य को निरन्तर चालू रखा। अब प्लेसमेंट एजेन्सी ने वेणी सिंह खरवड़ को नई नियुक्ति दी है और नियमित भुगतान भी किया जा रहा है।

Wednesday, December 10, 2014

श्रमिकों के प्रति संवेदनशील हो प्रशासनिक अधिकारी - प्रताप गमेती

श्रमिक हितलाभ वितरण कार्यक्रम में बोले विधायक, 150 श्रमिकों को वितरित की साईकिलें
कार्यक्रम को सम्बोधित करते विधायक प्रताप गमेती
गोगुन्दा (10 दिसम्बर 2014) - कृषि उपज मण्डी मंे आयोजित श्रमिक हितलाभ वितरण कार्यक्रम में बोलते हुए विधायक प्रताप गमेती ने कहा कि लगभग पूरे गोगुन्दा क्षेत्र को टीएसपी से जोड़ दिया गया हैै। सरकार इस क्षेत्र के विकास के लिए प्रतिबद्ध है। श्रमिकों के हितों की सुरक्षा के लिए भी सरकार कर्मकार कल्याण मण्डल के जरिए सतत प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक अधिकारियों को श्रमिकों के मुद्दों के प्रति संवेदनशील होना पडेगा तथा उन्हें योजनाओं के लाभ दिलवाने के लिए प्रयास करना होगा।

उल्लेखनीय है कि श्रम विभाग एवं अरावली निर्माण मजदूर सुरक्षा संगठन के संयुक्त तत्वावधान में कृषि उपज मण्डी परिसर में हितलाभ वितरण कार्यक्रम आयोजित किया गया, जिसमें गोगुन्दा, सायरा, बरवाड़ा व बड़गांव क्षेत्र के 150 महिला व पुरूष श्रमिकों को साईकिलें वितरित की गई।

आजीविका ब्यूरो द्वारा संचालित श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केंद्र के समन्वयक राजेन्द्र शर्मा ने बताया कि कार्यक्रम में अरावली सहित क्षेत्रीय बजरंग, जरगा, सायरा व लक्ष्मी बाई निर्माण श्रमिक संगठन ने सहयोग किया। 

अरावली निर्माण श्रमिक सुरक्षा संगठन के संरक्षक नाना लाल मीणा ने कर्मकार कल्याण मण्डल द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं की विस्तृत जानकारी देते हुए कार्यक्रम में उपस्थित श्रमिकों से आव्हान् किया कि वे इन योजनाओं की जानकारी संगठन के माध्यम से प्रत्येक निर्माण श्रमिक तक पहुंचाए। 

श्रमिकों को साईकिल वितरित करते हुए 
उन्होंने राजस्थान भवन एवं अन्य संनिर्माण कर्मकार कल्याण मण्डल द्वारा जारी परिचय पत्र को पंचायत समिति स्तर पर नवीनीकरण की व्यवस्था करने, ग्राम पंचायतों द्वारा महानरेगा के तहत दिए गए कार्य दिवसों को प्रमाणित करने एवं परिचय पत्र के लिए आवेदन हेतु पंचायत समिति स्तर पर ही व्यवस्था करने की मांग की। वहीं बजरंग, जरगा, सायरा व लक्ष्मी बाई निर्माण श्रमिक संगठनों के लोगों ने श्रम आयुक्त पंतजली भू, उपखण्ड अधिकारी व क्षेत्रीय विधायक प्रताप गमेती को श्रमिकों की मागों को लेकर श्रम मंत्री के नाम ज्ञापन सौंपा। 

कार्यक्रम को सम्बोधित करते हुए श्रम आयुक्त पतजंली भू ने कहा कि कर्मकार कल्याण मण्डल से जुड़े श्रमिकों को हित लाभ दिए जाने में आ रही समस्याओं के समाधान के प्रयास किए जाएंगेे तथा जिन हिताधिकारियों को आवेदन के बावजूद लाभ नहीं मिले है उनकी फाइलों की जांच कर सूचित किया जाएगा। 

कार्यक्रम को उपखण्ड अधिकारी सत्यनारायण आचार्य, अरावली निर्माण श्रमिक सुरक्षा संगठन के अध्यक्ष अब्दुल जब्बार, कवि सोहन लाल कोठारी ने भी सम्बोधित किया वहीं पुलिस थाना अधिकारी हनुवंत सिंह सोढ़ा व विभिन्न श्रमिक संगठनों के पदाधिकारी उपस्थित रहे। 

Wednesday, November 12, 2014

कानूनी शिक्षण अभियान


हरी झण्डी दिखाकर रथ को रवाना करते हुए 
आज (12 नवम्बर 2014) सुबह 10.30 बजे गोगुन्दा केंद्र द्वारा निकाले जा रहे ‘‘कानूनी शिक्षण रथ’’ को स्टेप एकेडमी के संजय चित्तोड़ा ने हरी झण्ड़ी दिखाई वहीं मंगल कार्य के लिए मांगलिक नहीं था तो हमारे भाईसाब ने हमें चाय पिलाकर रवाना किया। उल्लेखनीय है कि एक बोलेरो जीप को हमारे द्वारा रथ के रूप में सजाया गया। उस पर लेबर लाइन की तख्तियां, कानूनी सेवा के फ्लेक्स, बजरंग निर्माण श्रमिक संगठन के बैनर इत्यादि लगाए गए। रथ में लाउडस्पीकर लगाया जिसके माध्यम से कानूनी सेवा का प्रचार प्रसार किया गया। 

रथ में पैरालीगल मालूराम गमेती, भंवर लाल व कलेक्टिव सदस्य पन्ना लाल गमेती, केंद्र के कार्यकर्ता दिलीप गमेती तथा कानूनी शिक्षण एवं पैरवी ईकाई उदयपुर के भास्कर सिंह के साथ मैं भी था। वैसे भास्कर जी दोपहर में हमारे साथ हुए थे। रथ में लाउडस्पीकर को सेट करने का मैंनें ही किया था सो मशीन, माइक व बैट्री को सबसे पीछे वाली सीट पर ही सेट किया। रथ की रवानगी के साथ ही मैं पिछली सीट पर जम गया और जमकर प्रचार प्रचार किया। ऐसा करने से बचपन की ‘‘ठप्पो-ठप्पो रे ठप्पो’’ की यादें ताजा हो गई। पंचायतीरात व विधानसभा चुनावों में बचपन में जीपों में बैठकर खूब चुनाव प्रचार किया करता था। तब ना किसी विचारधारा के साथ था और ना ही किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ाव था, बस बालमन को चुनाव प्रचार करने में आनन्द आता था इसलिए पिताजी की भंयकर डांट के बावजूद भी प्रचारों की गाडि़यों में माइक पर चिल्लाना अच्छा लगता था। माइक पर बोली जाने वाली पंक्तियां आज भी याद है . .  भाईयों और बहनों, आपके अपने लाडले, सेवाभावी, कर्मठ, लोकप्रिय उम्मीदवार ‘‘फलाणा’’ को चुनाव चिन्ह ‘‘ढिमका’’  पर चैकड़ी की मौहर लगाकर भारी मतों से विजयी बनावें! आश्चर्य!!! मुझे आज भी वे पंक्तियां हूबहू याद है ! 

खैर . . . गोगुन्दा से रवाना होकर ‘‘कानूनी शिक्षण रथ’’ बांसड़ा, फूटिया, मोड़ी, छिपाला होते हुए दोपहर 2 बजे भैरूनाथ भोजनालय पर पहुंचा। जहां हम सब ने ‘‘दोपेरी’’ की, नाश्ते में 3 किलो केले और 2-2 समोसे तो हम पहले ही दबा चुके थे। खाने के बाद रैम एक्टिवेट हुई, सैकेण्डरी मैमोरी में हलचल हुई और तन्द्रा टूटी, भई अब तक केवल एक विवाद सामने आया है जिस पर परामर्श दिया गया और प्रार्थी को 14 नवम्बर को लीगल डे पर बुलाया गया। मात्र 25-30 हाजरी डायरियां वितरित हो पाई है, हां कानूनी सेवा की जानकारी व कानूनी शिक्षण जरूर हम 200-50 लोगों को दे चुके थे। 

पर अब रथ की दशा को सुधारते हुए दिशा देना महत्वपूर्ण हो गया। अब तक हमें पता पड़ चुका था कि मजदूर तो मजदूरी करने गए है, गांवों में उनके घरों के दरवाजों पर ताले लटक रहे है, अमूमन गांव वाले भी अपने खेतों में चारा काटने या रबी की फसलें बोने में व्यस्त हैं, ऐसी दशा में क्या किया जाए ? तब तय किया कि रूट पर आ रहे गांवों में अधिक समय गंवाने की बजाए केंद्र से किसी ना किसी रूप से जुड़े गांव के किसी व्यक्ति को सूचना दी जाए कि रथ पुनः गांव में इतनी बजे आएगा और यहां बैठक आयोजित करेंगे। यह भी तय हुआ कि रूट पर कहीं अधिक संख्या में समूह में लोग नजर आयेंगे तो वहां नुक्कड़ सभा करके कानूनी शिक्षण दिया जाएगा या उनसे संवाद किया जाएगा। 

हम आगे बढ़ने ही वाले थे कि इत्ते में मुझे क्लेक्टिव सदस्य खेमराज गमेती का काॅल आ गया, बोले - नमस्कार, मुझे बगडून्दा ग्राम पंचायत में जाना था लेकिन मैं नहीं जा पाया। मजाम गांव की क्लेक्टिव से जुड़ी महिलाएं अपनी समस्याओं को लेकर ग्राम पंचायत बगडून्दा में सुबह 9 बजे से बैठी है आप तुरन्त वहां पहुंचे। अब मैं उलझन में पड़ गया, क्या करूं, क्या ना करूं, न किसी महिला के संपर्क नम्बर थे ना ही ग्राम पंचायत के सचिव या रोजगार सहायक के संपर्क नम्बर थे जो उनसे संपर्क कर मामले को सुलटाता, मैं उधेड़बुन में ही था कि संकटमोचन भास्कर जी हमारे सामने प्रकट हो गए, उन्हें तुरन्त जीप में स्थान दिया और मैं उनकी बाइक लेकर बगडून्दा के लिए रवाना हुआ, उनसे कहा कि रथ को रूट के मुताबिक लेकर आवे, मैं उन्हें बगडून्दा में मिल जाऊंगा।


बगडून्दा पहुंचा तो 8-9 महिलाएं बैठी हुई थी, वे अपने गांव में पिछले एक साल से खराब पड़े हेण्डपम्पों को ठीक करवाने की मांग को लेकर ग्राम पंचायत में आई थी, ग्राम पंचायत खुली थी लेकिन उसमें केवल चैकीदार बैठा था। रोजगार सहायक के मोबाइल नम्बर लिए काॅल करने का प्रयास किया तो पता चला कि नेटवर्क इमरजेंसी मोड़ में है। भला हो चौकीदार का उसने पास के एक कार्यालय से एक फोन लाकर दिया, उससे रोजगार सहायक को काॅल किया तो उसने बताया कि वो विशेष कार्य से पंचायत समिति कार्यालय गया हुआ है। उसे मामले से अवगत कराया गया, उसने चौकीदार से कहा कि वो महिलाओं का मांग पत्र ले लेवें और मुझे आश्वस्त किया वो पावती रसीद शिकायतकर्ता के घर भिजवा देगा। महिलाओं के रूके हुए भुगतान के बारे में उसे बताया उसने कहा कि वो एक-दो दिन में भुगतान करवा देगा। 

महिलाएं खुश होकर घरों को लौट गई, मैं भी ग्राम पंचायत से निकल कर बगडून्दा गांव की चौपाल पर आ गया। वहां बैठकर आगे के रूट पर गौर किया तो पता चला कि यहां से हमें भूत मंगरी जाना है। ‘‘भूत मंगरी’’ का नाम मस्तिष्क में आते ही क्षेत्र में व्याप्त भूतों की दंत कथाओं की ओर ध्यान चला गया और भूत मंगरी के बारे में काल्पनिक दृश्य दृष्टिपटल पर घूमने लगे। सामाजिक कार्यकर्ता विनय-चारूल भरवाड़ के गीत ‘‘मेरे हाथों को ये जानने का हक रे’’ के बोल कानों में पड़े तो मैं भूतों के माया जाल से बाहर निकला, सामने नजर गई तो पाया ‘‘कानूनी शिक्षण रथ’’ बगडून्दा चौपाल के करीब आ चुका था। रथ में बज रह लाउडस्पीकर से ही विनय-चारूल की आवाज सुनाई दे रही थी। यहां सभी साथियों ने बड़े प्रेम से एनर्जी बूस्ट (चाय) को चुस्कियों के साथ पिया। 10-15 प्रवासी श्रमिकों के साथ चर्चा के बाद रथ आगे बढ़ा और उभेश्वर विकास संस्था परिसर के पास होता हुआ बगडून्दा का खेड़ा गांव पहुंचा। यहां राजीव जी व कृष्णा जी के पुराने साथी गल्लाराम जी गमेती ने रथ का स्वागत किया। वे अकेले शख्स थे जो गांव में नजर आए, गांव के अमूमन घरों के दरवाजों पर ताले लटक रहे थे, घड़ी के कांटों की गणित 3.30 बजा रही थी। 

मेरे लेप्पी की घड़ी रात की 11.30 बजा रही है, सुबह जल्दी उठना है क्योंकि सुबह 8.00 बजे रथ रवाना करना है। तो साथियों आज का सफर यहीं पर समाप्त करता हूं, कभी राजीव जी व कृष्णा जी की कर्मस्थली रहे बगडून्दा का खेड़ा से रथ आगे कहां गया ? वहां हमने क्या किया ? आदि जानने के लिए पढि़ए मेरी आगामी पोस्ट . . . 

आपका साथी
लखन 

Monday, November 10, 2014

प्रशिक्षण से शुरू हुई बदलाव की बयार

  • लखन सालवी 

बरवाड़ा क्षेत्र में मार्बल फिटिंग ठेकेदार के रूप में बंशी लाल गमेती एक जाना पहचाना नाम है। 26 वर्षीय बंशी लाल को बैलदार के काम से मार्बल फिटिंग ठेकेदार तक के सफर में कई चुनौतियां का सामना करना पड़ा। बकौल बंशी लाल, आजीविका ब्यूरो के कार्यकर्ता मोहन लाल गमेती ने आजीविका ब्यूरो द्वारा आयोजित प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में न बताया होता तो वह इस मुकाम तक नहीं पहुंच पाता।

बंशी लाल गमेती उदयपुर जिले के गोगुन्दा उपखण्ड क्षेत्र की करदा ग्राम पंचायत के तमणियां गांव का निवासी है। 2008 में आजीविका ब्यूरो के श्रमिक सहायता एवं संदर्भ केंद्र गोगुन्दा द्वारा मार्बल फिटिंग का आवासीय प्रशिक्षण कार्यक्रम (एक माह) आयोजित किया। उस दौरान बरवाड़ा क्षेत्र में कार्य कर रहे ब्यूरो के कार्यकर्ता मोहन लाल गमेती ने बंशी लाल को रोजगार परामर्श देते हुए इस प्रशिक्षण कार्यक्रम के बारे में बताया। मोहन लाल ने सुझाव दिया कि उसे मार्बल फिटिंग का प्रशिक्षण प्राप्त कर रोजगार के अच्छे अवसर प्राप्त करने चाहिए। बंशी लाल इस सुझाव को आत्मसात करना चाह रहा था लेकिन उसके सामने एक दुविधा थी कि बेरोजगार होकर प्रशिक्षण प्राप्त करें या प्रशिक्षण प्राप्त कर रोजगार के अच्छे अवसर तलाश करें! वह बैलदारी का कार्य कर रहा था जिससे उसे 60 रूपए प्रतिदिन के मिल रहे थे। बैलदारी छोड़कर प्रशिक्षण प्राप्त करने जाने का निर्णय करना मुश्किल हो रहा था लेकिन अंततः उसने प्रशिक्षण प्राप्त करने की राह चुनी और प्रशिक्षण कार्यक्रम से जुड़कर मार्बल फिटिंग का कार्य सीखा। 

प्रशिक्षण के दौरान मार्बल फिटिंग का कार्य सीखाने के साथ ही जीवन में उपयोगी महत्वपूर्ण जानकारियां दी गई। उसका कहना है कि प्रशिक्षण के दौरान जीवन कौशल के बारे में भी बताया गया जो जीवन जीने में उपयोगी साबित हो रहा है। 

‘‘बैलदारी तो करता ही था, चिनाई कार्य व
मार्बल फिटिंग कार्य शायद में बिना प्रशिक्षण
के भी सीख लेता लेकिन प्रशिक्षण के दौरान
हमें जीवन जीने की जो कला सिखाई
गई वो मैं शायद ही कहीं ओर सीख पाता।’’
- बंशी लाल गमेती
बंशी लाल की शादी बचपन में ही हो गई थी, 10वीं तक पढ़ने की इच्छा थी लेकिन परिवार के हालात ऐसे हो गए कि पढ़ाई छोड़नी पड़ी। 2005 में आजीविका के लिए महाराष्ट्र के मुम्बई शहर में प्रवास पर गया और वहां स्टील के चम्मच बनाने की फैक्ट्री में कार्य किया। यहां 8 घंटे काम के बदले मेहनताना 48 रूपए था। 4 घंटे ओवर टाईम कार्य करना पड़ता था जिसके पेटे 24 रूपए अलग से दिए जाते थे। बंशी लाल ने यहां पूरी लगन से कार्य किया, बाद में उसे हैल्पर से आॅपरेटर बना दिया, अब उसकी मासिक तन्ख्वाह 4500 रुपए हो गई मगर प्रतिदिन 12 घंटे काम करना पड़ता। दूसरी तरफ 2500 रूपए तो वहीं खर्च हो जाते, जो बचते वो परिवार के लिए नाकाफी थे। इस कार्य को करते हुए बंशी ने महसूस किया कि वह आर्थिक रूप से कभी मजबूत नहीं हो पाएगा, उसने वापस गांव लौटने का निश्चय कर लिया और 2007 में मुम्बई को अलविदा कह दिया। 

प्रवास से गांव लौटे बंशी को बेरोजगारी खल रही थी, उसने कई जगह काम ढूंढ़े लेकिन कहीं काम नहीं मिला। वह जिस कार्य को करने में दक्ष था वह काम यहां नहीं था और जहां था वहां पूरा मेहनताना नहीं था। बेरोजगारी को दूर करने के गांव में दो ही विकल्प मौजूद थे, पहला - कृषि कार्य व दूसरा-पिताजी के साथ निर्माण कार्यों में मजदूरी करने का (उसके पिता निर्माण कार्य में चिनाई कार्य करते थे।)। उसे दूसरा विकल्प ठीक लगा और वह निर्माण कार्यों में बैलदारी का कार्य करने लगा। यहां उसे 60 रूपए दिहाड़ी मिलती। 

प्रशिक्षण से उसके जीवन में बड़े बदलाव हुए और निरन्तर होते जा रहे है, मार्बल फिटिंग कार्य में दक्ष होकर उदयपुर शहर में एक ठेकेदार के यहां 100 रूपए दिहाड़ी पर 5-6 माह तक कार्य किया। उसके बाद नाथद्वारा में 200 रूपए प्रतिदिन की दर से मार्बल फिटिंग कार्य किया, इस कार्य में इतना परिपक्व हो गया कि वहां कार्य करते हुए 15 दिन ही हुए थे और ठेकेदार ने उसका काम देखते हुए उसकी मजदूरी बढ़ाकर 250 रुपए प्रतिदिन कर दी। उदयपुर, दिल्ली, जोधपुर, भीलवाड़ा सहित कई शहरों में वह मार्बल फिटिंग का कार्य कर चुका है। पिछले 3 साल से वह ठेकेदारी कर रहा है, प्रतिमाह 5-10 मार्बल मिस्त्रियों को वह रोजगार देता है। अब उसे काम ढूंढ़ना ही नहीं पड़ता है, लोग उसे ढ़ूंढ़ते-ढ़ूंढ़ते आ जाते है। अब वह गोगुन्दा क्षेत्र में ही कार्य कर रहा है। उसका कहना है कि उसे यहीं काम मिल जाता है।

प्रशिक्षण प्राप्त कर रोजगार पाया और आर्थिक रूप से सुदृढ़ हुआ, उसने अपना मकान बना लिया है, दुपहिया वाहन भी है। बच्चों को भी गैर सरकारी विद्यालय में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दिलवा रहा है। वह किसी प्रकार का व्यसन नहीं करता है, वहीं घर, परिवार व समाज में उसे सम्मान मिल रहा है। उसने बताया कि लोग अपने समान किसी को नहीं होने देते है लेकिन मैंनें अपने कई साथियों को मार्बल फिटिंग का कार्य सिखाया है। 

मेरा विवाह 2001 में हुआ जब मेरी उम्र करीब 13 साल थी। मेरे समुदाय में अमूमन कम उम्र में ही शादी करवा दी जाती है। कम उम्र में विवाह होने का ही नतीजा है कि मेरे 3 संतानें है, 2 लड़के व 1 लड़की। लेकिन मैं अपने बच्चों का विवाह कम उम्र में नहीं करूंगा। - बंशी लाल गमेती

व्यसन से मुक्त रहने की बात हो या बाल विवाह न करने की बात हो। अपने सहयोगी को आगे बढ़ाने की बात हो या परिवार को मजबूत करने की बात हो, ये सब उसने प्रशिक्षण में ही सीखा और जीवन में अपना जिसका ही परिणाम है कि उसके जीवन में बड़े बदलाव दिखलाई दे रहे है।